जून 10, 2011

हुसैन को याद करते हुए......!!!!

कल जब खबर आई कि मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन नहीं रहे तो एक टीस सी उठी. वैसे मैं पेंटिंग्स के बारे में कोई बड़ा पारखी नहीं हूँ........ लेकिन जबसे होश संभाला तब से पेंटिंग्स के बारे में जब भी लिखा पढ़ा तो मक़बूल फ़िदा हुसैन का ज़िक्र ज़रूर आया. याद आया कि जब वर्ष 2000 में जब उनकी फिल्म 'गजगामिनी' रिलीज हुयी तो उत्सुकतावश मैंने भी यह फिल्म देखी, क्रिटिक्स ने इस फिल्म को कोई खास तवज्जो नहीं दी थी. मुझे भी कोई ख़ास नहीं लगी थी मगर उस वक्त भी इस फिल्म के बारे में मेरी यह पुख्ता राय थी कि इस फिल्म को यदि एक कलासृजक की भावनाओं से जुडकर देखने का एहसास रखा जाये तो फिल्म अच्छी लगेगी............. !!!! बहरहाल जो गुज़र गया सो गुज़र गया . एक कलाकार को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि........!

भारत के पिकासो कहे जाने वाले मक़बूल फ़िदा हुसैन का जन्म महाराष्ट्र के पंढ़रपुर में 17 सितंबर 1915 को हुआ था. एमएफ़ हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली. हुसैन 1940 के दशक के अंत से ही प्रसिद्धि पा चुके थे. वह 1947 में फ्रासिस न्यूटन सूजा द्वारा स्थापित प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप में शामिल हो गए. यह ग्रुप भारतीय कलाकारों के लिए नई शैलियाँ तलाशने और बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा स्थापित परंपराओं को तोड़ने के इच्छुक युवा कलाकारों के लिए बनाया गया था. युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे. वर्ष 1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी. उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर.शोर से चर्चा शुरू हो गई. वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया. वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर' बनाई. यह फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने 'गोल्डन बीयर' पुरस्कार जीता.

वर्ष 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिकासो के साथ विशेष निमंत्रण देकर बुलाया गया .1973 में उन्हें पद्मभूषण और वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया. भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया . 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया. क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी. इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए . उनकी एक कलाकृति क्रिस्टीज की नीलामी में 20 लाख डॉलर में और 'बैटल ऑफ गंगा एंड यमुना- महाभारत 12' वर्ष 2008 में एक नीलामी में 16 लाख डॉलर में बिकी यह साउथ एशियन मॉडर्न एंड कंटेम्परेरी आर्ट की बिक्री में एक नया रिकॉर्ड था.हालाँकि एमएफ़ हुसैन अपनी चित्रकारी के लिए जाने जाते रहे किन्तु चित्रकार होने के साथ.साथ वे फ़िल्मकार भी रहे. मीनाक्षी, गजगामिनी जैसी फ़िल्में बनाईं. उनका माधुरी प्रेम भी ख़ासा चर्चा में रहा . शोहरत के साथ साथ विवादों ने भी उनका साथ कभी नहीं छोड़ा. जहाँ फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत का पिकासो घोषित किया वहीं वर्ष 1996 में हिंदू देवी.देवताओं की उनकी पेंटिग्स को लेकर काफ़ी विवाद हुआ, फलस्वरूप कई कट्टरपंथी संगठनों ने तोड़.फोड़ कर अपनी नाराजगी ज़ाहिर की .जब किसी ने उनसे पूछा कि आपकी चित्रकारी को लेकर हमेशा विवाद होता रहा है, ऐसा क्यों................? उनका जवाब था 'ये मॉर्डन आर्ट है. इसे सबको समझने में देर लगती है. फिर लोकतंत्र है. सबको हक़ है. ये तो कहीं भी होता है. हर ज़माने के अंदर हुआ है. जब भी नई चीज़ होती है. उसे समझने वाले कम होते हैं. ' हुसैन साहब का ये अंदाज़े-बयां जताता है कि आलोचनाओं से वे कभी नहीं डरे....... अपनी बात भी धड़ल्ले से कही. बहुत कम लोगों को पता है कि जब मुग़ल.ए.आज़म बन रही थी तो निर्देशक के. आसिफ़ साहब ने युद्ध के दृश्य फ़िल्माने से पहले युद्ध और उसके कोस्ट्यूम वगैरह के स्केच हुसैन साहब से ही बनाये थे. जब आसिफ साहब ने 'लव एंड गॉड' बनाई तो आसिफ़ साहब ने 'स्वर्ग' के स्केच भी उन्ही से बनवाए. मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के बड़े प्रशंसक एमएफ़ हुसैन ने उन्हें लेकर 'गज गामिनी' नाम की फ़िल्म भी बनाई . इसके अलावा उन्होंने तब्बू के साथ एक फ़िल्म 'मीनाक्षी- अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ बनाई .एक और विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब पिछले साल जनवरी में उन्हें क़तर ने नागरिकता देने की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था.

