अक्टूबर 24, 2011

अमृतसर के बहाने इतिहास से गुज़रते हुए.....!



माता वैष्णों देवी की इस यात्रा के बाद हमारा अगला पड़ाव अमृतसर था. जम्मू से एन.एच. से होते हुए लगभग 5 घण्टे के सफर के बाद हम देर रात अमृतसर पहुंचे. पहली नजर में ही अमृतसर हमें बडा सुन्दर-सुन्दर सा लगा. जब हम अमृतसर पहुंचे तो आधी रात गुजर चुकी थी, रात का एक बज रहा था..... लेकिन शहर के रास्तों पर सन्नाटे की जगह पर्याप्त हलचल थी. सडकें कुछ चौडी-चौडी थी, रास्तों के किनारे बने ढ़ाबों पर अभी तक ठीक ठाक भीड़ थी. थकान की वज़ह से सुबह का कार्यक्रम बनाकर हम लोग सो गए।


हमारे एजेण्डे के मुताबिक सुबह का पहला काम हरमिन्दर साहब (स्वर्ण मंदिर) पर मत्था टेकना था. हम निकल लिए हरमिन्दर साहब की तरफ. रात के विपरीत अब नजारा बिल्कुल अलग था. सडकें वाहनों और खरीददारों से भरी हुई थी .... रात जो सडकें चौड़ी- चौड़ी नजर आ रही थीं , भीड़ ने उनका नजारा बिल्कुल बदल दिया था. बहरहाल तमाम संकरे बाजारों से होते हुए हम हरमिन्दर साहब पहुंचे. हरमिन्दर साहब के कारण ही अमृतसर की दुनिया भर में पहचान है. रिकॉर्ड बताते हैं कि भारत में आगरा के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं. अमृतसर का इतिहास बहुत गौरवमयी है. यह शहर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है, वो चाहे जलियांवाला बाग नरसंहार हो या मुल्क के बंटवारे के दौरान दंगे. अफगान और मुगलों कि बर्बरताओं के बावजूद इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इस शहर कि गरिमा को बनाये रखा. बहरहाल हम पहुंचे श्री हरमिंदर साहब , जिसे श्रद्धा से दरबार साहिब या स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है जो सिखों का पावनतम धार्मिक स्थल है. भौगोलिक रूप से पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है. स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं. अमृतसर का नाम अमृत सरोवर के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरु रामदास ने किया था. पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है. यहां कि अद्भुत विशेषता लंगर है जो चौबीस घंटे चलता है, जिसमें कोई भी प्रसाद ग्रहण कर सकता है. श्री हरमंदिर साहिब में ही एक जुजूबे का वृक्ष भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि जब स्वर्ण मंदिर बनाया जा रहा था तब बाबा बुद्धा इसी वृक्ष के नीचे बैठे थे और मंदिर के निर्माण कार्य पर नजर रखे हुए थे. इतिहास बताता है कि स्वर्ण मंदिर को कई बार नष्ट किया गया लेकिन भक्ति और आस्था के चलते सिक्खों ने इसे फिर पुराना रूप दे दिया. 19 वीं शताब्दी में जब अफगा़न हमलावरों ने इसे नष्ट कर दिया तो महाराजा रणजीत सिंह ने इसे न केवल दोबारा बनवाया बल्कि इसे सोने की परत से भी सजाया. पूरे स्वर्ण मंदिर में फ्लड लाइट्स की व्यवस्था की गई है जिससे शाम के समय यह स्थल बहुत ही प्रकाशमान हो जाता है. लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद अर्जुन देव ने तैयार किया था. हरमंदिर साहिब में पूरे दिन गुरबाणी (गुरुवाणी) की स्वर लहरियां गूंजती रहती हैं. मंदिर परिसर में पत्थर का एक स्मारक भी है जो, जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगाया गया है. मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्वर्ण जड़ि‍त, अकाल तख़्त है. सिक्ख पंथ से जुड़े मसलों का समाधान इसी सभागार में किया जाता है.


अकाल तख्त का निर्माण सन 1606 में किया गया था. पास में बाबा अटल नामक स्थान पर एक नौमंजिला इमारत भी है. बताते हैं कि हरगोविंद सिंह के बेटे अटल राय का जन्म इसी इमारत में हुआ था. हमने अमृतसर पर मत्था टेकने के बाद यहॉं के प्रसिद्व लंगर भोज का आनन्द लिया. क्या राजा क्या फकीर ..........समानता का असली दर्शन इस लंगर में देखने को मिला. लाखों लोगों का रोज ’लंगर छकना’ इस मंदिर की महान परम्परा है,जिस पर हम गर्व कर सकते हैं.
मंदिर में मत्था टेकने के बाद हम रवाना हुए जलियां वाला बाग की तरफ................ जलियां वाला बाग की दूरी हरमिन्दर साहब से लगभग 500 मीटर की है. हम सब इस ऐतिहासिक स्थल पर पैदल पहुंचे. इस स्थल पर पहुँचते ही हमें अद्भुत अनुभव हुआ. यह वही जगह है ,जिसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का स्वरूप निर्धारित किया था हमे याद आया कि .... जलियाँ वाला बाग़ में 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन ब्रिगेडियर जनरल डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे आन्दोलनकारियों महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था. दरअसल पहले विश्व युद्ध में भारतीय नेताओं और जनता ने ब्रिटिश हुकूमत का साथ यह सोच कर दिया था कि युद्ध समाप्त होने पर ब्रिटिश सरकार भारतीय स्वतंत्रता की दिशा में सोचेगी मगर परंतु ब्रिटिश सरकार ने इसके विपरीत जाकर मॉण्टेगू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार लागू कर दिए जो इस भावना के विपरीत थे. पूरे देश में इन सुधारों का विरोध किया गया किन्तु पंजाब में यह विरोध कुछ अधिक बढ़ गया. भारत में, विशेषकर पंजाब और बंगाल में ब्रिटिशों का विरोध किन विदेशी शक्तियों की सहायता से हो रहा था, यह पता लगाने के लिए 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक सेडीशन समिति नियुक्त की गई . इस समिति के सुझावों के अनुसार भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का विस्तार कर के भारत में रॉलेट एक्ट लागू किया गया था, जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था. इस एक्ट के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को इस प्रकार के अधिकार दिए गए कि जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी, किसी भी भारतीय पर बिना जवाबदेही दिए हुए मुकदमा चला सकती थी, आदि..... इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे. यह वो समय था जब राष्ट्रीय आन्दोलन नया मोड़ ले रहा था....... अमृतसर में इस एक्ट के विरोध में लगभग करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे हुए और जनसभा की. उल्लेखनीय है कि यह आंदोलन इसलिए भी गति पकड़ गया था क्योंकि पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को इस एक्ट के तहत पहले गिरफ्तार कर कालापानी की सजा दी जा चुकी थी. जब भीड़ इकट्ठी हुयी तो इस भीड़ पर हुकूमत ने गोलियाँ चलवा दीं. तत्कालीन ब्रिटिश सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार इस गोलीबारी में 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए. राष्ट्रीय आन्दोलन का अगला चरण इसी घटना की परिणिति थे।


