अप्रैल 19, 2010

वीनस भाई और उनके बेहतरीन प्रयास के नाम ग़ज़ल........!

बीते दिनों ब्लॉग पर वीनस केसरी ने "आइये एक शेर कहें" नमक बेहतरीन श्रृंखला शुरू की ......यह अलग बात कि यह श्रृंखला उनकी व्यक्तिगत वजहों के कारण बीच में ही गतिरोध का शिकार हो गयी, मैंने वीनस से इस बावत बात भी की, दरख्वास्त भी की कि इस शानदार श्रृंखला को यूँ ख़त्म न करें........कई ग़ज़लकारों के लिए उनका ब्लॉग संजीवनी सिद्ध हो सकता था , मगर..............! खैर तिलक राज कपूर साहब के माध्यम से जिस अंदाज़ में शेरों की बुनावट पर स्वस्थ टिप्पणियां आ रही थीं, वे अनपैरेलल थीं.....! चलिए वीनस भाई की मजबूरियों का सम्मान करते हैं. एक नयी ग़ज़ल इधर मुझसे लिख गयी सोच इस ग़ज़ल को क्यूँ न वीनस भाई और उनके बेहतरीन प्रयास के नाम कर दूं........! तो हाज़िर है वीनस भाई के नाम यह ग़ज़ल.......मुलाहिजा फरमाएं......!

हम तुम हैं आधी रात है और माह-ए-नीम है,
क्या इसके बाद भी कोई मंज़र अजीम है !!

वो खुश कि उसके हिस्से में आया है सारा बाग़,
मैं खुश कि मिरे हिस्से में बाद-ए- नसीम है !!

लहरें वसूलयाबी को आती हैं बार-बार,
साहिल है कर्ज़दार समंदर मुनीम है !!

क्या वज्ह पेश आई अधूरा है जो सफ़र,
रास्ता ही थक गया है कि राही मुकीम है !!

जब जब हुआ फसाद तो हर एक पारसा,
साबित हुआ कि चाल- चलन से यतीम है !!

फेहरिस्त में तो नाम बहुत दर्ज हैं मगर,
जो गर्दिशों में साथ रहे वो नदीम है !!

मज़हब का जो अलम लिए फिरते हैं आजकल,
उनकी नज़र में राम न दिल में रहीम है !!

साया है कम तो फ़िक्र नहीं क्यूंकि वो शजर,
ऊँचाई की हवस के लिए मुस्तकीम है !!

*माह ए नीम = आधा चाँद, नदीम = दोस्त, मुस्तकीम = सीधा खड़ा हुआ

अप्रैल 08, 2010

वृंदा और कंचन का विलाप कानों में गूंजता है.......!


