मई 08, 2010

सोहगौरा को बचाना ही होगा...!



गोरखपुरके बांसगाँव तहसील क्षेत्र में सोहगौरा गाँव के विषय में लम्बे अरसे से सुनता चला आ रहा था कि यह गाँव ऐतिहासिक महत्व का है। किन्तु चाहते हुए भी प्रशासकीय व्यवस्थाओं ने इस गाँव का मुझे पहुँचने न दिया। कल अचानक मैं इस गाँव के पास से ही गुजर रहा था, तो तय किया कि सोहगौरा गाँव का भ्रमण भी कर लिया जाय।



दरअसल सोहगौरा गाँव प्रागैतिहासिक सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थल है। ऐसा माना जाता है कि मानव सभ्यता ने जब खेती करना आरम्भ किया तो, पहले पहल जिन क्षेत्रों में खेती के प्रमाण मिले उनमें से एक गाँव सोहगौरा भी है।


पुरातत्व विदों तथा इतिहास वेत्ताओं द्वारा इस क्षेत्र के विषय में अभी बहुत विस्तार से नही लिखा गया किन्तु 1960 तथा तदोपरान्त 1974 के उत्खनन के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया कि सोहगौरा वह गाँव है जहाँ पहले पहल हुयी धान की खेती के प्रमाण मिले हैं . इस गाँव का जब पहले पहल 1960 में उत्खनन हुआ तो इस तथ्य को गम्भीरता से नही लिया गया था, किन्तु 1974 की खुदाई में मिले मृदभाण्डों से स्पष्ट हुआ कि मृदभाण्डों को मजबूती देने के लिए मिट्टी में धान की भूसी मिलाई गई है। यही से इस धारणा को बल मिला कि धान की खेती के पहले प्रमाण विन्ध्य क्षेत्र के इस इलाके से ही मिले । इस प्रकार गाँव सोहगौरा इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक कालीन स्थल सिद्ध हो सकता है। बताया जाता है कि खुदाई के दौरान जो मृदभाण्ड और औंजार मिले थें वे 8000 ई0पू0 के हैं। निश्चित रूप से यह गाँव ताम्र पाषाण कालीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थल सिद्ध हो सकता है। इस गाँव के भ्रमण के उपरान्त दुःख भी हुआ कि इस प्रागैतिहासिक कालीन स्थल के संरक्षण के लिए गम्भीरता पूर्वक कोई प्रयास नही किया गया है। स्थिति यह थी की भ्रमण के दौरान जब मैंने इस बावत स्थानीय ग्रामीणों से जानकारी चाही तो ग्रामीण यह बता पाने में असमर्थ की कि वास्तव में किस जगह उत्खनन किया गया था। महज 40 साल में ही अपनी खुदाई के उपरान्त यह स्थल महत्वपूर्ण होने के बावजूद यदि महत्वहीन हुआ है, तो इसके पीछे निश्चित रूप से यही कारण है कि इस स्थल को अपेक्षित रूप से संरक्षित नही किया गया। भ्रमण के दौरान मेरा यह प्रयास रहा कि 1974 के उत्खनन में श्रमिक के रूप में काम किये हुए कुछ लोगों से वार्ता की जाय तथा तत्कालीन खुदाई की स्थिति-परिस्थिति को समझा जाय। कुछ लोग ऐसे सामने आये भी जिन्होंने उस खुदाई में श्रमिक के रूप में काम किया था किन्तु वे भी बहुत ज्यादा जानकारी नही दे पाये।


हैरानी की बात यह है कि जिस स्थल पर खुदाई होना बताया गया उस स्थल पर वर्तमान में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा घर तथा धार्मिक स्थल निर्मित कर लिये गये हैं और उस उत्खनन का कोई भी अवशेष इस गाँव में नही मिल सका। यही कहा जा सकता है कि मानवीय आवासीय तथा धार्मिक आवश्यकताओं ने एक पुरातात्विक स्थल को महत्वहीन बना दिया है।



इस बारे में जो रिपोर्ट अमर उजाला,राष्ट्रिय सहारा तथा हिन्दुस्तान दैनिक में भी प्रकाशित हुयी है ......सलंगन कर रहा हूँ।

मई 06, 2010

....दिल में कोई खलिश छुपाये हैं !