जलियां वाला बाग में यूँ तो काफी पर्यटक व दर्शक थे. रात में यहां लाइट-साउण्ड शो भी होता है. मगर इस स्थल को देखकर एक टीस भी उठी कि इस स्थल के संरक्षण पर यूँ तो काफी ध्यान दिया गया है, परन्तु शायद इस स्थल को और भी गरिमामयी ढंग से संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है. यही वे चन्द जगहें है जो हमारे राष्ट्र के ’वर्तमान’ का आधार है. राष्ट्रीय - शौर्यपरक इतिहास को भूलकर भला प्रगति कैसे पाई जा सकती है? जलियां वाला बाग के अन्दर गोलियों के निशान और गोली चलाने की जगह ,वो कुआ जिसमें डूबकर हजारों शहीद हुए थे......सब कुछ सुरक्षित है लेकिन शायद इन्हें और सम्मान व सरंक्षण देने की आवश्यकता है।


अमृतसर की इस पवित्र धरती पर ’लाल भवन’ देखना भी पवित्र अनुभूति रही. अमृतसर के मॉंडल टाउन में स्थिति ’लाल भवन’ एक निजी ट्रस्ट का मंदिर है, लेकिन इस मंदिर की ख्याति काफी है. इस मंदिर की स्थापना 1923 कसूर पाकिस्तान में जन्मी ’माता लालदेवी जी ’ ने 1956 में की. ट्रस्ट के अधिकारियों ने बताया कि संस्थापिका माता जी को बचपन से ही दिव्य शक्तियां प्राप्त थी, आरम्भ में यह मन्दिर एक-दो छोटे-छोटे कमरों में चला जो आज के विशाल मंदिर में परिवर्तित हो गया है. इस मंदिर में कई देवी-देवताओं के चित्र-प्रतिमा थे, सफाई-सफाई भी उच्च कोटि की थी. इस मंदिर में ’वैष्णों देवी ’ के प्रतिरूप में एक ’कत्रिम गुफा ’ का निर्माण किया गया है. जानकारी हुई है कि माता लालदेवी ट्रस्ट कई सामाजिक कार्यो को करने का काम कर रहा है।


बाघा बोर्डर की परेड और अमृतसर के खान पान - बाज़ार के विषय में कुछ और स्मृतियाँ अगले अंक में....!

अक्टूबर 18, 2011

नर्म अहसासों के साथ क्रान्ति की आवाज-‘मजाज़’


उर्दू साहित्य के ’कीट्स’ कहे जाने वाले असरार उल हक ’मजाज़’ की यह जन्मशती का वर्ष है। जन्मदिन की सौंवी सालगिरह पर इस महान उर्दू शायर को याद करते हुये यह कहना होगा कि महज 44 साल की छोटी सी उम्र में इस जहाँ से कूच करने से पहले वे अपनी उम्र से बड़ी रचनाओं की सौगात उर्दू अदब़ को दे गए। मजाज़ को इसलिये उर्दू शायरी का ‘कीट्स’ कहा जाता है, क्योंकि उनके पास अहसास-ए-इश्क व्यक्त करने का बेहतरीन लहजा़ था। मजाज़ को तरक्की पसन्द तहरीक और इन्कलाबी शायर का भी खिताब दिया जाता है। फैज अहमद फैज ने बहुत पहले कहा था कि वे क्रान्ति के ढिढो़रची की बजाय ‘क्रांति के गायक’ हैं।

मजाज़ का जन्म 19 अक्तूबर,1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रूदौली गांव में हुआ था। उनके वालिद का नाम चौधरी सिराज उल हक था। चौधरी सिराज उल हक अपने इलाके में पहले आदमी थे, जिन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की थी। वे रजिस्ट्री विभाग में सरकारी मुलाजिम थे। वालिद चाहते थे कि उनका बेटा इन्जीनियर बने। इस हसरत से उन्होंने अपने बेटे असरार का दाखिला आगरा के सेण्ट जांस कालेज में इण्टर साइन्स में कराया। यह बात कोई 1929 की है। मगर असरार की लकीरों में तो शायद कुछ और ही लिखा था। आगरा में उन्हें फानी , जज्बी, मैकश अकबराबादी जैसे लोगों की सोहबत मिली। इस सोहबत का असर यह हुआ कि उनका रूझान बजाय इन्जीनियर बनने के गज़ल लिखने की तरफ हो गया। ‘असरार’ नाम के साथ ‘शहीद’ तख़ल्लुस जुड गया। कहा जाता है कि मजाज़ की शुरूआती ग़ज़लों को फानी ने इस्लाह किया। यह अलग बात है कि मजाज़ ने उनसे इस्लाह तो कराया ,परन्तु उनकी ग़ज़लों का प्रभाव अपने ऊपर नहीं पडने दिया। यहाँ उन्होने गज़लगोई की बारीकियों और अरूज़ (व्याकरण) को सीखा । इस दौरान उनमें दार्शनिकता का पुट भी आया , जिसका उनमें अभाव था। बाद में मजाज़ लगातार निखरते गए।