मंगलवार दिनांक 6 अप्रैल 2010 का दिन भारत के इतिहास में हिंसात्मक नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जायेगा....इस दिन नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में दंतेवाडा जिले में 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया.......यह घटना तब घटी जब केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों को ले जा रही एक बस को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया गया ......इस बस में 76 जवान सवार थे. मुकरना के जंगल में घटी इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया. इस हादसे में शहीद हुए जवानों में 42 जवान उत्तर प्रदेश के थे.........और इन जवानों में भी 4 गोरखपुर के थे.......! बुधवार की रात जब इन जवानों के शव गोरखपुर लाये गए तो दिल हिला देने वाले दृश्य देखने को मिले ........दो जवानों की अंत्येष्टि में मैं भी शामिल हुआ, जवान थे-अवधेश यादव और प्रवीन राय......! 28 वर्षीय प्रवीण अपने तीन भाईयों में सबसे बड़े थे.......बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ अपने दो छोटे भाइयों को सहारा दिया ......पिता के साथ कन्धा मिलाते हुए जीवन का सफ़र तय किया था.......2002 में वे सी. आर. पी. एफ. में भर्ती हो गए.......2004 में शादी की ........उनकी पत्नी वृंदा बस अगले महीने ही माँ बनने वाली थीं...........उससे पहले ही यह दुखद घटना घट गयी........! अल सुबह 2 बजे जब मैं शहीद के पार्थिव शरीर को लेकर बघराई गाँव पहुंचा तो ग्रामीणों का जमघट वहां था..........सन्नाटा चारों तरफ पसरा हुआ था........जैसे सी. आर. पी. एफ. की गाड़ी से तिरंगे में लिपटा शव उतारा गया तो लगा कि जवान यह पूरे गाँव का लाडला था..........हर और विलाप की आवाजें ........पत्नी और छोटे भाई का हाल रो-रो के जो हो रहा था .....मैं चाह के भी बयां नहीं कर सकता......पिता तो जैसे घटना पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे........चुप्पी सी लगी हुयी थी उनके होठों पर. यही हाल दूसरे शहीद अवधेश के घर का था. 25 साल सेवा कर चुके 45 वर्षीय अवधेश यादव ने अपने बड़े पुत्र की शादी अगले जून माह में तय कर दी थी.............तारीख भी मुकर्रर हो गयी थी.......11 जून............मगर शायद नियति को कुछ और ही मंज़ूर था उससे पहले यह घटना घट गयी . उनके दोनों बेटों और चौदह वर्षीय बेटी कंचन का विलाप देखकर किसी की आँखें नम हो सकती थीं.............सरयू के किनारे मुक्तिधाम घाट पर इन दोनों जवानों को सलामी के बीच अंत्येष्टि करते वक्त जो मंज़र था वो अब तक मेरी आँखों से उतरा नहीं है............ रात भर जगे होने के बावजूद......... उदास -टूटे हुए मन से पोस्ट लिखने बैठ गया.........बार-बार प्रवीन की पत्नी वृंदा का विलाप और अवधेश की चौदह वर्षीय बेटी कंचन का करुण क्रंदन कानों में गूंजता रहा ..............ऐसे में मन में बारम्बार यही प्रश्न कौंधता रहा कि आंतरिक अशांति से जूझते देश को इन दुखद स्थितियों से कैसे निजात मिलेगी ?

मार्च 24, 2010

एक नयी ग़ज़ल.......!


इधर काफी दिन से कोई ग़ज़ल ब्लॉग पर पोस्ट नहीं की थी.......दोस्तों की तरफ से उलाहने आ रहे थे कि ग़ज़ल पोस्ट करो..................... पीसिंह, शिवम् मिश्र, सुमति, सत्यम, अमरेन्द्र, मनीष ,पंकज, विप्लवी साहब जैसे दोस्तों की बात का आदर करते हुए एक नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ...........इस उम्मीद में कि आपको ये पेशकस शायद पसंद आये..........! हाज़िर है ग़ज़ल............!

वो कभी गुल कभी खार होते रहे,
फिर भी हम उनको दिल में संजोते रहे !!

इश्क का पैरहन यूँ तो बेदाग़ था,
हम मगर उसको आँखों से धोते रहे !!

वादियों में धमाकों की आवाज़ से,
सुर्ख गुंचे जो थे ज़र्द होते रहे !!

काट डाला उसी पेड़ को एक दिन,
मुद्दतों जिसके साए में सोते रहे !!

मोहतरम हो गए वो जो बदनाम थे,
हम शराफत को काँधे पे ढोते रहे !!

मंजिलें उनको मिलतीं भी कैसे भला,
हौसले हादसों में जो खोते रहे !!

आर्ज़ू थी उगें सारे मंज़र हसीं,
इसलिए फसल ख्वाबों की बोते रहे !!

जिन्दगी भी उन्हें बख्शती क्या भला,
बोझ की तरह जो इसको ढोते रहे !!

ये न देखा कि छत मेरी कमजोर थी,
देर तक घर को बादल भिगोते रहे !!

मार्च 15, 2010

कुछ नज्में......डायरी से !

