दिसंबर 09, 2009

बुद्धं शरणम गच्छामि...........


8 दिसम्बर महायान परंपरा में बोधि दिवस के रूप में मनाया जाता है. विदेशों में बोधि दिवस बड़े उत्साह से मनाया जाता है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि राजकुमार सिद्दार्थ ने ज्ञान की खोज के लिए बोध गया बिहार में एक वट वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया ...............लम्बे ध्यान के बाद उन्हें जीवन के विभिन्न अनसुलझे सवालों के उत्तर मिले ........उस दिन जब सिद्दार्थ “महात्मा बुद्ध“ में परिवर्तित हुए उसे ही “बोधि दिवस” के नाम से जाना जाता है.....महायान संप्रदाय में इसे बोधि दिवस के रूप में मनाये जाने की परंपरा है. जिस वट वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ.........उसे बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है.
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि कलिंग युद्ध के बाद जब सम्राट अशोक बुद्ध धर्म की तरफ आकर्षित हुए तो उन्होंने इस वृक्ष के महत्त्व को जाना. सम्राट अशोक इस वृक्ष के नीचे बैठकर आनंद का अनुभव करते थे .........उनकी रानी तिस्सरक्षिता ने चिढ़ कर इसे कटवा दिया था .........किन्तु इस वृक्ष की एक टहनी सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री संघमित्रा और महेंद्र बुद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लए श्रीलंका ले गए थे............जिसे अनुराधापुर में रोपित किया गया था. कालांतर में यही वृक्ष बोधि- वृक्ष के ही रूप में प्रसिद्द हुआ. .......... अनुराधापुरम का यह बोधिवृक्ष दुनिया के प्राचीनतम वृक्ष के रूप में जाना जाता है. यह वृक्ष आज भी बुद्ध परंपरा में श्रद्धा का महत्त्वपूर्ण केंद्र है.
गया के बोधि वृक्ष की ही एक शाखा श्रावस्ती में भी है.............ऐसा माना जाता है कि बुद्ध के जीवित होने के दौरान ही बोधगया के बोधि वृक्ष से एक शाखा लेकर श्रावस्ती के जेतवन विहार के प्रवेश द्वार पर रोपित किया गया था जो कि “आनंद बोधि वृक्ष” के नाम से जाना जाता है. दरअसल यह वृक्ष “अनाथ पिण्डक” ने रोपित किया था जो बाद में “आनंद बोधि” के नाम से प्रसिद्द हुए. यह वृक्ष जेतवन के प्रवेश द्वार के निकट है. माना जाता है कि महात्मा बुद्ध ने एक रात्रि को इस वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया था. लोग मानते हैं कि इस वृक्ष के नीचे ध्यान लगाने वाले को पुण्य प्राप्त होता है.
दो माह पूर्व मैं जब श्रावस्ती दर्शन पर गया था तो जेतवन भ्रमण के दौरान मैं इस वृक्ष के नीचे भी गया था...........वाकई इस विशाल काय पवित्र एवं ऐतिहासिक वृक्ष के नीचे खड़ा होना अपने आप में एक अलग सा अनुभव था. इस वृक्ष की आयु को देखते हुए, इसको सहेजे जाने को दृष्टिगत रखते हुए सरकारी खर्चे से पिलर अदि लगाये गए हैं ताकि इस पवित्र वृक्ष को किसी भी प्राकृतिक आपदा या अन्य किसी नुकसान से बचाया जा सके. इस वृक्ष के नीचे मैंने खड़े होकर तस्वीर भी ली थी पोस्ट कर रहा हूँ. श्रावस्ती पर विस्तार से फिर कभी यात्रा वृत्तांत लिखूंगा.

दिसंबर 05, 2009

एक मुलाक़ात पंकज राग से............