आगरा के बाद वे 1931 में बी.ए. करने अलीगढ़ चले गए...... अलीगढ़ का यह दौर उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस शहर में उनका राब्ता मंटो, इस्मत चुगताई, अली सरदार ज़ाफरी , सिब्ते हसन, जाँ निसार अख़्तर जैसे नामचीन शायरों से हुआ ,इनकी सोहबत ने मजाज़ के कलाम को और भी कशिश और वुसअत बख्शी । यहां उन्होंने अपना तखल्लुस ‘मजाज़’ अपनाया। इसके बाद मजाज़ गज़ल की दुनिया में बड़ा सितारा बनकर उभरे और उर्दू अदब के फलक पर छा गये। अलीगढ़ में मजाज़ की आत्मा बसती थी। कहा जाता है कि मजाज़ और अलीगढ़ दोनों एक दूसरे के पूरक थे....... एक दूसरे के लिए बने थे। अपने स्कूली जीवन में ही मजाज़ अपनी शायरी और अपने व्यक्तित्व को लेकर इतने मकबूल हो गए थे कि हॉस्टल की लड़कियां मजाज़ के गीत गाया करती थीं और उनके साथ अपने सपने बुना करती थीं। अलीगढ़ की नुमाईश , यूनीवर्सिटी, वहां की रंगीनियों आदि को लेकर मजाज़ ने काफी लिखा-पढ़ा। मजाज़ की शायरी के दो रंग है-पहले रंग में वे इश्किया गज़लकार नजर आते हैं वहीं दूसरा रंग उनके इन्कलाब़ी शायर होने का मुज़ाहिरा करता है। अलीगढ़ में ही उनके कृतित्व को एक नया विस्तार मिला। वे प्रगतिशील लेखक समुदाय से जुड़ गये। ‘मजदूरों का गीत’ हो या ‘इंकलाब जिंदाबाद’ , मजाज ने अपनी बात बहुत प्रभावशाली तरीके से कही।

अलीगढ़ का दौर उनकी जिन्दगी को नया मोड़ देने वाला रहा। आगरा में जहां वे इश्किया शायरी तक सीमित थे, अलीगढ़ में उस शायरी को नया आयाम मिला। आगरा से अलीगढ़ तक आते आते शबाब , इन्कलाब में तब्दील हो गया। 1930-40 का अन्तराल देश दुनिया में बड़ी तब्दीलियों का दौर था। राष्ट्रीय आंदोलन में प्रगतिशीलता का मोड़ आ चुका था। साहित्यकारों की बड़ी फौज़ इन्कलाब के गीत गा रही थीं। अलीगढ़ इससे अछूता कैसे रह सकता था। अलीगढ़ में भी इन विचारों का दौर आ चुका था। तरक्कीपसंद कहे जाने वाले तमाम कवि-लेखकों का अलीगढ़ आना-जाना हो रहा था। डा0 अशरफ यूरोप से लौट आए थे, अख्तर हुसैन रामपुरी बी0ए0 करने बाद आफ़ताब हॉस्टल में रह रहे थे । सब्त हसन भी अलीगढ़ में ही थे। सज्जाद जहीर ऑक्सफोर्ड में बहुत दिनों तक रहने के बाद अलीगढ़ आ गये थे। अंगे्रजी हुकूमत के दौरान कई तरक्कीपसन्द कही जाने वाली पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होकर ’जब्त ’ हो रही थीं, जाहिर है कि इन घटनाओं का असर मजाज़ और उनकी शायरी पर पडना लाजिमी थी । डा0 अशरफ , अख्तर रायपुरी, सबत हसन, सरदार जाफरी, जज्बी और ऐसे दूसरे समाजवादी साथियों की सोहबत में मजाज भी तरक्की पसंद तथा इंकलाबी शायरों की सोहबत में शामिल हो गये । ऐसे माहौल में मजाज ने ’इंकलाब’ जैसी नज्म बुनी । इसके बाद उन्होने रात और रेल ,नजर, अलीगढ, नजर खालिदा ,अंधेरी रात का मुसाफिर ,सरमायादारी,जैसे रचनाएं उर्दू अदबी दुनिया को दीं। मजाज़ अब बहुत मकबूल हो चुके थे।

1935 में वे आल इण्डिया रेडियो की पत्रिका ‘आवाज’ के सहायक संपादक हो कर मजाज़ दिल्ली आ गये। दिल्ली में नाकाम इश्क ने उन्हें ऐसे दर्द दिये कि जो मजाज़ को ताउम्र सालते रहे। यह पत्रिका बमुश्किल एक साल ही चल सकी, सो वे वापस लखनऊ आ गए। इश्क में नाकामी से मजाज़ ने शराब पीना शुरू कर दिया। शराब की लत इस कदर बढ़ी कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मजाज़ शराब को नहीं, शराब मजाज़ को पी रही है। दिल्ली से विदा होते वक्त उन्होंने कहा-
रूख्सत ए दिल्ली! तेरी महफिल से अब जाता हूं मैं
नौहागर जाता हूं मैं नाला-ब-लब जाता हूं मैं