एक अरसे बाद कल अपनी डायरी लेकर बैठ गया..........ऐसा लगा कि जैसे पुराने कुछ फूल फिर से नए रंगों में खिल गए...........चंद नज्में जो कुछेक बरस पहले लिखी थीं ........फिर से रोशन सी हो गयीं........जी चाहा कि इन कुछ नज्मों को क्यों न आप सबके हवाले कर दूं ..........ग़ज़लों को तो अपने ब्लॉग पर लिखता ही रहता हूँ, कुछ नज्में आपको नज्र करने की हिमाकत करने का जी चाह है.........सो खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ......मुलाहिजा फरमाएं.......!

1-याद
बस
एक लम्हा
गुज़ारा था तेरे साथ,
एक
भरी पूरी उम्र
कट गयी
उस लम्हे की
यादों के सहारे !
काश !
एक उम्र
तेरे साथ
गुजरने पाती..................!

***************
2-गिरहें ......!
तुम्हारे
जिस्म में
वो कौन सा
जादू छुपा है कि
जब भी तुम्हें
एक नज़र देखता
हूँ........
मेरी निगाह में
यक-ब- यक
हजारों
रेशमी गिरहें
सी लग जाती हैं............!
****************
3-रात
वक्त के मेले में
जब भी रात
घूमने निकलती है
तो न जाने क्यूँ
वो अपने कुछ बच्चों को
जिन्हें "लम्हे" कहते हैं,
छोड़ आती है.........!
ये गुमशुदा लम्हे
जुगनू की शक्ल अख्तियार करके
बेसबब
अपनी माँ की तलाश में
भटकते रहते हैं...........,
मचलते रहते हैं............!
***************
4-अमानत
परत दर परत
तह ब तह
जिंदगी जिंदगी
.......यही एक अमानत
बख्शी है मेरे नाम
मेरे खुदा ने........!
इसी में से
ये जिंदगी
ये उम्र
तुम्हारे नाम कर दी है.......!
पर सुनो
ये तो सिर्फ पेशगी है
तुम कहो तो
ये सारी
अमानत
तुम्हारे नाम कर दूं.....!


मार्च 08, 2010

डोर से बंधी पतंग का दर्द कौन समझेगा........'महिला दिवस' !

आज आठ मार्च है.................अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस.......! कायनात की अगर सबसे हसीं कोई चीज है तो वो निश्चित रूप से 'स्त्री' है.......! कभी माँ के रूप में तो कभी बहन के रूप में..........कभी पत्नी के रूप में तो कभी बेटी के रूप में स्त्री अपने रंग रूप में तब्दील होती रही है........ यह अलग बात है कि पूरी दुनिया में चाहे वो विकसित देश हों या विकास शील देश ........महिलाओं को हमेशा हर जगह दोयम दर्जे का ही समझा गया है........दकियानूसी समाज ने तो महिलाओं की स्थिति और भी कमजोर की है.... ,मगर यह "स्त्री शक्ति" ही है जो इन तमाम विरोधाभाषों से लड़कर तप कर निखरती रही है........वैदिक कालीन सभ्यता हो या कि महाकाव्य कालीन समाज ..........हमेशा सीता-अहिल्या के रूप में स्त्री को पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होना पड़ा है............तथाकथित विकसित सोच रखने वाले देशों में भी महिलाओं की स्थिति कमोबेश ऎसी ही रही है.....वर्ना कोई तो कारण नहीं क़ि अमेरिका जैसे देश में अब तक कोई महिला प्रेसीडेन्ट नहीं हुयी.......! सामाजिक- आर्थिक- साहित्यिक- राजनीतिक-खेल-प्राशासन.......सभी मंचों पर आज स्त्री निर्णायक भूमिका में है...........हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि यदि समाज में "इन्क्लूसिव सोशल ग्रोथ" का सपना साकार करना है तो हमें स्त्री-पुरुष जैसी लिंगभेदी मानसिकता से ऊपर उठकर महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना ही होगा....! यह महिला दिवस मानाने वाली रीति मुझे कम समझ में आती है की हम किसी एक दिवस को ही महिला दिवस मनाएं......बहरहाल इसे 'प्रतीक दिवस' के रूप में मनाने का प्रचलन आ ही चूका है तो ऐसे में यह दिवस मना कर खुद को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास तो दिला ही सकते हैं...........! ऐसे अवसर पर, कैफ़ी आज़मी साहब जैसे प्रगतिशील शायर ने एक अरसा पहले "स्त्री शक्ति" से जो कहा था उसे दोहराने का मन कर रहा है......

