मार्च 15, 2010

कुछ नज्में......डायरी से !

एक अरसे बाद कल अपनी डायरी लेकर बैठ गया..........ऐसा लगा कि जैसे पुराने कुछ फूल फिर से नए रंगों में खिल गए...........चंद नज्में जो कुछेक बरस पहले लिखी थीं ........फिर से रोशन सी हो गयीं........जी चाहा कि इन कुछ नज्मों को क्यों न आप सबके हवाले कर दूं ..........ग़ज़लों को तो अपने ब्लॉग पर लिखता ही रहता हूँ, कुछ नज्में आपको नज्र करने की हिमाकत करने का जी चाह है.........सो खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ......मुलाहिजा फरमाएं.......!

1-याद
बस
एक लम्हा
गुज़ारा था तेरे साथ,
एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !
काश !
एक उम्र
तेरे साथ
गुजरने पाती..................!

***************
2-गिरहें ......!
तुम्हारे
जिस्म में
वो कौन सा
जादू छुपा है कि
जब भी तुम्हें
एक नज़र देखता
हूँ........
मेरी निगाह में
यक-ब- यक
हजारों
रेशमी गिरहें
सी लग जाती हैं............!
****************
3-रात
वक्त के मेले में
जब भी रात
घूमने निकलती है
तो न जाने क्यूँ
वो अपने कुछ बच्चों को
जिन्हें "लम्हे" कहते हैं,
छोड़ आती है.........!
ये गुमशुदा लम्हे
जुगनू की शक्ल अख्तियार करके
बेसबब
अपनी माँ की तलाश में
भटकते रहते हैं...........,
मचलते रहते हैं............!
***************
4-अमानत
परत दर परत
तह ब तह
जिंदगी जिंदगी
.......यही एक अमानत
बख्शी है मेरे नाम
मेरे खुदा ने........!
इसी में से
ये जिंदगी
ये उम्र
तुम्हारे नाम कर दी है.......!
पर सुनो
ये तो सिर्फ पेशगी है
तुम कहो तो
ये सारी
अमानत
तुम्हारे नाम कर दूं.....!


25 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

bahut khubsurat kshanikaayen..badhai

अभिषेक ओझा ने कहा…

याद तो गजब ही है:

"एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !"
बाकी भी कमाल !

सत्येन्द्र सागर ने कहा…

आपकी गजले तो वाकई कमल की है जो दिल को छू जाती है . आपकी बावस्ता जो अपने मुझे कानपूर में बतौर तोहफा दी थी आज भी संभाल कर राखी है. जब भी आपको यद् करता हूँ तो बावस्ता को एक नज़र देख लेता हूँ. wish u best of luck

वाणी गीत ने कहा…

एक याद के लम्हे के सहारे पूरी उम्र गुजार देने का ख्याल ही बड़ा रूमानी है ....
तिस पर रेशमी गिरहें ....
मां की तलाश में भटकते मचलते लम्हे ...
उम्र क्या पूरी जिंदगी तेरे नाम कर दूं ....

उम्दा खयाल ....!!

बेचैन आत्मा ने कहा…

ये गुमशुदा लम्हे
जुगनू की शक्ल अख्तियार करके
बेसबब
अपनी माँ की तलाश में
भटकते रहते हैं...........

...बहुत खूब.

Pari ने कहा…

lovely..........

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

योगेश स्वप्न ने कहा…

wah wah, gagar men sagar hai ji,.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बेहतरीन...लाजवाब...दिल को छूने वाली रहीं चारों नज़्म.

शरद कोकास ने कहा…

बेहतरीन नज़्मे।

रचना दीक्षित ने कहा…

जब भी रात
घूमने निकलती है
तो न जाने क्यूँ
वो अपने कुछ बच्चों को
जिन्हें "लम्हे" कहते हैं,
छोड़ आती है.........!
सारी ही नज्में बेहतरीन हैं पर इस में तो कुछ ख़ास बात ही है

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह...वाह....वाह...एक से बढ़ कर एक नज्में...भाई वाह...आप अपनी डायरी के पन्ने रोज़ ही पलटते रहें...तो सच में आनंद आ जाये...
नीरज

sumati ने कहा…

hazaron reshmi..
.. girhen si lag jati hai ...
.wah kub.