लखनऊ में 1939 में सिब्ते हसन ,सरदार जाफरी और मजाज़ ने मिलकर ’नया अदब’ का सम्पादन किया जो आर्थिक कठिनाईयों की वजह से ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। कुछ दिनों बाद में वे फिर दिल्ली आ गये और यहां उन्होंने ‘हार्डिंग लाइब्रेरी’ में असिस्टेन्ट लाइब्रेरियन के पद पर काम किया, लेकिन दिल्ली उन्हें रास न आई। दिल्ली से निराश होकर मजाज़ बंबई चले गए,लेकिन उन्हें बंबई भी रास न आया। बंबई की सडकों पर आवारामिजाजी करते हुये मजाज़ ने अपने दिल की बात अपनी सर्वाधिक लोकप्रिय नज्म ‘आवारा’ के मार्फत कुछ यूं कही-
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूं
जगमगाती,जागती सडकों पे आवारा फिरूं
गैर की बस्ती है,कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं
ऐ गमे दिल क्या करूं, ऐ वहशते-दिल,क्या करूं।

बम्बई से कुछ समय बाद मजाज लखनऊ वापस आ गये। लखनऊ उन्हें बेहद पसन्द था। लखनऊ के बारे में उनकी यह नज्म उनके लगाव को खूबसूरती से प्रकट करती है।

फिरदौसे हुस्नो इश्क है दामाने लखनऊ
आंखों में बस रहे हैं गजालाने लखनऊ
एक जौबहारे नाज को ताके है फिर निगाह
वह नौबहारे नाज कि है जाने लखनऊ।

लखनऊ आकर वे बहुत ज्यादा शराब पीने लगे, जिससे उनकी हालात लगातार खराब होती गई। उनकी पीड़ा ,दर्द घुटन अकेलापन ऐसा था कि वे ज्यादातर खामोश रहते थे। शराब की लत उन्हें लग चुकी थी,जो उनके लिये जानलेवा साबित हुयी। 1940 से पहले नर्वस ब्रेकडाउन से लेकर 1952 के तीसरे ब्रेकडाउन तक आते आते वे शारीरिक रूप से काफी अक्षम हो चुके थे। 1952 के तीसरे ब्रेकडाउन के बाद वे जैसे-तैसे स्वस्थ हो ही रहे थे कि उनकी बहन साफिया का देहान्त हो गया यह सदमा उन्हें काफी भारी पडा़। 5 दिसम्बर 1955 को मजाज ने आखिरी सांस ली। महज 44 साल का यह कवि अपनी उम्र को चुनौती देते हुए बहुत बडी रचनाएं कह के दुनिया से विदा हुआ।

आहंग,बोल धरती बोल, नजरे-दिल, ख्वाबे-सहर, वतन आशोब, आदि उनकी यादगार नज़्में हैं। मजाज की कविता में भावनाओं की बाढ़ है, इंसानी जज्बातों का हर रंग उसमें शामिल है चाहे वह दर्द हो या ख़ुशी , जुनूँ हो या इश्क । प्रगतिशीलता का जामा पहनकर उन्होंने कविता का नया दयार बख्शा ।

फैज उन्हें ‘क्रान्ति के गायक’ का खिताब देते हैं। इस महान शायर की जन्म शताब्दी पर स्मरण करना ’अदब’ के लिए जुरूरी है। उर्दू साहित्य के कीट्स माने जाने वाले मजाज़ को अदबी दुनिया का सलाम, जब तक उर्दू साहित्य रहेगा , मजाज़ उसी इज्ज़त -मोहब्बत के साथ गुनगुनाये जाते रहेंगे। 1945 में उनकी लिखी नज्म़ ‘बोल! अरी ओ धरती बोल’ की अभिव्यक्ति कितनी सार्वकालिक सत्य थी इसका नमूना देखिए-

बोल !अरी ओ धरती बोल
राज सिंहासन डावांडोल !
बादल बिजली रैन अंधियारी
दुख की मारी परजा सारी
बूढे़ बच्चे सब दुखिया हैं
दुखिया नर हैं दुखिया नारी
बस्ती बस्ती लूट मची है
सब बनिए हैं सब व्यापारी
बोल ! ओ धरती बोल
राज सिंहासन डावांडोल !

इस महान शायर को उनकी जन्मशती पर शत शत नमन !

अक्टूबर 11, 2011

जगजीत सिंह- "मैं भूल जाऊं तुम्हें.... ये कहाँ मुनासिब है !"


क्या पता था कि गजल सम्राट जगजीत सिंह का 3 सितम्बर 2011 तालकटोरा स्टेडियम का कन्सर्ट हमारे लिए आखिरी ’शो ’ साबित होगा (वैसे इसके बाद शायद उन्होंने एक दो शो और किये मगर इस शो में मैंने उन्हें सुना था इसलिए मैं इसे अपनी नज़र में आखरी शो मान रहा हूँ....). कल 10 बजे अचानक जब अग्रज सुमति मिश्र का मोबाईल मैसेज मिला "जगजीत सिंह इज नो मोर" तो लगा कि शरीर को अचानक लगवा मार गया हो. उस समय मैं लखनऊ में एक बैठक में था, महज तस्दीक करने के लिहाज से शायर दोस्त आलोक श्रीवास्तव (जिनकी ग़ज़ल हाल ही में जगजीत सिंह ने गायी थी...) से मैसेज करके पूछा कि "क्या यह खबर सच है "? उन्होने एक लफ्ज में ज्यों ही मुझे यह उत्तर लिखा- "जी"........ लगा जैसे सर पे आसमान गिरा हो......उनकी तबियत विगत तेईस तारीख से ख़राब थी और वे अस्पताल में भर्ती भी थे.....मगर ये सब इतनी जल्दी हो जायेगा इसका तो सपने में भी भान नहीं था.