हैरानी की बात यह है कि हुसैन साहब ने कला का कहीं से भी विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था. अपने कला जीवन की शुरूआत उन्होंने मुंबई में फिल्मों के होर्डिंग पेंट करके की जिसमे उन्हें प्रति वर्ग फुट के चार या छह आना मिलते थे. फरवरी 2006 में हुसैन पर हिंदू देवी.देवताओं की नग्न तस्वीरों को लेकर लोगों की भावनाएं भड़काने का आरोप भी लगा और हुसैन के खिलाफ इस संबंध में कई मामले चले. इस फक्कड़ी चित्रकार ने इसकी परवाह न करते हुए अपने काम से काम रखा. उन्हें जान से मारने की धमकियाँ भी मिलीं. उन्होंने अपनी पसंदीदा अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को लेकर 'गजगामिनी' बनाई तथा कुछ और फिल्मों पर भी काम किया. माधुरी को लेकर 'गजगामिनी' फिल्म के बाद हुसैन ने तब्बू को लेकर 'मीनाक्षी- ए टेल ऑफ थ्री सिटीज ' का निर्माण किया. हुसैन ने अभिनेत्री अमृता राव की भी कई तस्वीरें बनाईं. विवाद हमेशा हुसैन के साथ रहे. कुछ समय पहले जब केरल सरकार की ओर से प्रतिष्ठित राजा रवि वर्मा पुरस्कार उन्हें दिया गया तो मामला कोर्ट कचहरी तक जा पहुंचा. हुसैन को अम्मान स्थित रॉयल इस्लामिक स्ट्रैटेजिक स्टडीज सेंटर ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली 500 मुस्लिमों की सूची में भी शामिल किया. उन्हें बर्लिन फिल्म समारोह में उनकी फिल्म ' थ्रू दि आईज ऑफ ए पेंटर' के लिए गोल्डन बीयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. वह 1971 में साओ पाओलो आर्ट बाईनियल में पिकासो के साथ विशेष आमंत्रित अतिथि थे.

न केवल भारतीय पेंटिंग विधा बल्कि पूरा भारतीय समाज इस कलाकार का इसलिए भी ऋणी रहेगी क्योंकि इस तल्ख़ तेवर वाले चित्रकार ने भारतीय कला को वैश्विक बाज़ार में स्थापित कर नया रेकोर्ड रचा. व्यक्ति और चित्रकार की स्वतंत्रता का उद्घोष करते हुए हवा के विरुद्ध अपना परचम फहराने की कुव्वत रखने वाले इस महान चित्रकार की कला के प्रति निष्ठा और समर्पण को को सलाम............ !!!!!


(**तस्वीर गूगल, सन्दर्भ-बीबीसी)


मई 05, 2011

एक नयी ग़ज़ल !!


दोस्तों, इधर काफी मसरुफियात रही .... ब्लॉग पर भी कम ही आना जाना हो पाया. खैर, फिर से इस क्रम को लगातार बनाये रखने की जद्दोजहद में एक ग़ज़ल हो गयी है. अरसे बाद हुयी इस ग़ज़ल को पेशे खिदमत कर रहा हूँ .......!

सिर्फ ज़रा सी जिद की खातिर अपनी जाँ से गुज़र गए,
एक शिकस्ता किश्ती लेकर हम दरिया में उतर गए !!

तन्हाई में बैठे बैठे यूँ ही तुमको सोचा तो,

भूले बिसरे कितने मंज़र इन आँखों से गुज़र गए !!


जब तक तुम थे पास हमारे नग्मा रेज़ फज़ाएँ थीं,

और तुम्हारे जाते ही फिर सन्नाटे से पसर गए !!


हीरें भी क्यूँ शर्मिंदा हों नयी कहानी लिखने में,

जब इस दौर के सब राँझे ही अहदे वफ़ा से गुज़र गए !!

हर पल अब भी इन आँखों में उसका चेहरा रहता है,

कहने को मुद्दत गुज़री है उसकी जानिब नज़र गए !!


मज़हब, दौलत, जात, घराना, सरहद, गैरत, खुद्दारी

एक मुहब्बत की चादर को कितने चूहे कुतर गए !!


