इतिहास में उल्लेख मिलता है कि कलिंग युद्ध के बाद जब सम्राट अशोक बुद्ध धर्म की तरफ आकर्षित हुए तो उन्होंने इस वृक्ष के महत्त्व को जाना. सम्राट अशोक इस वृक्ष के नीचे बैठकर आनंद का अनुभव करते थे .........उनकी रानी तिस्सरक्षिता ने चिढ़ कर इसे कटवा दिया था .........किन्तु इस वृक्ष की एक टहनी सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री संघमित्रा और महेंद्र बुद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लए श्रीलंका ले गए थे............जिसे अनुराधापुर में रोपित किया गया था. कालांतर में यही वृक्ष बोधि- वृक्ष के ही रूप में प्रसिद्द हुआ. .......... अनुराधापुरम का यह बोधिवृक्ष दुनिया के प्राचीनतम वृक्ष के रूप में जाना जाता है. यह वृक्ष आज भी बुद्ध परंपरा में श्रद्धा का महत्त्वपूर्ण केंद्र है.
गया के बोधि वृक्ष की ही एक शाखा श्रावस्ती में भी है.............ऐसा माना जाता है कि बुद्ध के जीवित होने के दौरान ही बोधगया के बोधि वृक्ष से एक शाखा लेकर श्रावस्ती के जेतवन विहार के प्रवेश द्वार पर रोपित किया गया था जो कि “आनंद बोधि वृक्ष” के नाम से जाना जाता है. दरअसल यह वृक्ष “अनाथ पिण्डक” ने रोपित किया था जो बाद में “आनंद बोधि” के नाम से प्रसिद्द हुए. यह वृक्ष जेतवन के प्रवेश द्वार के निकट है. माना जाता है कि महात्मा बुद्ध ने एक रात्रि को इस वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया था. लोग मानते हैं कि इस वृक्ष के नीचे ध्यान लगाने वाले को पुण्य प्राप्त होता है.