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़ -ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नही
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमे में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
टुक यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में जमीन
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड्खादायेगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे !
निदा साहब ने माँ के रूप में स्त्री का जो सुन्दर रूप देखा है उसके तो क्या कहने........
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।
जी चाहता है कि अपनी एक नज़्म इस मौके पर आपको पेश करूँ, जो मैंने खास महिलाओं को ही ध्यान में रख कर लिखी थी ..........
तूने
बख्शा तो है
मुझे खुला आसमान
साथ ही दी हैं
तेज़ हवाएं भी
हाथों की
हल्की ज़ुम्बिस देकर
ज़मीं से ऊपर उठा भी दिया है
.......मगर
ये सब कुछ
बेमतलब सा लगता है
ये आसमान,
ये हवाएं,
ये हलकी सी जुम्बिश................
काश
तूने ये कुछ न दिया होता
बस मेरी कमान खोल दी होती.......
एक धागा है ,
जिसने बदल दिए हैं
मायने
मेरी आज़ादी के,
................डोर से बंधी पतंग का दर्द कौन समझेगा।


फ़रवरी 27, 2010

फिर कमसिन होली आई है........!

यूँ तो भारत त्योहारों का देश है ........हर बारह-पंद्रह दिनों पर एक त्यौहार पड़ ही जाता है जो तन मन को स्पंदित कर जाता है.........मगर फिर भी कुछ त्यौहार ऐसे होते हैं जो पूरे जोश खरोश से मनाये जाते हैं..................होली भी वो त्यौहार है जो जन मानस के छुपे अल्हड़पन और बचपन को बाहर निकाल कर रख देता है.............होली का माहौल अपने आप में बड़ा नशीला टाईप का होता है............आँखों में मदहोशी .........हाथों में रंग-पिचकारी ........मुंह में मीठी गुजिया- अनरसे ..........ढोलक -मंजीरे की थाप...........मदमस्त फाग गाते हुए गलियों से से निकलती टोलियाँ .............उम्र के फासले टूटने लगते है, क्या बूढ़े-क्या नौजवान सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लगने लगते हैं.............सब देवर बनने की चाहत में रंग जाते हैं.....! मैं भी तो कमोबेश इन्ही रंगों में रंगा हुआ हूँ .......सोचा इस बार क्यों न उन कवियों -शायरों के हाल उन्ही की जुबानी आपको सुना दूं जो होली पर आप और हम जितने ही मस्त और बिंदास हो जाते हैं............मैंने होली के अवसर पर कुछ पुराने जाने पहचाने कवियों शायरों की रचनाओं को इस पोस्ट में शामिल किया है तो कुछ नए ज़माने के लोगों को भी न्योता दिया कि वे भी होली के रंग बिखेरें ................यह प्रयास कैसा रहा यह तो आप ही तय करंगे फिलहाल तो पोस्ट हाज़िर कर रहा हूँ................तो हुज़ूर देरी क्यों, आइये शुरू करते हैं प्रेम की दीवानी मीरा की ब्रज भाषा में रंगी एक रचना से जो खालिस होली का रंग बिखेर रही है........कृष्ण भक्ति में मीरा होली के रंग में इस तरह रंग जाती हैं और कह उठती हैं......