उसकी भोली सूरत ने ये कैसा जादू कर डाला,

उससे मुख़ातिब होते ही सब मेरे इल्मो हुनर गए !!

अप्रैल 14, 2011

लाइव मैनपुरी मुशायरा (पार्ट-2)



............ मुशायरा परवान चढ़ चुका था अब उस्ताद शायरों की बारी थी. नाज़िम मुशायरा ने माइक पर अकील नोमानी को दावत दी. इधर बीते कुछ बरसों में अकील नोमानी, मंच मुशायरों के चर्चित नाम रहे हैं. अकील नोमानी ने ’’ अपने काबू से निकल जाने को जी चाहता है, गिरते गिरते भी संभल जाने को जी चाहता है. लाख मालूम हों झूठे हैं दिलासे लेकिन, बाज़ औकात बहल जाने को जी चाहता है. ’’ कलाम सुनाया तो सामयीन की आखिरी हद तक वाह-वाह का शोर गूंज उठा. पहले तहत और फिर तरन्नुम............................ दोनों तरीके से अपनी गजलों को अकील नोमानी ने सुनाया. सामयीन की मांग पर उन्होंने अपनी गजल ’’महाजे-जंग पर अक्सर बहुत कुछ खोना पड़ता है, किसी पत्थर से टकराने को पत्थर होना पड़ता है. खुशी गम से अलग रहकर मुकम्मल हो नहीं सकती, मुसलसल हँसने वालों को भी आखिर रोना पड़ता है. मैं जिन लोगों से खुद को मुख्तलिफ महसूस करता हूँ, मुझे अक्सर उन्हीं लोगों में शामिल होना पड़ता है .’’ सुनायी तो मंच उनकी जिन्दाबाद की आवाजों से गूंज उठा.


अब तक मेहमान शायरों का तआर्रूफ कराते हऐ उन्हें माइक पर दावत देने में मसगूल नाजिम मंसूर उस्मानी को अपना कलाम सुनाने के लिये जब डा0कलीम कैसर ने दावत दी तो माहौल और भी खास हो उठा. एक मुददत से मंसूर उस्मानी मुशायरों के खास नाजिम (संचालक) रहें हैं. देश से लेकर विदेशों में चाहे सऊदी अरब हो ,बहरीन हो,कनाडा हो या अमेरिका...........हरेक जगह मुशायरों में उनकी निजामत ने अपनी कामयाबी का परचम फहराया है. वास्तव में निजामत मुशायरे की कामयाबी -नाकामयाबी बहुत बड़ी वज़ह होती है....................... मंसूर साहब ने यह जिम्मेदारी अपने कन्धों पर जब जब उठायी है, मुशायरों में कामयाबी की नई इबारत गढ़ी है. बहरहाल मंसूर साहब ने ’’चाहे दिल ही जले रोशनी के लिये , हम सफर चाहिये जिन्दगी के लिये. दुश्मनी के लिये सोचना है गलत, देर तक सोचिये दोस्ती के लिये." और " कभी कभी तो हमें दिल ने ये मलाल दिया , तुम्हारी याद भी आई तो उसको टाल दिया. दिलों की बात में दिल्ली को जोड़कर यारों, गजल को हमने बड़ी कशमकश में डाल दिया. " गजल पढ़कर अपने हुनर का सबूत पेश किया।


मुशायरा अपने अन्तिम पड़ाव में था ........... आवाज़ दी गयी मेहमान शायरा इशरत आफरीन को . मैनपुरी मुशायरे के लिए मोहतरमा इशरत आफरीन अमेरिका से आयी थीं. टेक्सास यूनीवर्सिटी की हेड ऑफ़ उर्दू डिपार्टमेंट और शायरी की एक बड़ी शख्सियत मोहतरमा इशरत आफरीन ने संयोजक हृदेश सिंह के महज़ एक अनुरोध पर उन्होंने हैदराबाद का मुशायरा छोड़कर मैनपुरी आना मन्जूर किया था. उपस्थिति सामयीन ने उनकी भारत आमद का खड़े होकर इस्तकवाल किया . खुद मोहतरमा इशरत आफरीन ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुये शानदार शेर सुनाये. उनकी गजल ’’भूख की कड़वाहट से सर्द कसीले होंठ खून उगलते, सूखे, चटखे, पीले होंठ. टूटी चूड़ी ठंडी लड़की बागी उम्र, सब्ज़ बदन पथराई आँखें नीले होंठ. सूना आँगन तनहा औरत लंबी उम्र,ख़ाली आँखें भीगा आँचल गीले होंठ’’ ने बैठी हुयी महिला श्रोताओं को खास तौर पर आकर्षित किया. ग़ज़ल में फेमिनिस्ट मूवमेंट की बड़ी लम्बरदार के रूप में पहचानी जाने वाली मोहतरमा इशरत आफरीन ने " लड़कियां माँओं जैसा मुकद्दर क्यों रखती हैं, तन सहरा और आँख समंदर क्यों रखती हैं. माँए अपने दुःख की विरासत किसको देंगी, संदूकों में बंद ये जेवर क्यों रखती हैं." सुनकर सामईन को दीवाना बना दिया. उन्हें सुनकर लगा कि गजल पढ़ने का शऊर तो कोई मोहतरमा इशरत आफरीन से सीखे। अगर महान गजल गायक जगजीत सिंह ने उनकी गजल गाई हैं, तो उनका चुनाव कहीं से गलत नहीं है. उन्होंने मैनपुरी के इस मंच के माध्यम से पूरे आवाम को अपनी मेहमान नवाजी का शुक्रिया कहा.


