जुलाई 30, 2008

एक ग़ज़ल मेरी भी

लफ्ज़ पत्रिका ग़ज़लों को प्रकाशित करने वाली त्रैमासिक पत्रिका है। ये पत्रिका दिल्ली से प्रकशित होती है । इसके सम्पादक तुफैल चतुर्वेदी हैं जो मेरे मित्र भी हैं। आज जितनी भी पत्रिकाएं ग़ज़लों को प्रकाशित करने की दिशा में काम कर रही हैं उनमे इस पत्रिका का नाम काफी वज़नदार है। बहरहाल इस पत्रिका में दो gazal मेरी भी प्रकाशित हुई हैं उसमे से एक ग़ज़ल को मैं आपको post कर रहा हूँ padhiye शायद acchi लगे

दिल में कोई खलिश छुपाये हैं , यार आइना ले के आयें हैं।

उनकी किस्मत हैं क्या ये पत्थर ही, जिन दरख्तों ने फल उगाये हैं।

दर्द रिश्ते थे सारे ज़ख्मों से,ऐसे नगमे भी गुनगुनाये हैं।

जंग वालों की इस कवायद पर, सुनते हैं " बुद्ध मुस्कुराये हैं"।

ये भी आवारगी का आलम है, पाओं अपने सफर पराये हैं।

जब की आँखे ही तर्जुमा ठहरी, लफ्ज़ होठों पे क्यों सजाये हैं।

कच्ची दीवार मैं तो बारिश वो, हौसले खूब आजमाए हैं।

देर तक इस गुमा में सोते रहे, दूर तक खुशगवार साए हैं।

जिस्म के ज़ख्म हो तो दिख जाए, रूह पर हमने ज़ख्म खाए हैं।

9 टिप्‍पणियां:

Dr. Uday 'Mani' Kaushik ने कहा…

भाई साहब , सादर अभिवादन
मैं लफ्ज़ पत्रिका का नियमित पाठक हूँ इसी नाते आपकी ये सशक्त ग़ज़ल मैं लफ्ज़ में पढ़ चुका हूँ ,
आप मेरे ब्लॉग पे आए , प्रोत्स्साहन किया इसके लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ
ये स्नेहिल जुडाव बनाए रखेंगे ,इसी आशा के साथ
आपका अनुज
डॉ उदय 'मणि ' कौशिक
http://mainsamayhun.blogspot.com


(मैं आपका पूरा नाम अभी याद नहीं कर पा रहा हूँ
बताइयेगा ..)

singhsdm ने कहा…

dear kaushik ji
hausala afzaai ke liye shukriya.mera naam pawan kumar hai....IAS hoon....Baki dua salaam aage hoti hi rahegi... Ummeedon e saath....PAWAN KUMAR

pari ने कहा…

dear mausa,i m quite impressed by ur blog.u r an extremely talented and innovative person.

sumati ने कहा…

ab jab tumne apna nam blog per khol diya to tum se bat karne main ek jo apnapan tha vo wapas aagaya hai ..pari main tumhare se etafak rakhta hun pawan is a talent..shayad chhote bhaiyoun main vo eseliye mere sabse jyada karib hai...din bhar main ek sms pawan ki apni chhap liye hue aata hai aur main khush hota hun...bhale hi vo kisi ka likha hua ho per chunav to pawan ka hota hai...aur ek bat ...

vo jo har ek bat ke mayne jane..
mer darde dil ko kyun bahane mane..

sumati

sagar ने कहा…

mere pyare mitra mujhe bahut jhushi hoti hai jab mai sabko batabta hun ye intelligent shayar merea sabse pyara dost hai. i m really proud of u.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल जनाब...सारे शेर अच्छे हैं...लफ्ज़ मेरी भी पसंदीदा पत्रिका है और मैं इसका लाइफ मेंबर भी हूँ...
नीरज

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

'' जब की आँखे ही तर्जुमा ठहरी, लफ्ज़ होठों पे क्यों सजाये हैं ''
क्योंकि ये दलील भी तो सुनने को मिलती है ...
'' रवायतन ही सही कोई बात तो करते ''
सुन्दर गजल ...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

बहुत उम्दा ग़ज़ल है.... गुलज़ार साब की एक नज़्म का हिस्सा देखें

तुमने भेजा तो है सहेली को
जिस्म के घाव देख जायेगी
रूह के दर्द कौन देखेगा ?

Rohit "meet" ने कहा…

wah bahut umda gazal