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
सील सन्तोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल बलिहार रे॥

हिन्दवी के उस्ताद और भारत की पहचान गंगा जमुनी संस्कृति की अलख जगाने वाले अमीर खुसरो साहब रंगों का जलवा कुछ यूँ बिखेर रहे हैं................
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ए इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया
वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरवी रख ले
आन पारी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब रख ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे

लोक भाषा के उस्ताद शायर नजीर अकबराबादी की अल्हड नज़रों में होली कुछ ऐसी होती है.......
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की।
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के,
कुछ बढ़ बढ़ के,कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के,
कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।
ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून , रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।

हिंदी के पहले लेखक माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद अपनी बिंदास शैली में होली का फाग कुछ यूँ गाते हैं.............
गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में
है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में
रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीलीआँख दिखाकर करो सरशार होली में

जय शंकर प्रसाद जी भला होली पर कैसे चुप बैठ सकते हैं, होली पर उनकी अभिव्यक्ति क्या ही निराली है.........
बरसते हो तारों के फूल छिपे तुम नील पटी में कौन?
उड़ रही है सौरभ की धूल कोकिला कैसे रहती मीन।
चाँदनी धुली हुई हैं आज बिछलते है तितली के पंख।
सम्हलकर, मिलकर बजते साज मधुर उठती हैं तान असंख।
तरल हीरक लहराता शान्त सरल आशा-सा पूरित ताल।
सिताबी छिड़क रहा विधु कान्त बिछा हैं सेज कमलिनी जाल।
पिये, गाते मनमाने गीत टोलियों मधुपों की अविराम।
चली आती, कर रहीं अभीत कुमुद पर बरजोरी विश्राम।
उड़ा दो मत गुलाल-सी हाय अरे अभिलाषाओं की धूल।
और ही रंग नही लग लाय मधुर मंजरियाँ जावें झूल।
विश्व में ऐसा शीतल खेल हृदय में जलन रहे, क्या हात!
स्नेह से जलती ज्वाला झेल, बना ली हाँ, होली की रात॥


होली पर मधुशाला कवि हरिबंश राय बच्चन की पिचकारी कुछ इस तरह रंग छिड़कती है.........
तुम अपने रँग में रँग लो तो है
होली देखी मैंने बहुत दिनों तक दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने, मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
घूमेगा जग राह-राह में आलिंगन की मधुर चाह में,
स्नेह सरसता से घट भरकर, ले अनुराग राग की झोली!
विश्व मनाएगा कल होली!
उर से कुछ उच्छवास उठेंगे, चिर भूखे भुज पाश उठेंगे,
कंठों में आ रुक जाएगी मेरे करुण प्रणय की बोली!
विश्व मनाएगा कल होली!
आँसू की दो धार बहेगी, दो-दो मुट्ठी राख उड़ेगी,
और अधिक चमकीला होगा जग का रंग, जगत की रोली!
विश्व मनाएगा कल होली!
असली रंग तो महान कवि निराला जी खेल रहे हैं......सारे बंधन तोड़ के.......
नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधुअ सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली--
बनी रति की छवि भोली!

उस्ताद शायर वसीम बरेलवी साहब विरहन का दर्द होली पर कुछ ऐसे बिखेर रहे हैं.........
तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचौली
मगर अब साजन कैसी होली !
तन के सारे रंग भिखारी, मन का रंग सुहाग
बाहर बाहर पूरनमासी अन्दर अन्दर आग
अंग अंग लपटों में लिपटा बोले था एक बोली
मगर अब साजन कैसी होली !
रंग बहुत शर्माए
कुछ ऐसी भीगी पापी काया
तूने इक इक रंग में
कितनी बार मुझे दोहराया
मौसम आये मौसम बीते मैंने आँख न खोली
मगर अब साजन कैसी होली !
रंग बहाना रंग जमाना
रंग दीवाना
रंग में ऐसी डूबी साजन
रंग को रंग ना जाना
रंगों का इतिहास सजाये रंगों रंगों बोली
मगर अब साजन कैसी होली !

युवा शायर और मेरे अज़ीज़ शायर अकील नोमानी भी लड़खड़ाते क़दमों के साथ कह रहे हैं........
दिल में बजता है प्यार का संगीत, रूह फागुन के गीत गाती है,
जब बिखरते हैं रंग होली के, जिंदगी झूम झूम जाती है !

और..........,
आइये होलिका दहन के साथ, नफरतों को जला दिया जाये !
अबके होली में दुश्मनों को भी, प्यार करना सिखा दिया जाये !!

कुंवर बेचैन जीवन की सच्चाइयों से रु ब रु होते हुए तल्ख़ मिजाजों में कहते हैं..........
प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी
यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए
मिली हमें अंधी दीवाली गूँगी होली बाबू जी

ये क्या........... रेलवे के अफसरान भी होली खेलने पर उतर आये.......विप्लबी साहब तो गले में ढोलक डाले पंचम स्वर में फाग गा रहे हैं.........
होली आयी तो मचा होली का हुडदंग,
दुश्मन मिलते बदल कर गिरगिट जैसा रंग
गिरगिट जैसा रंग लबों पे हंसी सुहानी
हम अब्दुल्ला हुए देख शादी बेगानी
कहें ‘बिप्लवी’ चढ़ी भँग की ऐसी गोली
हुआ मुहर्रम अपना उनकी होली हो ली

.............नहीं मानेंगे........ कह रहे हैं एक ग़ज़ल और पेश करूंगा.......तो लीजिये बचिए.....
जुटा लें एक जहती का सरो सामान होली में
मिले कुछ इस तरह इंसान से इंसान होली में
किसी को हाथापाई करके रंगों में डुबो डाला
तो जैसे जा रहा है मार कर मैदान होली में
नज़र से रंग बरसे पैरहन से खुशबुएँ निकलें
मगर वो शोख खुद से लग रहा अनजान होली में
हवाएं हाथ पकडे हैं घटायें घर बुलाती हैं
हुयी है किस तरह आवो हवा शैतान होली में
हमारी ‘बिप्लवी’ तहजीब ही इंसानियत की है
भुला दें रंजिशें पिछली ये हो उन्वान दें होली में

मेरे अपने शहर मैनपुरी के शायर दोस्त फ़साहत अनवर साहब ने भी होली का रंग कुछ यूँ बिखेरा है........
त्यौहार है ये खुशियों का क्या मस्त सुहाना है,
जी चाहे जिसे रंग दो होली का बहाना है !
गुजियों या अनरसों से भरता ही नहीं मनवा,
पकवान ये जी भर के जन जन को खिलाना है !

पोस्ट का अंत अपने जिगरी यार मनीष की एक रचना से कर रहा हूँ जो भाँग के नशे में उछल उछल कर कह रहे हैं........
रंग लाल गुलाल का बादल है,मदमाती आँख का काजल है
कुछ हवा नशे में चूर सी है,हर सांस में महका संदल है
पत्ता पत्ता बौराया है, हर ज़र्रा जोश में आया है !
......रंगों की वो तकरार उधर,देखो टेसू की धार उधर
क़दमों का भी है हाल अज़ब,एक बार इधर इक उधर
क्या बात बताएं होली की, मदहोश फज़ाएँ होली की.......
गुलमोहर की रंगत का मौसम,रंगीन शरारत का मौसम
मौला मेरे फिर फिर आये,रंगों की इबादत का मौसम !

यह प्रस्तुति मुझे यहीं ख़त्म करने की इज़ाज़त दें............इतनी लम्बी पोस्ट लिखने की आदत नहीं रही.........होली पर आप सभी को मेरी शुभकामनायें..............इस उम्मीद के साथ


"ढोलक की थापों पे गाते फगुओं की टोली आई है
टेसू की रंगत बिखर गयी फिर कमसिन होली आई है........"

फ़रवरी 18, 2010

दुनिया सचमुच गोल है..........!