अब बारी थी मुशायरे की शान, हिन्दुस्तान के अजीम शायर और इस मुशायरे के सदर-ए-मोहतरम ज़नाब वसीम बरेलवी साहब का. नाजिम ने ज़नाब वसीम बरेलवी को माइक पर आने की दावत दी तो सुबह के तीन बजे चुके थे। मगर सामयीन की बड़ी तादाद उन्हें सुनने के लिये अभी तक जमी हुयी थी. वसीम साहब ने मंच पर आते ही मैनपुरी की जनता को सलाम करते हुये एक से बढ़कर एक शेर पढ़े " शाम तक सुबह की नजरों से तर जाते हैं, इतने समझौंतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं. इक जुदाई का वह लम्हा कि जो मरता ही नहीं, लोग कहते थे कि सब वक्त गुजर जाते हैं" जैसे शेरों से आगाज़ कर उन्होंने जनता की मांग पर " उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है. नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये, कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है. थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे , सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है. बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता, मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है. सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का, जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है." सुनाया. अगले एक घन्टे तक वे बिना रूके एक से बढ़कर एक शेर से भीड़ को नवाजते रहे. "कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है, ये सलीक़ा होए तो हर बात सुनी जाती है. जैसा चाहा था तुझेए देख न पाये दुनिया, दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है. अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ , जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है " जैसे लोकप्रिय शेर कभी तहत तो कभी तरन्नुम में पढ़कर वसीम साहब अपनी मकबूलियत का एहसास करा गए.


आखिर में सुबह चार-सवा चार बजे संयोजक हृदेश सिंह ने अपनी संयोजक समिति और आयोजक समिति के साथ-साथ हाजरीन, मेहमान शायर और मोहतरम मेहमानों का शुक्रिया अदा किया तथा मुशायरे के बेहतरीन इन्जामात और सह- संयोजन के लिए स्थानीय कवि दीन मोहम्मद दीन और फ़साहत अनवर को बधाईयाँ दीं तो मैनपुरी की जनता ने भी संयोजक हृदेश सिंह का तालियाँ बजाकर सम्मान व धन्यवाद ज्ञापित किया

इस प्रकार एक अदबी मुशायरा मैनपुरी की इस प्रदर्शनी के इतिहास में सोने के अक्षरों में कैद हो गया. सच तो यह है कि यह एक ऐसा मुशायरा था , जिसे लोग लम्बे समय तक भुला नहीं पायेंगे.



अप्रैल 13, 2011

लाइव मैनपुरी मुशायरा...पार्ट-1


09 अप्रेल 2011, शनिवार स्थान कादम्बरी मंच श्री देवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी मैनपुरी समय रात 9 बजे....... जी हां यही देश -काल परिस्थितियां थीं जब इस ऐतिहासिक मंच व प्रदर्शनी में अखिल भारतीय मुशायरे का आगाज हुआ. यूँ तो मुशायरे की शमा अपने नियत समय से लगभग एक घण्टे देर से रोशन हुई........ लेकिन सामयीन की अपने शायरों को सुनने-देखने की इन्तजारी न तो गैर अनुशासित हुई, न ही उनकी आवाज शोर-शराबे में में तब्दील हुई. बहरहाल फीता काटने और शमा रोशन करने की जरूरी रस्मों के बाद निजामत जनाब मंसूर उस्मानी और सदर-ए-मुशायरे की कमान जनाब प्रो0 वसीम बरेलवी ने संभाली तो मुशायरे का माहौल एक दम से भव्य हो उठा.