.kamal pehle se hi karte aaraheho ....main to janta tha ...baki bhi dekhlen

sumati

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

’गिरहें’ बहुत खूबसूरत लगी ! डायरी के पन्ने बहुत उम्दा है ब्लॉगरों के ! दूसरी डायरी के पन्ने पढ़ रहा हूँ आज, पहले गौतम साहब की, फिर आपकी ।

KESHVENDRA ने कहा…

Pawan Bhai, Bahut hi khoobsurat chhoti Nazme hain...bahut hi mohak or romantic kalpana hai aapki..aasha hai ki gazlon ke sath-sath ab aap apni Nazmon ko bhi samay-samay par hame padhaya karenge..

BrijmohanShrivastava ने कहा…

चारों बहुत उम्दा

गौतम राजरिशी ने कहा…

अरे वाह-वाह! क्या बात है मजिस्ट्रेट साब...भई क्या बात है। डायरी के इन पन्नों को सलाम है। चारों नज़्मों की अदायें मन मोह गयीं, लेकिन दिल अटका लिया है "गिरहें" ने। निगाहों में हजारों रेशमी गिरहें लग जाने वाला बिम्ब...वल्लाह!

ब्लौग-जगत में पुरानी डायरियों का मौसम लौटा है, लगता है।

ज्योति सिंह ने कहा…

sabhi nazme laazwaab
जब भी रात
घूमने निकलती है
तो न जाने क्यूँ
वो अपने कुछ बच्चों को
जिन्हें "लम्हे" कहते हैं,
छोड़ आती है.........!bahut khoobsurat.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

सिंहजी,
आप मेरे ब्लॉग पर पधरे और अपने मंतव्य से मुझे अभिभूत कर गए... आभारी हूँ !
अनेक शुभकामनाएं !
--आनंद.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

आप कम लिखते हैं लेकिन बहुत बढ़िया लिखते हैं. गजल या नज्म जो भी कहिये बहुत सुन्दर हैं. डायरी के सफे यूं ही पढ़ाते रहें.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

भैया ,
क्या कहूँ !
अदा-ए-नज्म देख रहा हूँ आपकी !
.
@ याद ,
हमारे मिलने के बहुत कम वक़्त का बहुत बड़ा हिस्सा
यूँ ही गुजर गया | ( कुंवरनारायण )
@ गिरहें ,
जिस्म के जादू की गिरहें खुलती कहाँ है , इस तरह !
उम्र बढ़ने के साथ ज्यों ही नजरें कमजोर पड़ती जाती हैं , ये
गिरहें और भी आभ्यंतरीकृत होने लगती हैं , हाँ तब मजबूरी
हो जाती है इश्के-हकीकी रूप देने की !
फिलहाल अभी वैराग्य लाने की कोई जरूरत नहीं दिख रही है ! :)
@ रात ,
रात के वक़्त का जुगनुवों से तुक-विधान रुचिकर लगा !
@ अमानत ,
हम तो बैठ कर 'चक्रवृद्धि'-ब्याज का ही हिसाब लगा रहे हैं ! :)
.
नज्मों में भी आप बड़े सहज रहते हैं , अच्छा लगता है पढ़कर ! आभार !

psingh ने कहा…

बहुत सुन्दर नज्म गहरे भाव लिए हुए
बस
एक लम्हा
गुज़ारा था तेरे साथ,
एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !
बहुत बहुत आभार ...........

Vijay ने कहा…

आपके ब्लॉग पर विसित करने पर मैं कुछ ऐसे महसूस करता हूँ
" आपके दिल से एक से एक शायरी और गजले अपने दोस्तों पर आप कुर्बान करते रहतें हैं,
हम सब आपके चाहने वाले तो मुक्कदर के सिकंदर निकले ||

regards/vijay/

mridula pradhan ने कहा…

bahut khoob.

स्वाति ने कहा…

एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !

गजब की प्रस्तुति है: