जुलाई 16, 2008

bachpan

कई दिनों से एक विचार मन में आता है पर अभिव्यक्ति के आभाव की वज़ह से कहीं सिमट जाता है। बचपन में आदमी सबसे सच्चा होता है उसका बाहरी रूप अन्दर वाले मन में कोई अन्तर नही होता। पर जैसे जैसे आदमी बड़ा होने लगता है उसमे दोहरा पन आने लगता है यानि डबल स्टैण्डर्ड मुझे यह फितरत आदमी की सबसे ख़राब लगती है कि जिसे आप पीछे बुरा कहते हैं सामने उसी के कसीदे पढ़ते हैं और आप उसके सबसे करीब हैं.यह ठीक है के आप लोक लिहाजके कारन आप ढंग से दुआ सलाम करे लेकिन झूटी आत्मीयता दिखाना........................... क्या कहूँ. मैं बहुत असहज महसूस करती हूँ। हो सकता है मैं ज़्यादा समझ दार न होऊं परन्तु मुझे लगता है के ऐसे वाव्य्हरिक होने से बेहतर है अ vyvaharik होना। ( जैसा मेरी पत्नी anju ने मुझसे कहा)


1 टिप्पणी:

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

क्या करें !
हर उम्र में बचपन को जगह देते चलें , बस ..