निजाम ने ’नात‘ को पढ़ने के लिये जब तरन्नुम के उस्ताद शायर जनाब अकील नोमानी को पुकारा तो जनता सीधे उस रूहानी ताकत से जुड़ा हुआ महसूस करने लगी, जिसके दम पर पूरी कायनात रोशन है......."नवी का दीन यहाँ भी बहुत फल फूला, अकील इसलिए हिन्दोस्तान को भी सलाम" जैसा कलाम पेश कर अकील नोमानी ने मुशायरे का आगाज किया.


इसके बाद मेघा कसक ने अपने कलाम से पण्डाल मे उपस्थित तीन हजार की भीड़ को अपना दीवाना बना दिया. खूबसूरत आवाज और-अपने पुरकशिश अन्दाज में मेघा ने "ये हकीकत है के हम चाहें न चाहें लेकिन ज़िन्दगी मौत की आगोश में सर रखती है, भूल बैठे हो अमीरी के नशे में साहिब मुफलिसी अब भी दुआओं में असर रखती है '' सुनाकर भीड़ को दीवाना बना दिया। मेघा की तरन्नुमी लहर हालांकि ठहरने का नाम नही ले रही थी, लेकिन शायरों की लम्बी फेहरिस्त को देखते हुये इसे रोका जाना भी जरूरी था सो अगले शायर सर्वत जमाल को आवाज दी गयी.


सर्वत ने आते ही अपनी ‘फिक्र की शायरी' के हवाले से जनता को मानसिक रूप से झिंझोड़ दिया. "आराम की सभी को है आदत करेंगे क्या, ये सल्तनत परस्त बगावत करेंगे क्या. मज़हब की ज़िन्दगी के लिए खून की तलब, हम खून से नहाके इबादत करेंगे क्या. तक़रीर करने वालों से मेरा सवाल है,जब सामने कड़ी हो मुसीबत करेंगे क्या. " काफिये के नये प्रयोगों से सर्वत ने मंच को मुशायरे को ‘अदबी मुशायरे ‘ के रूप में तब्दील करने का काम किया जो मुशायरे के आखिर तक मुसलसल जारी रहा। सर्बत ने अपने कलाम से जनता को जेहनी तौर पर खुद से और अवाम की माजूदा परिस्थितियों से जोड़ लिया.


इसके बाद लखनऊ से आये युवा शायर मनीष शुक्ल ने बड़े ही प्यारे अन्दाज में "बात करने का हसीं तौर तरीका सीखा, हमने उर्दू के बहाने से सलीका सीखा" और "हमने तो पास ए अदब में बंदापरवर कह दिया, और वो समझे कि सच में बंदापरवर हो गए ", जैसे शेर पढ़कर अपने कद का एहसास दिलाया. प्रांतीय सिविल सेवा के अधिकारी मनीष शुक्ल को मैनपुरी की जनता ने हर शेर पर दाद दी. उनके हरेक शेर पर मैनपुरी की जनता ने खड़े होकर तालियां बजाकर उनका इस्तकबाल किया. जनता ने उनके शेर "आँखों देखी बात है कोई झूठ नहीं, चोट लगाकर कहते हैं कि रूठ नहीं. खुद ही भरते जाते हैं गुब्बारे को , फिर कहते हैं ए गुब्बारे फूट नहीं " को बार बार पढने की ताकीद की.


म0प्र0 उर्दू अकादमी की सचिव मोहतरमा नुसरत मेहदी ने अपना कलाम सुनाने की जैसे ही भूमिका तैयार की, उपस्थित श्रोताओं ने उनकी आमद पर देर तक तालियां बजाई. मोहतरमा मेंहदी ने भी श्रोताओं की अपेक्षाओं और मिजाज के मुताबिक कलाम पेश किया. उनकी गजल " आप शायद भूल बैठे हैं यहाँ मैं भी तो हूँ, इस ज़मीं और आसमान के दरमियाँ मैं भी तो हूँ. आज इस अंदाज़ से तुमने मुझे आवाज़ दी, यक ब यक मुझको ख्याल आया कि हाँ मैं मैं भी तो हूँ. तेरे शेरों से मुझे मंसूब कर देते हैं लोग, नाज़ है मुझको जहां तू है वहां मैं भी तो हूँ." को जनता की भरपूर दाद मिली। पहली बार मैनपुरी आई मोहतरमा मेंहदी मैनपुरी बार-बार आने का वायदा करके जनता की वाह-वाही लूट ले गयीं। अब तक साढ़े ग्यारह बज चुके थे, माहौल में शेरो शायरी का जुनून हावी हो चुका था.........