अपनी प्रशासकीय व्यस्तता के चलते इधर बहुत दिनों से न अपने प्रिय ब्लोगर्स को पढ़ पा रहा था और न ही उन्हें अपनी प्रतिक्रियाएं भेज पा रहा था........मगर ब्लॉग जगत पर आज विचरण किया तो पता चला कि मैं ही नहीं बहुत से ब्लोगर मित्रों ने इधर चुप्पी सी लगा रक्खी है......उनके ब्लॉग पर भी नया ताज़ा कुछ नहीं मिला.......अपने मित्र गौतम राजरिशी के ब्लॉग पर भी देखा मगर हताशा हाथ लगी.......सुबीर साहब तो मशरूफ रहते ही हैं......इस्मत जी ने जरूर इस गतिरोध को तोड़ा है, उन्होंने बहुत सुन्दर ग़ज़लें लिखी है.......पाखी,अभिषेक ओझा,वंदना जी, रंजना,कुश, अमरेन्द्र, महफूज़ भी खामोश हैं.........उड़न तश्तरी समीर जी ने ४०० पोस्ट लिख कर इस ख़ामोशी के दौर में अपनी सक्रियता बनाये रखते हुए वाकई उपलब्धि हासिल की है........! अपनी निष्क्रियता का अंदाजा तब हुआ जब क्षमा जी ने लिख कर और शिवम् मिश्र ने आज फोन कर मुझसे न लिखने का उलाहना दिया तो लगा कि वाकई लिखना जरूरी है.....सो आज सोच लिया कि आज एक पुरानी ग़ज़ल पोस्ट कर दूं, ताकि जमी हुयी बर्फ पिघले ........उसी क्रम में यह ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ......

दिल में कोई खलिश छुपाये हैं,
यार आईना ले के आये हैं !!

अब तो पत्थर ही उनकी किस्मत हैं,
जिन दरख्तों ने फल उगाये हैं !!

दर्द रिसते थे सारे लफ़्ज़ों से,
ऐसे नग्में भी गुनगुनाये हैं !!

अम्न वालों की इस कवायद पर,
सुनते हैं " बुद्ध मुस्कुराये हैं" !!

ये भी आवारगी का आलम है,
पाँव अपने सफ़र पराये हैं !!

जब कि आँखें ही तर्जुमाँ ठहरीं,
लफ्ज़ होठों पे क्यूँ सजाये हैं !!

कच्ची दीवार मैं तो बारिश वो,
हौसले खूब आजमाये हैं !!

देर तक इस गुमाँ में सोते रहे,
दूर तक खुशगवार साये हैं !!

जिस्म के ज़ख्म हों तो दिख जाएँ,
रूह पर हमने ज़ख्म खाये हैं !!







अप्रैल 19, 2010

वीनस भाई और उनके बेहतरीन प्रयास के नाम ग़ज़ल........!

बीते दिनों ब्लॉग पर वीनस केसरी ने "आइये एक शेर कहें" नमक बेहतरीन श्रृंखला शुरू की ......यह अलग बात कि यह श्रृंखला उनकी व्यक्तिगत वजहों के कारण बीच में ही गतिरोध का शिकार हो गयी, मैंने वीनस से इस बावत बात भी की, दरख्वास्त भी की कि इस शानदार श्रृंखला को यूँ ख़त्म न करें........कई ग़ज़लकारों के लिए उनका ब्लॉग संजीवनी सिद्ध हो सकता था , मगर..............! खैर तिलक राज कपूर साहब के माध्यम से जिस अंदाज़ में शेरों की बुनावट पर स्वस्थ टिप्पणियां आ रही थीं, वे अनपैरेलल थीं.....! चलिए वीनस भाई की मजबूरियों का सम्मान करते हैं. एक नयी ग़ज़ल इधर मुझसे लिख गयी सोच इस ग़ज़ल को क्यूँ न वीनस भाई और उनके बेहतरीन प्रयास के नाम कर दूं........! तो हाज़िर है वीनस भाई के नाम यह ग़ज़ल.......मुलाहिजा फरमाएं......!