सच तो यह है कि जगजीत सिंह को सुन-सुन कर हमारी पीढ़ी का लगाव ग़ज़ल से हुआ. ये लगाव ऐसा था कि उनकी गाई गजले हमें जुबानी याद थीं. मैं अपनी बात जानता हूँ कि पहले मैं मेंहदी हसन साहब के अलावा किसी को भी नहीं सुनता था....... सत्रह अट्ठारह बरस पहले तब के मेरे स्कूल सखा और आज के नामी पत्रकार मित्र मोहित दुबे ने जगजीत सिंह को सुनने के लिए प्रेरित किया और इसके बाद तो जगजीत सिंह से ऐसा राबता कायम हुआ कि आज तक बदस्तूर जारी है........! विगत 18 वर्षो में जगजीत सिंह साहब के लगभग पांच लाइव शो मैंने देखे........ उनका हर बार वहीं जोशीला अन्दाज, कड़क व्यवहार , मखमली आवाज ,गाते हुए बन्द आंखे- कांपते होंठ, बीच-बीच में गुदगुदाने वाले चुटकुले, जनता की मांग पर ग़ज़लों के बीच पंजाबी गीतों का तड़का .... ! मगर अब मैं महसूस करता हूँ कि यह सब एक झटके में ख़तम हो गया है......! हमारी पीढी के बहुत से लोगों के लिए तो गजल गायकी में जगजीत सिंह के अलावा ’ न भूतो न भविष्यति ’ वाली स्थिति रही..! मेरे कई मित्रों कि पसंदगी का आलम यह था कि उनके सिवा किसी और गायक की गज़लें सुनना भी उन्हें गवारा नहीं था. कैसेट के दौर से लेकर सीडी के दौर तक जगजीत सिंह ने जो भी गाया वो हमें रिलीजियसली खरीदना ही था.......!

एक नज़र इस महान गायक के जीवन वृत्त पर........ 8 फरबरी 1941 को गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे, मां बच्चन कौर थीं. उनकी आरंभिक शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. पिता से संगीत विरासत में मिला. उनके इस हुनर को गंगानगर के पंडित छगन लाल शर्मा ने तराशा....... बाद में उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं. वे 1965 में मुम्बई आ गये. शुरूआती संघर्ष के बाद 1969 में चित्रा सिंह जी के साथ परिणय सूत्र में बंध गए. उनका पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (1976)’ आया तो उनकी गायकी ने धूम मचा दी जो उनके अंत समय तक जारी रही.

फारसी- उर्दू भाषा जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली, नवाबों की महफ़िलों में इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता . उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया. जगजीत सिंह को सन 2003 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.

जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को अपेक्षाकृत उप शास्त्रीय ढंग से गाना शुरू किया तो यह बिलकुल अभिनव कदम था...... क्योंकि अब तक ग़ज़ल को परंपरागत वाद्यों के साथ ही गया जाता था मगर उन्होंने जब फ़िल्मी गानों की ऑक्टोपेड, वायलिन और कीबोर्ड पर ग़ज़ल गाने का प्रचलन तब नहीं था. कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस एल्बम में जगजीत जी ने कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल कर एक और प्रयोग किया.

कोई एक हो तो कोट करूँ उनका हरेक एलबम पुराने से बीस ही बैठता है....... सुनने वाले जानते है कि इनसाइट,सिलसिले, सजदा, मरासिम,कोई बात चले, कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स, मिर्ज़ा ग़ालिब में यह तय कर पाना नामुमकिन है कि कौन एलबम ज्यादा बेहतर है......! मीर- ग़ालिब से लेकर आज के दौर के सभी नामचीन शायरों को उन्होंने कम्पोज किया.....!

‘प्रेमगीत’ और ‘अर्थ’ ने उन्हें लोकप्रियता की पहली पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया..... बाद में उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीत और गायन दोनों किये....! लीला, ख़ुदाई, बिल्लू बादशाह, क़ानून की आवाज़जैसी फिल्मों में संगीत दिया तो वहीँ 'प्रेमगीत' का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो, 'खलनायक' का ‘ओ मां तुझे सलाम’,'दुश्मन' का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’,‘जोगर्स पार्क का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’, 'साथ साथ' का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’,'सरफ़रोश' का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’ ‘पिंजर’ का ‘हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते','तुम बिन'का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे, बाबुल का गीत गाकर फ़िल्मी गीतों को मिठास से भर दिया.

आज उनको याद करते हुए निदा फाजली साहब कि नज़्म सहसा आँखों के सामने घूम रही है.... यह नज़्म उन्होंने इनसाईट में गाई थी....-----


ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी.बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है
ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता.फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल.पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा

ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा


कृतज्ञ राष्ट्र की गजल सम्राट जगजीत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि.....! लगता है कि एक युग का अन्त हो गया उनके साथ...!!!!

अक्टूबर 09, 2011

'माता वैष्णों देवी' के दर्शन .......!




अरसे से दिल में एक आस थी कि माता वैष्णों देवी के दर्शन किये जायें. कई बार कार्यक्रम बना लेकिन प्रशासकीय व्यस्तता आड़े आती रही, परिणामस्वरूप वैष्णों देवी दर्शन कार्यक्रम बन कर भी फलीभूत नहीं हो सका. माह अक्टूबर के पहले सप्ताह में अचानक इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनी और लगा कि जैसे ’माता का बुलावा आ गया है’, सब कुछ सकारात्मक होता गया. कुछ परिवारिक मित्रों को साथ लिया और निकल पड़े माता रानी के दर्शन के लिए.....!