माहौल को देखते हुये ‘आमीन' के शायर आलोक श्रीवास्तव को आवाज दी गयी. उनकी निहायत सीधे-सादे अल्फाज वाली शायरी ने जनता से उन्हे ऐसे जोड़ा की गजल-दर-गजल उनकी वाह-वाही बढ़ती गयी. इंसानी रिश्तों ओर उनके नाज़ुक एहसासात की रचनाओं को सुनाकर आलोक श्रीवास्तव ने महफ़िल लूट ली. उनकी ग़ज़ल "तुम्हारे पास आता हूँ तो साँसें भीग जाती हैं, मुहब्बत इतनी मिलती है की आँखें भीग जाती हैं.तबस्सुम इत्र जैसा है हंसी बरसात जैसी है, वो जब भी बात करता है तो बातें भीग जाती हैं. ज़मीं की गोद भरती है तो कुदरत मुस्कुराती है, नए पत्तों की आमद से ही शाखें भीग जाती हैं" बहुत पसंद की गयी.


इसके बाद मुशायरा ख्यातिलब्ध और सीनियर शायरों की तरफ मुखातिब हुआ. मंचासीन डा0 कलीम कैसर ने सामयीन के मिजाज और उनकी नब्ज को पकड़ते हुये अपना कलाम “ चाहतों की ज़रा सी दस्तक पर दिल का राज़ खोल सकता है,इश्क ऐसी ज़बान है प्यारे जिसको गूंगा भी बोल सकता है “ और “ज़रूरी है सफ़र लेकिन सफ़र अच्छा नहीं लगता , बहुत दिन घर पे रह जाओ तो घर अच्छा नहीं लगता” पेश किया. डा0 कैसर मंच के बड़े शायर हैं, .................उन्होने मैनपुरी की जनता को उनके ‘अदबी टेस्ट‘ के लिये बार-बार बधाई दी और कहा कि यह मुशायरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस मुशायरे ने यह साबित कर दिया है कि यदि अदबी मुशायरे आयोजित किया जाएं तो जनता उसे आंखो-आंख लेती है.


माहौल में पसरी गंभीरता को हंसी-मंजाक के रंगों से भिगोने के लिये स्थानीय कवि जयेन्द्र पाण्डेय ‘लल्ला‘ और हजल उस्ताद शरीफ भारती को बुलाया गया. शरीफ भारती ने आधे-पौन घण्टे तक अपने अन्दाज से मौजूद तादाद को पेट पकड़ने पर मजबूर कर दिया. किसी चोर के घर के घर में घुसने पर नामचीन शायरों की प्रतिक्रिया का अन्दाज करने वाले उनकी प्रस्तुति ने सामयीन को हंसते-हंसते लोट-पोट कर दिया. " छत पे हम समझे तुझे वो तेरी अम्मी निकली, इश्क क्या ख़ाक करें दूर का दिखता ही नहीं " अपने गजब के ‘सेंस आफॅ ह्यूमर‘ और 'चालू जुमलों' से जनता को गुदगुदा कर जब वे वापस हुये तो जनता ने उन्हे एक बार और बुला लिया.


इस मजाहिया मंजर के बाद मदन मोहन दानिश को माइक पर दावत दी गयी. दानिश मौजूदा दौर के सर्वाधिक ‘फिक्रमंद शायर' के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। दानिश ने “ डूबने की जिद पे कश्ती आ गयी, बस यहीं मजबूर दरिया हो गया. गम अँधेरे का नहीं दानिश मगर वक्त से पहले अँधेरा हो गया “और “ गुज़रता ही नहीं वो एक लम्हा, इधर मैं हूँ कि बीता जा रहा हूँ “ पढ़कर जनता की तालियां लूटीं.

*अगली किस्त में मंसूर उस्मानी, इशरत अफरीन और वसीम साहब के कलाम के बारे में रिपोर्टिंग....!

अप्रैल 07, 2011

मैनपुरी मुशायरा (दूसरी किस्त) ..... !!


मैनपुरी की ऐतिहासिक श्रीदेवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी 2011में आयोजित होने वाले मुशायरे में आने वाले मेहमान शायरों की परिचय श्रृंखला में कल मैंने आपको तीन ग़ज़लकारों से तआर्रुफ़ कराया था....इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं आज उन चार शायरों के विषय में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जो इस मुशायरे को ख़ास बनाने के लिए अपनी आमद करेंगे....!