हम तुम हैं आधी रात है और माह-ए-नीम है,
क्या इसके बाद भी कोई मंज़र अजीम है !!

वो खुश कि उसके हिस्से में आया है सारा बाग़,
मैं खुश कि मिरे हिस्से में बाद-ए- नसीम है !!

लहरें वसूलयाबी को आती हैं बार-बार,
साहिल है कर्ज़दार समंदर मुनीम है !!

क्या वज्ह पेश आई अधूरा है जो सफ़र,
रास्ता ही थक गया है कि राही मुकीम है !!

जब जब हुआ फसाद तो हर एक पारसा,
साबित हुआ कि चाल- चलन से यतीम है !!

फेहरिस्त में तो नाम बहुत दर्ज हैं मगर,
जो गर्दिशों में साथ रहे वो नदीम है !!

मज़हब का जो अलम लिए फिरते हैं आजकल,
उनकी नज़र में राम न दिल में रहीम है !!

साया है कम तो फ़िक्र नहीं क्यूंकि वो शजर,
ऊँचाई की हवस के लिए मुस्तकीम है !!

*माह ए नीम = आधा चाँद, नदीम = दोस्त, मुस्तकीम = सीधा खड़ा हुआ

अप्रैल 08, 2010

वृंदा और कंचन का विलाप कानों में गूंजता है.......!


मंगलवार दिनांक 6 अप्रैल 2010 का दिन भारत के इतिहास में हिंसात्मक नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जायेगा....इस दिन नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में दंतेवाडा जिले में 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया.......यह घटना तब घटी जब केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों को ले जा रही एक बस को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया गया ......इस बस में 76 जवान सवार थे. मुकरना के जंगल में घटी इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया. इस हादसे में शहीद हुए जवानों में 42 जवान उत्तर प्रदेश के थे.........और इन जवानों में भी 4 गोरखपुर के थे.......! बुधवार की रात जब इन जवानों के शव गोरखपुर लाये गए तो दिल हिला देने वाले दृश्य देखने को मिले ........दो जवानों की अंत्येष्टि में मैं भी शामिल हुआ, जवान थे-अवधेश यादव और प्रवीन राय......! 28 वर्षीय प्रवीण अपने तीन भाईयों में सबसे बड़े थे.......बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ अपने दो छोटे भाइयों को सहारा दिया ......पिता के साथ कन्धा मिलाते हुए जीवन का सफ़र तय किया था.......2002 में वे सी. आर. पी. एफ. में भर्ती हो गए.......2004 में शादी की ........उनकी पत्नी वृंदा बस अगले महीने ही माँ बनने वाली थीं...........उससे पहले ही यह दुखद घटना घट गयी........! अल सुबह 2 बजे जब मैं शहीद के पार्थिव शरीर को लेकर बघराई गाँव पहुंचा तो ग्रामीणों का जमघट वहां था..........सन्नाटा चारों तरफ पसरा हुआ था........जैसे सी. आर. पी. एफ. की गाड़ी से तिरंगे में लिपटा शव उतारा गया तो लगा कि जवान यह पूरे गाँव का लाडला था..........हर और विलाप की आवाजें ........पत्नी और छोटे भाई का हाल रो-रो के जो हो रहा था .....मैं चाह के भी बयां नहीं कर सकता......पिता तो जैसे घटना पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे........चुप्पी सी लगी हुयी थी उनके होठों पर. यही हाल दूसरे शहीद अवधेश के घर का था. 25 साल सेवा कर चुके 45 वर्षीय अवधेश यादव ने अपने बड़े पुत्र की शादी अगले जून माह में तय कर दी थी.............तारीख भी मुकर्रर हो गयी थी.......11 जून............मगर शायद नियति को कुछ और ही मंज़ूर था उससे पहले यह घटना घट गयी . उनके दोनों बेटों और चौदह वर्षीय बेटी कंचन का विलाप देखकर किसी की आँखें नम हो सकती थीं.............सरयू के किनारे मुक्तिधाम घाट पर इन दोनों जवानों को सलामी के बीच अंत्येष्टि करते वक्त जो मंज़र था वो अब तक मेरी आँखों से उतरा नहीं है............ रात भर जगे होने के बावजूद......... उदास -टूटे हुए मन से पोस्ट लिखने बैठ गया.........बार-बार प्रवीन की पत्नी वृंदा का विलाप और अवधेश की चौदह वर्षीय बेटी कंचन का करुण क्रंदन कानों में गूंजता रहा ..............ऐसे में मन में बारम्बार यही प्रश्न कौंधता रहा कि आंतरिक अशांति से जूझते देश को इन दुखद स्थितियों से कैसे निजात मिलेगी ?