चूँकि कार्यक्रम बहुत जल्दी में बना था सो सबसे बड़ी समस्या टिकिट की थी........ यात्रा आरम्भ करने से पूर्व रेल टिकट क्लीयरेन्स की जद्दोजहद से निपटने के बाद तो जैसे आनन्द का महासागर आ गया हो. दिल्ली से रेल यात्रा करते हुए 4 अक्टूबर की प्रातः कटरा पहुंचे. कटरा में कुछ समय गुजरने के बाद सायं लगभग सात बजे हमारा जत्था बाणगंगा से माता रानी के दर्शनार्थ पैदल ही चल पडा. साथ में आधा दर्जन छोटे बच्चे भी थे, उनके थकने की चिंता हमें अवश्य सता रही थी, किन्तु आश्चर्य यह देखिए कि इस 14 किमी. की दुर्गम पैदल यात्रा में कई स्थानों पर हम बड़े तो थक कर बैठ गए ,बच्चे पूरे उत्साह से भागते- दौड़ते रहे. लगभग रात के एक बजे जब हम ’भवन’पहुंचे तो उल्लास चरम पर था. माता रानी के तुरन्त दर्शन करना चाहते थे किन्तु महिला मण्डल प्रातः स्नान करने के उपरान्त दर्शन करने के मत में था. अन्ततः महिला मण्डल की राय का आदर किया गया. हम रात में ’भवन’ में ही रूक गए, ’कालिका भवन’ के कक्ष सं0-4 में हम सब सो गए. थके हुए पैरों को आराम मिला मगर बच्चे इस समय भी पूरे उत्साह और उल्लास में थे.........डॉंट-डपट- अनुनय-विनय कर उन्हें सुलाया गया.

सुबह पूरे जत्थे ने स्थान इत्यादि कर माता रानी के दर्शन किए. दर्शनार्थ लम्बी कतारें देखकर हमें महसूस हुआ कि अनजाने में ही हमने ’नवरात्रि’ में अपना कार्यक्रम बना लिया था और इस कारण दर्शनार्थियों की अतिरिक्त भीड यहॉं पर थी. कहीं पर भी पैर रखने को जगह नहीं थी मगर आस्था का सैलाब इन सब चीजों कहां परवाह करता है.......! दर्शनार्थी जयकारे लगा रहे थे , देवी दर्शन की प्रतीक्षा में दो-तीन घन्टों की प्रतीक्षा भी उन्हें भारी नहीं लग रही थी. सुन्दर फूलों से सजे मन्दिर का कोना-कोना सुगन्धित था..........! प्रत्येक स्थान पर ’भेंटों’ का प्रसारण-गायन हो रहा था. माता रानी की कृपा से हमें ’वी.आई.पी. दर्शन’ का लाभ मिला, हमारा जत्था दर्शनार्थ आगे बढ़ा .......गुफा से पार होते हुए जब माता रानी के दर्शन का अवसर आया था हम चकित थे, प्राकृतिक रूप में चमत्कृत कर देने वाली ’पिण्डी’ के दर्शन किये बाहर आए. अभी तक हम सब उसी अलौकिक पाश में थे........माता रानी का दर्शन की आकांक्षा जो एक लम्बे समय से चली आ रही थी पूरी हुई.....!

वापसी में पुनः कटरा के लिए चल पड़े....! वापसी का यह सफर हमने दिन में किया . आते वक्त तो रास्तों को रोशनी में नहाये हुए देखने का अवसर मिला था, जाते वक्त सूरज के प्रकाश में उतरे...... हल्की गर्मी का अनुभव रास्ते भर होता रहा.

माता रानी के दर्शनभिलाषियों की संख्या वर्षभर यूं ही निर्बाध रूप से चलती रहती है . पूजा-अर्चना के छोटे-छोटे विरामों को छोड दें तो मां का दरबार 24 घण्टे खुला रहता है. ऐसी मान्यता है कि भक्त मां के दरबार में तभी जा पाता है जब मॉं उसे स्वयं बुलाती है. शक्ति के रूप में वैष्णों देवी की आम तौर पर समूचे देश में मान्यता है. एक महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र के रूप में यह स्थल लम्बे समय से स्थापित चला आ रहा है. कटरा से मां के दरवार तक पहुँचाने में मार्ग को आसान बनाने के लिए ’श्राईन बोर्ड ’ ने काफी काम किया है. 14 किमी के इस दुर्गम रास्ते में लाखों टाइलों, हजारों मीटर की रैलिंग, सैकडों अल्पाहार स्टाल व धूप - बरसात से बचने के लिए शेड आदि की व्यवस्था के लिए ’बोर्ड’ के प्रयास वाकई सराहना के योग्य हैं.

बताते है कि 1922 में जम्मू-श्रीनगर हाईवे बनने से पूर्व दर्शनार्थी सयालकोट तक रेल से आते थे . सयालकोट से कटरा फिर कटरा से दरबार तक पैदल या खच्चर से जाते थे . कालांतर में हाईवे बनने के बाद ’मंथल’ मुख्य केन्द्र बना. अब जम्मू तक रेल मार्ग हो जाने के बाद ’कटरा’ बेस कैम्प हो गया है. सुनने में आया कि अति शीघ्र ही कटरा तक सीधा रेल मार्ग बिछने वाला है. समय के साथ-साथ इन परिवर्तनों ने निश्चित ही माता रानी के दर्शनों को सुलभ बनाया है.