कुशीनगर जाने का कार्यक्रम भी अचानक बन गया....सुबह दीपक जी, स्वतंत्र जी और उनकी धर्मपत्नी के साथ चर्चा हुई कि क्यों न एक दिन कुशीनगर चला जाए...........सहमती बनी कि कभी क्यों आज ही क्यों नहीं...... बात भी ठीक थी रविवार तो था ही...........निकल दिए थोड़ी देर बाद कुशीनगर के लिए!
कुशीनगर महत्मा बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है. कुशीनगर गोरखपुर से महज 80 किमी दूर है...लगभग दो घंटे की यात्रा के बाद हम कुशीनगर पहुँच चुके थे. चूँकि बच्चे साथ में थे......चाय ठन्डे की उनकी जिद थी सो तय हुआ की ' रेफ्रेस्मेन्ट ' क्यों न सरकारी विश्राम गृह 'पथिक निवास' में किया जाए. हमने गाड़ियाँ मोड़ ली पथिक निवास की तरफ...........बच्चों के साथ हम भी जल-पान ले रहे थे.....बताया गया कि कुशीनगर में उपचुनाव चल रहा है और पर्यवेक्षक महोदय भी इसी गेस्ट हाउस में ठहरे हुए हैं...कौतूहलवस मैं पूछ बैठा कि पर्यवेक्षक महोदय कौन हैं कहाँ से आये हैं.............पता चला कि पंकज राग साहब एम.पी. काडर आई. ए.एस. हैं! मेरे लिए तो यह अवाक् रह जाने वाली स्थिति थी वही पंकज राग जिनकी कृति 'धुनों की यात्रा' बमुश्किल एक महीने पहले मैंने लखनऊ पुस्तक मेले से खरीदी थी औरउन्हें इस अद्भुत कृति के लिखने पर कई बार धन्यवाद देने की कोशिश कर चुका था, मगर कोई संपर्क न. न मिल पाने के कारन यह कार्य नहीं कर सका था. मैंने इस कृति का ज़िक्र कुछ दिनों पूर्व अपने ब्लॉग पर किया ही था.
खैर मैंने बिलकुल भी देर नहीं लगी श्री राग से मिलने में ......मिलने का सन्देश भेजा, उन्होंने तुरंत बुला लिया...... श्री राग से पहली मुलाक़ात इतनी आत्मीय थी कि मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सका. हौले हौले से मुंह में 'रजनीगंधा' चलाते हुए चश्मा पहने इकहरे बदन वाले श्री राग इतने युवा लगे कि वे कहीं से भी मुझे 1990 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी नहीं लगे. कुछ लम्हों की औपचारिकताओं के बाद वे तुरंत अनौपचारिक हो गए ..............अपने साहित्यिक सारोकारों को बताने लगे कि सिविल सेवक होने के वाबजूद वे कैसे सतत साहित्य सृजन करते रहे. व्यस्तता के बाद भी वे म . प्र. के पर्यटन व सांस्कृतिक विरासत के ऊपर काफी किताबें लिख चुके हैं. उनकी एक कृति "ये भूमंडल की रातें" कविता रूप में है जिसे कुछ दिनों पूर्व ही म.प्र. सरकार के 'वाचस्पति अवार्ड' से नवाजा गया है. इतिहास के अध्येता होने के नाते वे सम्प्रति 1857 की क्रांति पर एक किताब लिख रहे हैं.
श्री राग मूलत: बिहार के रहने वाले हैं. उन्होंने दिल्ली के सेन्ट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर किया तदोपरांत दिल्ली युनिवर्सिटी से आधुनिक भारतीय इतिहास में एम् फिल किया. वे इससे पूर्व म.प्र. की विशिष्ट प्राचीन प्रतिमाओं पर पुस्तक “Masterpieces of MP” तथा “50 years of Bhopal as capital” का लेखन भी कर चुके हैं. इसके अलावा वे प्राचीन ऐतिहासिक छाया चित्रों के संकलन की पुस्तक “Vintage Madhya Pradesh” का संपादन भी कर चुके हैं.आज कल वे पुणे स्थित राष्ट्रिय टेलीविजन संसथान के निदेशक का दायित्व संभाल रहे हैं. श्री राग से यह मुलाकात हमेशा याद रहेगी.
लेखकीय क्षमता के धनी प्रशासनिक सेवारत श्री राग की विद्वता, सृजनात्मकता तथा प्रशासकीय सूझ बूझ मेरे लिए सदीव प्रेरणा स्रोत का कार्य करेगी.

नवंबर 26, 2009

ज़ख्म जो अब तक भरा नहीं .........


कुछ ज़ख्म कभी नहीं भरते ........................!

याद तो नहीं करना चाहता मगर भूलती भी तो नहीं वो रात.......अचानक मुंबई में आंतक का जो खेल शुरू हुआ उसने पूरे देश में दहशत मचा दी थी. दस आतंकी और उनकी लेओपोल्ड कैफे , नरीमन पॉइंट.....ताज होटल जैसे स्थानों पर दहशतगर्दी..........! सांस साधे एनएसजी के जवानों का अभियान देखता देश...... बहरहाल 170 शहीद जिनमे 16 वे वीर पुलिस कर्मी भी थे जिन्होंने अपनी जान गवां दी ............साल गुजर गया है मगर ज़ख्म अभी तक भरा नहीं है............!

जो हुआ अब कभी कहीं न हो............नम आँखों से 26/11 की बरसी पर शहीदों को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि !

(तस्वीर बीबीसी से)



नवंबर 20, 2009

बावस्तगी चलती रहे............