मार्च 24, 2010

एक नयी ग़ज़ल.......!


इधर काफी दिन से कोई ग़ज़ल ब्लॉग पर पोस्ट नहीं की थी.......दोस्तों की तरफ से उलाहने आ रहे थे कि ग़ज़ल पोस्ट करो..................... पीसिंह, शिवम् मिश्र, सुमति, सत्यम, अमरेन्द्र, मनीष ,पंकज, विप्लवी साहब जैसे दोस्तों की बात का आदर करते हुए एक नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ...........इस उम्मीद में कि आपको ये पेशकस शायद पसंद आये..........! हाज़िर है ग़ज़ल............!

वो कभी गुल कभी खार होते रहे,
फिर भी हम उनको दिल में संजोते रहे !!

इश्क का पैरहन यूँ तो बेदाग़ था,
हम मगर उसको आँखों से धोते रहे !!

वादियों में धमाकों की आवाज़ से,
सुर्ख गुंचे जो थे ज़र्द होते रहे !!

काट डाला उसी पेड़ को एक दिन,
मुद्दतों जिसके साए में सोते रहे !!

मोहतरम हो गए वो जो बदनाम थे,
हम शराफत को काँधे पे ढोते रहे !!

मंजिलें उनको मिलतीं भी कैसे भला,
हौसले हादसों में जो खोते रहे !!

आर्ज़ू थी उगें सारे मंज़र हसीं,
इसलिए फसल ख्वाबों की बोते रहे !!

जिन्दगी भी उन्हें बख्शती क्या भला,
बोझ की तरह जो इसको ढोते रहे !!

ये न देखा कि छत मेरी कमजोर थी,
देर तक घर को बादल भिगोते रहे !!

मार्च 15, 2010

कुछ नज्में......डायरी से !

एक अरसे बाद कल अपनी डायरी लेकर बैठ गया..........ऐसा लगा कि जैसे पुराने कुछ फूल फिर से नए रंगों में खिल गए...........चंद नज्में जो कुछेक बरस पहले लिखी थीं ........फिर से रोशन सी हो गयीं........जी चाहा कि इन कुछ नज्मों को क्यों न आप सबके हवाले कर दूं ..........ग़ज़लों को तो अपने ब्लॉग पर लिखता ही रहता हूँ, कुछ नज्में आपको नज्र करने की हिमाकत करने का जी चाह है.........सो खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ......मुलाहिजा फरमाएं.......!

1-याद
बस
एक लम्हा
गुज़ारा था तेरे साथ,
एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !
काश !
एक उम्र
तेरे साथ
गुजरने पाती..................!

***************
2-गिरहें ......!
तुम्हारे
जिस्म में
वो कौन सा
जादू छुपा है कि
जब भी तुम्हें
एक नज़र देखता
हूँ........
मेरी निगाह में
यक-ब- यक
हजारों
रेशमी गिरहें
सी लग जाती हैं............!
****************
3-रात
वक्त के मेले में
जब भी रात
घूमने निकलती है
तो न जाने क्यूँ
वो अपने कुछ बच्चों को
जिन्हें "लम्हे" कहते हैं,
छोड़ आती है.........!
ये गुमशुदा लम्हे
जुगनू की शक्ल अख्तियार करके
बेसबब
अपनी माँ की तलाश में
भटकते रहते हैं...........,
मचलते रहते हैं............!
***************
4-अमानत
परत दर परत
तह ब तह
जिंदगी जिंदगी
.......यही एक अमानत
बख्शी है मेरे नाम
मेरे खुदा ने........!
इसी में से
ये जिंदगी
ये उम्र
तुम्हारे नाम कर दी है.......!
पर सुनो
ये तो सिर्फ पेशगी है
तुम कहो तो
ये सारी
अमानत
तुम्हारे नाम कर दूं.....!