6000 फुट ऊँचाई पर स्थित माता रानी के दर्शनों को सुलभ,स्मरणीय व सहज बनाने के लिए हमें बहुत से महानुभावों का सहयोग मिला. मैं इस सफल यात्रा के लिए श्री अनुराग यादव , डा0 नितिन ,श्री हृदेश कुमार, श्री श्याम विनोद मीणा, श्री सुदेश शर्मा ,श्री जीतेन्द्र कुमार ,श्री राजीव शर्मा के साथ अन्य कर्मचारियों का आभारी हूँ ,जिन्होंने हमारे इतने बड़े जत्थे के लिए व्यवस्था इत्यादि कराने में अभूतपूर्व सहयोग दिया.

इस धार्मिक यात्रा के बाद हमारा जत्था निकल पडा अमृतसर की ओर... फिलहाल इतना ही ,अमृतसर की इस यात्रा का वर्णन अगली पोस्ट में.

सितंबर 17, 2011

रिश्तों और जज़्बातों के शायर - आलोक श्रीवास्तव !



कुछेक बरस पहले जब मैं अकादमी की ट्रैनिंग में था... तो लाइब्रेरी जाने का कार्य ’रूटीन’ हो गया था. बुक शेल्फस को खंगालना और कुछ अपनी रूचि की किताबों को छांटना, घर पर लाना, पढना और उन पर अपनी टीका टिप्पणियां करना....यह भी उसी रूटीन वर्क का ही हिस्सा थे. ऐसे ही किसी रोज जब मैं बुक शेल्फस में किताबों को उलट-पुलट रहा था तो एक किताब मुझे ’दावत’ देती हुई लगी. इस किताब का आकार सामान्य से थोडा भिन्न था ,आम डिमाई साइज से अलग वर्गाकार 'आमीन' अपनी सभी सहेली किताबों से कुछ आगे निकली हुई थी ऐसा लगा कि जैसे वह किताब आगे बढकर मुझे बुला रही हो... बहरहाल मैने भी यह दावतनामा बगैर देरी के स्वीकार कर लिया, किताब को शेल्फ से निकाला और अपने नाम इश्यू करा ली. किताब का नाम था ’आमीन’ और किताब के शायर थे’ आलोक श्रीवास्तव’.

तब तक आलोक श्रीवास्तव का नाम मैने सुना भी नहीं था, परन्तु 'आमीन' का प्रस्तुतिकरण इनता ’कैची’ था कि मैं एक बार पढ़ने बैठा तो तभी उठा जब पूरी किताब को पढ़ डाला. 'आमीन', लगभग 80-90 गजल ,नज्म और दोहों का ऐसा मजमुआ था कि दिल को छू गया . एक से एक नगीना शेर , सूफ़ियाना दोहे और बेहतरीन नज़्में .......! यहीं से आलोक श्रीवास्वत का मैं प्रशंसक हो गया।


उनसे मिलने का अवसर मिला बदायूं में..... जब बदायूं महोत्सव में वे आमंत्रित थे और उन्होंने वहाँ मेरी पसदीदा ग़ज़ल पढी. इसके बाद मैनपुरी मुशायरे (संयोजक-ह्रदेश सिंह) में उनसे फिर से मुलाकात हुई और सुनने का अवसर मिला...!
चूँकि आलोक श्रीवास्तव नॉएडा में ही रह रहे हैं सो कल अचानक मैं उनके घर पहुँच गया....... उनकी धर्मपत्नी ने शानदार डिनर कराया. इस दौरान आलोक को शाम उनके घर पर बैठकर सुनने और उनके साथ दुनियावी बातों को सिलसिला चला तो तीन-चार घन्टे तके चलता रहा...... समय का अन्दाजा तब हुआ जब मेरी बेटी ने सुबह स्कूल जाने की बात याद दिलाई.

आलोक को मकबूलियत तो उनके ग़ज़ल मजमुए 'आमीन' से मिली मगर उससे पहले ही वे इस दिशा में काफी काम कर चुके थे....... नामचीन शेरों के कलामों के संकलन का सम्पादन उन्होंने किया है. अली सरदार जाफरी की 'नई दुनिया को सलाम', निदा फाजली की 'हम कदम' और बशीर बद्र की 'अफेक्सन' और 'लास्ट लगेज' जैसे बेहतरीन संकलनों का उन्होने संपादन किया है. आलोक के कुछ गीतों और ग़ज़लों को मखमली आवाज़ में गजल गायक जगजीत सिंह ने भी गाया है . शुभा मुदगल उर्दू के महान शायर 'फैज' की नज़्म के साथ उन्हें अपनी एलबम में पिरो चुकी हैं. आलोक को उनके पहले ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' को जिस तरह हाथों हाथ लिया गया है वो अद्भुत है. सामान्यत: किसी कृति को हाथों हाथ लेने की परंपरा अब नहीं रही......! इस कृति को बहुत से सम्मान भी मिले हैं जिनमें ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान 2009 , मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का दुष्यन्त कुमार परस्कार 2007, भगवत शरण चर्तुवेदी पुरस्कार और हेमन्त स्मृति कविता सम्मान प्रमुख हैं ...... इस वर्ष का रूस का 'पुश्किन अवार्ड' भी इसी कृति के खाते में जुड चुका है जिसे लेकर वे हाल ही में वे मास्को से लौटे हैं .