पता ही नहीं चला कब 10 साल गुजर गए...... मुट्ठी से रेत की तरह.......शायद उससे भी ज्यादा तेज........ऐसे कि पलकें बंद कीं और खोलें तो एक दशक गुज़र जाए...! आज अंजू के साथ 10 साल का सफ़र पूरा हुआ है....1999 में जब हमारी शादी हुयी थी तो हम महज 24 बरस के थे वो उम्र कि जब बच्चे अपने कैरियर को शेप दे रहे होते हैं.....हमने अपना कैरियर बनाया और झट से शादी कर डाली........! मंसूरी से ट्रेनिंग ख़त्म हुयी और उसके तुरंत बाद हम परिणय सूत्र में बंध गए......! इस बीच हमने जिंदगी के तमाम उतार चढ़ाव देखे....कुछेक मुश्किलें जरूर आयीं मगर ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक ठाक निबट गया...........एक सर्विस से दूसरी और फिर दूसरी से तीसरी........अंतत: देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में ..... दो मासूम बेटियां.........कानपुर- लखनऊ-बरेली-गाज़ियाबाद के बाद अब गोरखपुर प्रवास..............! खैर फिर आता हूँ अपनी शरीके - हयात अंजू पर.........! आदमी को अपने जीवन के नाज़ुक क्षणों में किसी ऐसे सहारे की ज़रुरत होती कि जब वो बिलकुल किसी औपचारिकताओं में नहीं बंधना नहीं चाहता.........खुल जाना चाहता है.......फूट पड़ना चाहता है........हर एक सुख दुःख को बाँटना चाहता है.......अंजू के साथ मेरा यही सब कुछ रहा....हर नाज़ुक वक़्त में वो मेरे साथ रही...............सुख-दुःख साथ महसूस किये.........! मैं इस मोड़ पर आकर महसूस करता हूँ कि अच्छा हमसफ़र मिलना भी किस्मतों की ही बात होती है और निश्चित रूप से मैं इस मामले में खुद को सौभाग्यशाली समझ सकता हूँ कि अंजू मेरे साथ है.......! हम दोनों सरकारी सेवाओं में रहे मगर इतना किया कि घर -ऑफिस को दूर दूर रखा..........न घर में ऑफिस की बात की और न ही ऑफिस में घर की बात को आने दिया .........इस सिद्धांत को पालने के अलावा "इगो" नहीं पनपने दिया जो घर को नरक बनाने में सबसे बड़ा कारक होता है....! बस ऐसे ही दस साल पूरे हो गए....... आगे सफ़र जारी है.........! 10 साल पहले मेरे दोस्त मनीष ने मुझे मेरी शादी पर एक शेर लिख कर दिया था, शेर तो बशीर बद्र साहेब का था मगर कुछ बदलाव मनीष ने अपने हिसाब से कर दिए थे ......वो शेर फिर से याद आ गया तो लिख दे रहा हूँ.........

कभी सुबह की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलो सदा कभी ख़त्म तुम्हारा सफ़र न हो !

मनीष का शेर सही साबित करने की कोशिश - ज़द्दोजहद ही तो है ये..............!

औपचारिक ज्यादा नहीं होना चाहता..........बहुत लिख पाना इस बारे में मेरे लिए मुश्किल है........सफ़र को आसान और खूबसूरत बनाने के लिए ईश्वर- परिजन- माता- पिता, भाई- बहन- मित्रों की भूमिका का शुक्रगुज़ार हूँ.........!
बिना किसी लाग लपेट के ग़ज़ल का वही एक शेर जो दस साल पहले मैंने अपनी शरीके हयात को नजराने में दिया था आज फिर दोहराने का जी किया है, सो दोहरा रहा हूँ......!

वो तितली की तरह पल पल ठिकाने दर ठिकाने तुम,
मगर हम भी अज़ब साइल हर एक गुंचे से बावस्ता........!


यह बावस्तगी यूँ ही चलती रहे......खुदा करे!

नवंबर 18, 2009

तज़ाद ज़िन्दगी में..........

पिछली पोस्ट कई मायनों में मेरे लिए महत्त्वपूर्ण रही........पिछली पोस्ट में मैंने कुछ हायकू आप सबको पढवाए थे......निश्चित ही हायकू लिखना एक कठिन सृजनात्मक प्रक्रिया है.....छोटे फॉर्मेट की इस विधा में लिखना अक्सर आसान नहीं होता.....कभी पूरी बात कहने में चूक हो जाती है तो कभी भाव या व्याकरण वाला पक्ष कमजोर हो जाता है....... ....मेरे उन हायकू के प्रतिउत्तर में मानोसी जी ,उड़न तश्तरी, शरद जी और गिरिजेश राव की प्रतिक्रिया सचमुच सीख देने वाली थीं.......गौतम राजरिशी साब की प्रतिक्रिया हौसला बढ़ने वाली थी......सत्यम, शिवम्, पी सिंह ने उत्साह वर्धन किया.......आप सभी का आभार! हायकू लिखने का क्रम जारी है कुछ पढने- पढ़ाने लायक लिख लूँगा तो आप को पेश करूंगा ...फिलहाल तो एक ग़ज़ल आप सबको पेश रहा हूँ......!