गोरखपुर में आने के बाद कई नए लोगों से मुलाकातें हुईं........शायद नयी जगहें और नए लोग ही हमारे प्रोफेसन की सबसे बड़ी पहचान हैं.........लगातार तबादले और इन्ही तबादलों के बीच अपनी जिंदगी को सेटल कर लेने की अदम्य चाहत ही हमारी सबसे बड़ी जिजीविषा है.......बहरहाल गोरखपुर में जब आया तो यह शहर मेरे लिए बिलकुल अनजान शहर था.......कोई पुराना दोस्त यहाँ नहीं था........! मगर कहते हैं न कि दुनिया गोल है.........यहां बहुत से अपरिचितों के बीच भी कुछ लोग थे जो पुराने निकल आये और नए शहर में इन पुराने लोगों की सोहबत में नए लोग मिलते गए.........जिन पुराने लोगों से यहाँ मुलाकात हुयी इत्तेफाक देखिये कि दोनों ही रेलवे में अफसर हैं.......एक हैं विप्लवी साहब......जिनके बारे में मैंने तफसील से अपनी पुरानी पोस्ट में लिखा ही था........दूसरे रहे अनुराग यादव.....! अनुराग पेशे से इंजीनीयर हैं सिविल के वे इंजीनीयर हैं......फ़िलहाल डेपुटी चीफ इंजीनीयर हैं.........वे भी मेरे पैतृक शहर मैनपुरी के रहने वाले हैं..........हम दोनों हम उम्र हैं........दस बरस पहले मैनपुरी के पुस्तकालय से हम दोनों की मुलाकातें हैं दरअसल अनुराग को भी पढ़ने का बहुत शौक था और मुझे भी ! शुरुआत में हम दोनों रोज उस पुस्तकालय में मिलते थे........कुछ दिनों दोनों एक दूसरे को इग्नोर करते रहे...........बाद में आँखों ही आँखों में हाई-हेल्लो होने लगी फिर बात चीत शुरू हुयी.........दोस्त बढ़ी ............किताबों पर चर्चाएँ भी हुईं........चूँकि मेरा सिविल सेवा का टार्गेट फिक्स हुआ.......दिल्ली चला आया........ अनुराग का भी शायद इंजिनीयरिंग की तरफ रुझान हुआ और वे भी इस दिशा में आगे बढ़ गए, भारतीय इंजिनीयरिंग परीक्षा पास की और रेलवे में इंजिनीयर बन गए ..............सालों एक दूसरे से मुलाकातें नहीं हुईं.............लगभग एक दूसरे को भूल से गए...........एक दिन अचानक अपने ऑरकुट पर अनुराग नाम की फ्रेंड रेकुएस्ट देखी............मैं तब भी नहीं अनुराग को ट्रेस कर पाया.......बस मैनपुरी का कोई बन्दा समझ कर "हाँ" कर दी..........बाद में बातें आगे बढ़ी तो पता चला की यह तो वही अनुराग हैं........संयोग शायद इसे ही कहते हैं......................मेरा ट्रांसफर गोरखपुर हो गया..........आने के बाद अनुराग से मुलाकात हुयी........कुछ शारीरिक परिवर्तनों के बावजूद मैं अनुराग को तुरंत पहचान गया...........यादों के पुराने पन्ने फिर खोले गए..............इसके बाद औपचारिकताओं की गुंजाइश ख़त्म हो गयी................. फिलहाल अपने रिश्ते को हमने और भी विस्तार दिया है पत्नी और बच्चों तक इस दोस्ती की बेलें फ़ैल गयीं हैं बरसों बाद अनुराग से गोरखपुर में मिलने के बाद लगता है कि सचमुच दुनिया गोल है........!
अहमद फ़राज़ का यह शेर शायद इसी की बानगी है
फिर इसी राह गुज़र पर शायद,
हम कभी मिल सकें मगर शायद !
जान पहचान से भी क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद !
जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं फ़राज़,
फिर भी तू इन्तिज़ार कर शायद !