दरअसल आलोक गजल की नई तहजीब में इजाफा करने वाली फेहरिस्त में आगे की पंक्ति में खड़े नज़र आते हैं.........आलोक की ग़ज़लों के कई शेरों में प्रभावित करने का जबरदस्त माद्दा है.उनका यह शेर " घर में झीने रिश्ते मैंने लाखो बार उधड़ते देखे/ चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा" उनके लिखने और लिखने में उनके एहसासों को बयां करता है. रिश्तों के मर्म और महत्व को गजलो में पिरोने का अदभुत कौशल उनमें है. 30 दिसम्बर 1971 को शाजापुर(म0प्र0) मे जन्मे आलोक के जीवन का एक बडा हिस्सा विदिशा में गुजरा..... विदिशा से उन्हें कितना लगाव है यह उनके घर की नमकीनें (दालमोठ-सेव) बताती हैं.विदिशा से हिन्दी में एम0ए0 करने के बाद मुम्बई की खाक छानी ...... मुम्बई रास नही आया तो विदिश लौट आये रामकृष्ण प्रकाशन का प्रबन्धन, सपांदन संभाला.......छह वर्षो में डेढ सौ से ज्यादा साहित्यिक कृतियो को अपनी देखरेख में प्रकाशित किया....... उसके बाद कुछ समय दैनिक भास्कर में पत्रकारिता की. इन दिनो वे दिल्ली में एक बड़े टीवी चैनल में प्रोडयूसर भी हैं.

कमलेश्वर जी ,गुलज़ार साहब , नामवर सिंह, कन्हैया लाल नंदन, यश मालवीय जैसे नामचीन हस्तियों का दुलार लूटने वाले आलोक को उनकी रचनाशीलता के लिये सलाम! यह सलाम इसलिये भी कि एक ऐसे दौर में जब स्टेज ने गजल को बहुत ही सतही और कारोबारी बना दिया है तो ऐसे में गंभीर रचनाए करना वाकई चुनौती है और इस चुनौती को आलोक न बड़ी मजबूती से स्वीकार किया है.

आलोक के विषय में मेरा अब लिखना ठीक नहीं.... मैं सीधे उनके कलाम पर आता हूँ. महसूस करिए इस शायर की संवेदनाओं को और उनकी जीवन के मर्म समझने की अदा को.....-


ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का,
यही
संभाल के पहना,यहीं उतार चले।
और
भौचक्की है आत्मा, सांसे भी हैरान,
हुक्म
दिया है जिस्म ने, खाली करो मकान,

आँखो
में लग जाये तो, नाहक निकले खून,
बेहतर
है छोटे रखें, रिश्तों के नाखून।

गुलज़ार साहब भी आलोक की इस अदा के मुरीद हैं . गुलजार ने उनके संग्रह की भूमिका में लिखा भी है ‘‘ आलोक एक रौशन उ़फ़क पर खडा है, नए उ़फ़क खोलने के लिये.’’
उनके दोहे कहने का अंदाज़ तो देखिये-

माँ बेटे के नेह में, एक सघन विस्तार,
ताजमहल
की रूह में, जमना जी का प्यार।

वास्तव में आलोक श्रीवास्तव ऐसे युवा गजलकार हैं ,जिनके लेखन में एक अद्भुत जादू है जो पाठक को अपनी और खींचता है... भींचता है. उनकेअंदाज़ में न कठिन लफ्जो का जंजाल न झूटी काफ़िया पैमाई. सब कुछ एक दम सीधा-सादा-सच्चा सुव्यवस्थित सा....! उनकी गजलो की भाषा खालिस हिन्दुस्तानी है. वे कहते है कि मैं जिस जबान में बोलता बतियाता हूँ उसी जबान में गजले कहने की कोशिश करता हूँ.
आलोक रिश्तों को जीते है, उन्हे भोगते है और भोगने के एहसासो को कविता और शेरों में परोसते है. भारतीय परंपरा में हर रिश्ते का का अपना अलग स्वाद है , मिजाज है.... और आलोक इस मिजाज को और भी बखूबी बयाँ करते है.

सारा बदन हयात की खुशबू से भर गया,
शायद
तेरा ख्याल हदों से गुजर गया,
किसका
ये रंग रूप झलकता है जिस्म से,
ये
कौन है जो मेरे लहू में उतर गया।

या
फिर

जाने क्यों मेरी नीदों के हाथ नहीं पीले होते
पलकों
से ही लौट गयी है, सपनो की बारातें सच.
वही आंगन, वही खिड़की , वही दर याद आता है,
मैं
जब भी तन्हा होता हूँ, मुझे घर याद आता है,
सफलता
के सफर में तो कहाँ फुर्सत के, कुछ सोचें,
मगर
जब चोट लगती है, मुकद्दर याद आता है,
मई
और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,
नवबर
याद आता है, दिसम्बर याद आता है,

वाह ! क्या अन्दाजे बयाँ है और क्या गुफ़्तगू है।

आलोक ने सबंधो की भावभूमि पर बेहतरीन शेर कहे है जिनमें यकीनन निजता का स्पर्श है. अंत में लीजिये उनकी दो ग़ज़लें जो मुझे बेहद पसंद है पेश कर रहा हूँ .....यक़ीनन आपको भी पसंद आयेंगीं -

घर की बुनियादी दीवारें , बामोदर थे बाबूजी
सबको
बांधे रखने वाला खास हुनर थे बाबूजी
कभी
बड़ा सा हाथ खर्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे
मन का आधा साहस आधा डर थे बाबूजी।
******
घर में झीने रिश्ते मैने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके
-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा,
सारे
रिश्ते जेठ दुपहरी गर्म हवा आतिश अंगारे,
झरना
, दरिया, झील, समुंदर, भीनी सी पुरवाई अम्मा।
बाबूजी
गुजरे, आपस में सब चीजे तक्सीम हुई, तब
मैं
घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।

आलोक के सरोकार संजीदा है. उनकी गजलों की रूह में मुहब्बत के चिराग जलते हैं, उन्होंने चहलकदमी करते हुए शायरों की दुनिया में कदम रखा है मगर उनके क़दमों का आत्मविश्वास बता रहा है की ये कदम अब ठिठकने वाले नहीं.......... "आमीन" !!!!!