आखिर तज़ाद ज़िन्दगी में यूँ भी आ गए !
फूलों के साथ खार से रिश्ते जो भा गए !!

ऐसे भी दोस्त हैं कि जो मुश्किल के दौर में,
सच्चाइयों से आँख मिलाना सिखा गए !!

जिस रोज़ जी में ठान लिया जीत जायेंगे,
यूँ तो हज़ार मर्तबा हम मात खा गए !!

आँखों में ज़ज्ब हो गया है इस तरह से तू,
नींदों के साथ ख्वाब भी दामन छुड़ा गए !!

नादानियों की नज्र हुआ लम्ह-ए - विसाल,
गुंचों से लिपटी तितलियाँ बच्चे उड़ा गए!!

तुम क्या गए कि जीने की वज्हें चली गयीं,
वो राहतें, वो रंगतें , आबो- हवा गए !!

नवंबर 10, 2009

मेरे हायकू .......

हायकू ऐसी विधा है जिसे भारत में और खासकर हिंदी भाषा में लोकप्रिय होने में वक्त नहीं लगा ........... 5-7-5के फॉरमेट में बंधी इस कविता की प्रवृत्ति बहुत ही नुकीली और बेहद प्रभावशाली है......मूलत: जापानी भाषा की कविता को हिंदी कलेवर में अपनाने और उसे लोकप्रिय बनाने के आन्दोलन में बहुत से नाम आते हैं....उनका ज़िक्र और उनके बारे में फिर कभी तफ़सील से बात करूंगा फ़िलहाल तो अपने कुछ मेरे हायकू पोस्ट कर रहा हूँ.....नया स्वाद है हो सकता है, कुछ कसैला भी लगे....!

1

आसमान में,

सूरज चाँद तारे,

किसने टाँके ?

2

एक तरफा,

फैसला तुम्हारा भी,

मुझे मंज़ूर।

3

मिले हो तुम,

फ़िर से महेकेगी,

ये रात रानी।

4

अन्नान बोले-

अगला युद्ध होगा,

पानी के लिए।

5

टूटे सम्बन्ध,

लाख चाहो मगर,

जुड़ते नही।

6

भरी भीड़ में,

हरेक पे हावी था,

अकेलापन।

7

अखबार में,

खबरें नही ,सिर्फ़

विज्ञापन हैं।

8

पैसा नही है

सब कुछ, सिर्फ़ है

हाथ का मेल।

9

कागजी फूल

ही सजते हैं अब ,

गुलदानों में

10

कैसे देखूं मैं

तुम्हारी नज़रों से ,

कायनात को।

11

मुश्किल वक्त,

ज़रूर गुजरेगा,

धैर्य तो रखो।

12

कोशिश तो की,

मगर उड़ा न सका,

फ़िक्र धुँए में।

13

भीग जाता हूँ

अंतर्मन तक मैं

भीगी ऋतु में।
14

स्वाद रिश्ते का

काश मीठा हो जाता,

चलते वक्त।

15

अवसर था-

खो दिया ,अब तो था

पछताना ही।

16

थक जाती हैं

राहें भी,साथ -साथ

चलते हुए।

17

सिर्फ़ अच्छाई

याद रह जाती है

मौत के बाद।

नवंबर 06, 2009

नयी ताज़ा ग़ज़ल..........

मित्रों ने कहा कि बहुत दिनों से अपनी कोई ग़ज़ल पोस्ट नहीं की....क्या कहता उनसे....असल में खुद को कहाँ तक पोस्ट में रखता रहूँ.....दुनिया जहान में इतने लोग -इतने किस्से -इतनी घटनाएँ हैं कि उनके बारे में लिखते हुए ही आनंद महसूस करता हूँ....बहरहाल अपने दोस्त मनीष की मांग पर बहुत संकोच के साथ एक नयी ताज़ा ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ.......................शायद पसंद आये............!

तेरी खातिर खुद को मिटा के देख लिया !
दिल को यूँ नादान बना के देख लिया !!

जब जब पलकें बंद करुँ कुछ चुभता है,
आँखों में एक ख्वाब सजा के देख लिया !!

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है,
बच्चों को चुपचाप बिठा के देख लिया !!

कोई शख्स लतीफा क्यों बन जाता है,
सबको अपना हाल सुना के देख लिया !!

खुद्दारी और गैरत कैसे जाती है,
बुत के आगे सर को झुका के देख लिया !!

वस्ल के इक लम्हे में अक्सर हमने भी,
सदियों का एहसास जगा के देख लिया !!