शुरूआत करता हूँ अपने प्रिय शायर वसीम बरेलवी साहब से- दरअसल इस मुशायरे की सदारत ज़नाब वसीम बरेलवी साहब ही करेंगे. वसीम साहब मौजूदा दौर के उन शायरों में से एक हैं जिन्होने संवेदनाओं को महत्व देते हुए अपना रचना संसार सजाया है. ‘फिक्र' की शायरी उनकी पहचान है. जीवन का दर्शन उनकी शायरी में लफ़्ज - लफ़्ज पगा हुआ है. मैं खुश किस्मत हूँ कि मुझे उनका बहुत प्यार मिला है. निहायत खूबसूरत और संजीदगी वाले इस इन्सान की मैं इसलिए बहुत इज्जत करता हूँ क्योंकि वसीम साहब एक अच्छे शायर तो हैं हीं--इन्सान उससे भी शानदार हैं. इस मुशायरे में वे ‘हैदराबाद‘ के उस मुशायरे को छोड़कर आ रहे हैं, जो शायद उनके लिए बेहतर प्लेटफार्म साबित हो सकता था पर उन्होने ‘मोहब्बत‘ का साथ दिया और हैदराबाद की बजाय मैनपुरी आना स्वीकार किया. वसीम साहब की गजलियात के विषय में तो कुछ भी लिखा ही नहीं जा सकता. कई शोध उन की शायरी पर हो चुके हैं. जगजीत सिंह, चन्दन दास और स्वर कोकिला लता जी तक वसीम साहब की शायरी के दीवाने हैं. 'आँखों आँखों रहे' और 'मौसम अन्दर बाहर के' जैसी कृतियों के सहारे उनकी रचनाएँ हम तक पहुँच चुकी हैं.... उनके बारे में लिख पाना मेरी औकात से बाहर है....फिलहाल मैं वसीम साहब वो ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ जो मुझे हमेशा जीने का रास्ता दिखाती है........-


उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,

जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है !!

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाए

कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है !!

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे

सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है !!

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता

मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है !!

सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने

जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है !!


वसीम साहब के बाद मुखातिब होते हैं अकील नोमानी की तरफ. अकील नोमानी भी मौजूदा दौर के उन शायरों में से एक है जिनके कंधो पर शायरी का भविष्य टिका हुआ है. हाल ही में उनका ‘रहगुजर‘ गजल संग्रह प्रकाशित हुआ है. अकील नोमानी एक खामोश शायर हैं. सच तो यह है कि वे जितने बड़े शायर हैं, उतनी मकबूलियत उनके हिस्से में नहीं आई. खैर...आज नहीं तो कल वक्त पहचानेगा उन्हेंऔर ज़रूर पहचानेगा....! वैसे अकील नोमानी इन सबसे बेखबर अपने सफर पर बढ़ते जा रहे हैं. उनका हर एक शेर उनके अहसासों में इंसानियत होने का सुबूत पेश करता है. अकील साहब ने इस मुशायरे में अव्वल दर्जे के शायरों को बुलाने में संयोजक का हाथ बंटाया है उसके लिए संयोजक उनके कर्जदार हैं. अकील तो सरकारी मुलाजिम हैं मगर उनकी शायरी में जो सोच है वो ऐसी है जो उन्हें कुछ ख़ास बनाती है। वे स्वयं ही अपने बारे में कहते हैं कि ‘‘मैने शेर कहते वक्त हमेशा फ़ितरी तकाजों और जबानो- बयान के सेहतमंद उसूलों का ही एहतराम किया है‘‘ तो कहीं से गलत नहीं लगता. उनकी इस बात को ये गज़ल और भी पुख्ता करती है-


महाजे़-जंग पर अक्सर बहुत कुछ खोना पड़ता है

किसी पत्थर से टकराने को पत्थर होना पड़ता है !!

ख़ुशी ग़म से अलग रहकर मुकम्मल हो नहीं सकती

मुसलसल हॅसने वालों को भी आखि़र रोना पड़ता है !!

अभी तक नींद से पूरी तरह रिश्ता नहीं टूटा

अभी आँखों को कुछ ख्वाबों की ख़ातिर सोना पड़ता है !!

मैं जिन लोगो से खुद को मुख़तलिफ़ महसूस करता हूँ

मुझे अक्सर उन्हीं लोगों में शामिल होना पड़ता है !!

किसे आवाज़ दें यादों के तपते रेगज़ारों में

यहॉ तो अपना-अपना बोझ खुद ही ढोना पड़ता है !!