मार्च 08, 2010

डोर से बंधी पतंग का दर्द कौन समझेगा........'महिला दिवस' !

आज आठ मार्च है.................अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस.......! कायनात की अगर सबसे हसीं कोई चीज है तो वो निश्चित रूप से 'स्त्री' है.......! कभी माँ के रूप में तो कभी बहन के रूप में..........कभी पत्नी के रूप में तो कभी बेटी के रूप में स्त्री अपने रंग रूप में तब्दील होती रही है........ यह अलग बात है कि पूरी दुनिया में चाहे वो विकसित देश हों या विकास शील देश ........महिलाओं को हमेशा हर जगह दोयम दर्जे का ही समझा गया है........दकियानूसी समाज ने तो महिलाओं की स्थिति और भी कमजोर की है.... ,मगर यह "स्त्री शक्ति" ही है जो इन तमाम विरोधाभाषों से लड़कर तप कर निखरती रही है........वैदिक कालीन सभ्यता हो या कि महाकाव्य कालीन समाज ..........हमेशा सीता-अहिल्या के रूप में स्त्री को पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होना पड़ा है............तथाकथित विकसित सोच रखने वाले देशों में भी महिलाओं की स्थिति कमोबेश ऎसी ही रही है.....वर्ना कोई तो कारण नहीं क़ि अमेरिका जैसे देश में अब तक कोई महिला प्रेसीडेन्ट नहीं हुयी.......! सामाजिक- आर्थिक- साहित्यिक- राजनीतिक-खेल-प्राशासन.......सभी मंचों पर आज स्त्री निर्णायक भूमिका में है...........हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि यदि समाज में "इन्क्लूसिव सोशल ग्रोथ" का सपना साकार करना है तो हमें स्त्री-पुरुष जैसी लिंगभेदी मानसिकता से ऊपर उठकर महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना ही होगा....! यह महिला दिवस मानाने वाली रीति मुझे कम समझ में आती है की हम किसी एक दिवस को ही महिला दिवस मनाएं......बहरहाल इसे 'प्रतीक दिवस' के रूप में मनाने का प्रचलन आ ही चूका है तो ऐसे में यह दिवस मना कर खुद को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास तो दिला ही सकते हैं...........! ऐसे अवसर पर, कैफ़ी आज़मी साहब जैसे प्रगतिशील शायर ने एक अरसा पहले "स्त्री शक्ति" से जो कहा था उसे दोहराने का मन कर रहा है......

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़ -ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नही
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमे में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
टुक यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में जमीन
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड्खादायेगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे !
निदा साहब ने माँ के रूप में स्त्री का जो सुन्दर रूप देखा है उसके तो क्या कहने........
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।
जी चाहता है कि अपनी एक नज़्म इस मौके पर आपको पेश करूँ, जो मैंने खास महिलाओं को ही ध्यान में रख कर लिखी थी ..........
तूने
बख्शा तो है
मुझे खुला आसमान
साथ ही दी हैं
तेज़ हवाएं भी
हाथों की
हल्की ज़ुम्बिस देकर
ज़मीं से ऊपर उठा भी दिया है
.......मगर
ये सब कुछ
बेमतलब सा लगता है
ये आसमान,
ये हवाएं,
ये हलकी सी जुम्बिश................
काश
तूने ये कुछ न दिया होता
बस मेरी कमान खोल दी होती.......
एक धागा है ,
जिसने बदल दिए हैं
मायने
मेरी आज़ादी के,
................डोर से बंधी पतंग का दर्द कौन समझेगा।