बढ़ते हैं अगले नाम की तरफ....अगला नाम है मोहतरमा नुसरत मेहदी साहिबा का . नुसरत मेहदी भी उन शायरों में से एक हैं जिन्होंने पिछले दिनों में अपनी शायरी अपने कलाम की वज़ह से एक मुकम्मल जगह बनाई है. फिलहाल वे मध्यप्रदेश उर्दू अकादेमी के सचिव के पद का कार्य कर रही हैं........ वैसे मोहतरमा नुसरत मेहदी का उत्तर प्रदेश से पुराना नाता है. वे नगीना, ज़िला बिजनौर में इल्तिजा हुसैन रिज़वी के घर पैदा हुई, शुरुआती तालीम उत्तरप्रदेश में ही हुई इसके बाद वे भोपाल चलीगयीं.वे शिक्षा महकमे में वे अहम ओहदे पर रहीं हैं. उनके कलाम, कहानियांअक्सर इंग्लिश, हिन्दी और उर्दू अखबारों, मैग्ज़ीन और जरनल्स में छपती रहती है. टी.वी. और रेडियों के ज़रिये भी इनके कलाम को सुना व देखा जा सकता है. समाज सेवा के शौक के अलावा समाजी व अदबी तन्ज़ीमों से जुड़ी हुई है. घर का माहौल अदबी रहा है. इनके शौहर असद मेहदी भी कहानिया लिखतें है. वे हिन्दुस्तान के कई शहरों में मुशायरों और सेमीनारों के ज़रिये भोपाल शहर की नुमाइंदिगी कर चुकी है. मैनपुरी में वे पहली दफा अपने कलाम का परचम लहरायेगीं।


इनके साथ ही एक और आमंत्रित शायर का ज़िक्र करना चाहूँगा . वे भी युवा शायर हैं और अदब के शायर हैं. नाम है मनीष शुक्ल. मनीष सरकारी मुलाजिम हैं...वैसे अगर वे सरकारी मुलाजिम न होते तो शायद उनके लिए बहुत बेहतर होता क्योंकि तब वे निश्चित ही नामवर बड़े शायरों की फेहरिस्त में होते... खैर ! मेरा और मनीष कासाथ गत 12 बरस से है. मनीष से मेरा साथ तब से है जब हमारी नयी नयी नौकरी लगी थी . हम ट्रेनिंग में लखनऊ में थे और फिनान्सियल इंस्टिट्यूट में ट्रेनिंग ले रहे थे तभी शेर ओ शायरी के शौक ने हम को एक दूसरे के करीब ला दिया . हम लोग नैनीताल में भी ट्रेनिंग साथ साथ कर रहे थे ....तब ये शौक और परवान चढा. हम दोनों घंटो एक दूसरे को शेर ओ शायरी को शेयर करते. बहरहाल मनीष के साथ रिश्ते दिन ब दिन मजबूत हुए, मुझे ये कहने में कोई हिचक नही कि मनीष आज मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक है. मेरी पत्नी अंजू के वे मुंहबोले भाई भी हैं. उम्र में 5 बरस बड़ा होने के कारण मनीष मेरे बड़े भाई के रूप में भी है. उनकी सबसे ख़ास बात ये है की अच्छे अधिकारी होने के साथ साथ वे एक अच्छे शायर भी हैं। बड़ी खामोशी के साथ वे अपना साहित्य सृजन में लगे हुए हैं और मज़े की बात ये है की उनकी शायरी में अदब तो है ही जीवन के मूल्यों की गहरी समझ भी है. मेरे अन्य शायर दोस्तों की तरह वे भी दिखावे और मंच की शायरी से दूर रहते हैं . उनको पहली बार मंच पर लाने का काम मैंने तब किया जब मैं मीरगंज में उप जिलाधिकारी था और एक मुशायरा वहां आयोजित कराया था. 1970को उन्नाव में जन्मे मनीष शुक्ला की एक ग़ज़ल यहाँ पेश है ............निश्चित रूप से अच्छी लगेगी -


कागजों पर मुफलिसी के मोर्चे सर हो गए,

और कहने के लिए हालात बेहतर हो गए !!

प्यास के शिद्दत के मारों की अजियत देखिये ,

खुश्क आखों में नदी के ख्वाब पत्थर हो गए

ज़र्रा ज़र्रा खौफ में है गोशा गोशा जल रहे,

अब के मौसम के न जाने कैसे तेवर हो गए !!

सबके सब सुलझा रहे हैं आसमाँ की गुत्थियां,

मस'अले सारे ज़मी के हाशिये पर हो गए !!

फूल अब करने लगे हैं खुदकुशी का फैसला,

बाग़ के हालात देखो कितने बदतर हो गए !!

क्रमश: