दिसंबर 09, 2008

चिल्ड्रेन सेक्सन में बचपन

लाइब्रेरी जाने शौक मुझे तब से है जब से मैं थोड़ा बहुत समझदार हुआ.अब जब भी फुर्सत मिलती है तो किताबें लेकर बैठ जाता हूँ..सच मानिए किताबों से ज्यादा तसल्ली कहीं नही मिलती. कल भी मैं लाइब्रेरी जाकर बैठा तो कुछ मज़ा नही आया ...अखबारों में आतंकवाद पर छप रही वही घिसी पिटी टिप्पणियां वही दूसरों पर ज़िम्मेदारी डालने वाले बयान और जो जगह बची उस पर कुछेक राज्यों में हो रहे विधान सभा चुनावों पर वाद-प्रतिवाद.....मन ऊब गया, उठ कर चल दिया. वापसी के समय नज़र चिल्ड्रेन सेक्सन पर चली गयी. बरबस ही उधर कदम उठ गए. चिल्ड्रेन सेक्सन में पहुँचा तो मज़ा आ गया ..ऐसा लगा कि जैसे छूटा हुआ बचपन फ़िर से मिल गया हो. चंदामामा, बालहंस, नंदन, लोट- पोट, चंपक अपने कुछ परिवर्तनों के वाबजूद उसी तेवर में मौजूद मिली......एक ओर कॉमिक्स का सेट भी रखा हुआ था यद्दपि कुछ नए कॉमिक चरित्र अब बाज़ार में आ चुके हैं मगर अभी भी चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी,राम रहीम, हवलदार बहादुर, क्रुकबोंड ,डोगा, नागराज........सभी उस चिल्ड्रेन सेक्सन में मिल गए थे जो बच्चे उस चिल्ड्रेन सेक्सन में मौजूद थे वे बड़ी तन्मयता से उन्हें पढ़ रहे थे .......कॉमिक्स ओर बच्चों को देखकर मेरे सामने अपनी पुरानी जिंदगी के सारे दृश्य ताज़ा हो गए जब मैं अपने छोटे भाई के साथ बस स्टैंड पर हर रोज़ जाकर मैगजीन वाली दुकान पर नयी कॉमिक्स या नयी बाल पत्रिका तलाशता था .....मुझे यह कहने में कोई संकोच नही कि किताबों को दोस्त बनाने की आदत शायद तभी से पड़ गयी जो अब तक बदस्तूर कायम है...... खैर चिल्ड्रेन सेक्सन में फ़िर मैंने चाचा चौधरी और राका के बीच होने वाले मजेदार कॉमिक्स को पढ़ा............... क्या आनंद आया....शायद मैं लिख पाने में नाकाम ही रहूँगा .

16 टिप्‍पणियां:

अभिषेक ओझा ने कहा…

बचपन के वो दिन अब आ तो नहीं सकते पर उनमें खो जाना भी कम मजेदार नहीं ! आपकी भावनाएं समझ सकता हूँ.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

पढ़कर अच्छा लगा. बचपन में वापस जाकर अच्छा भी लगता है और उसे वापस पकड़ न पाने का दुःख भी होता

Amit K. Sagar ने कहा…

बचपने को पढ़के मजा आग या. और सच है दोस्त कि हमें अंततः पुस्तकों में सही या फ़िर अख़बारों में अच्छी खबरों की दरकार ही रहती है. किंतु यह अंततः होता है.
जारी रहें.
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शुभकामनाएं.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

ये दो जगह लिखा हो गया /इसलिए टिप्पणी भी अलग अलग लिखना पढ़ रही है /हमने तो बचपन में कोई बाल पत्रिकाएं देखी ही नहीं

पुरुषोत्तम कुमार ने कहा…

वाह, कुछ देर के लिए ही सही, बचपन को जीना कितना अच्छा लगा होगा। ..कैसा लगा? यह भी बताते तो और अच्छा लगता।

Hariyali ने कहा…

Great sir, children section ki jin books ka aapne jikra kiya hai, syllabus ki books na parhkar comics chori se practical ki books me chhipa ke parhate the. chacha chadhari, nagraj, Dhruva, ki siries jodte the. bahut achchaa..........Dharm pal Yadav

राजीव करूणानिधि ने कहा…

बड़ा ही सुन्दर लेखनी है.
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..याद आ गया.
बधाई, लिखते रहिय

fatima ali ने कहा…

sorry pawanji for responding so late. i like this article. istill love to read comics. i have huge collection of hindi comics. my abba and other family members used to give me many comics as gifts. many a times i used my pocket money to hire the comics. comics are not only the source of entertainment but a good source of knowledge too.

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

मन से लिखा है आपने .
पढ़ कर मज़ा आया .
दीवाना तेज़ पूछ रहा था
उसे क्यूँ भुला दिया

गौतम राजरिशी ने कहा…

एसडीम साब को प्रणाम ! कैसे हैं आप?...बड़े दिनों बाद आज आया हूं आपके ब्लौग पर और इस कामिक्स चर्चा पे मुग्ध हो उठा ...मैं तो खुद ही कामिक्स का बड़ा फैन हूं...मासिक वेतन का एक अच्छा-खासा हिस्सा कामिक्स को जाता है...

इस आलेख के लिये धन्यवाद

"SURE" ने कहा…

शुभ नव वर्ष २००९ आपको सपरिवार मंगलकामनाएं

VisH ने कहा…

achhi post mere bog par bhi kuch hai jo naya hai...aapka or aapki pratikriya ka swagat hai....??


Jai Ho Mangalmay HO

BrijmohanShrivastava ने कहा…

सर आठ दिसम्बर के बाद कुछ लिखा नहीं है कृपया लिखने को समय निकालिए

Science Bloggers Association ने कहा…

आपके उस आनन्‍द को वही समझ समता है, जिसने उसे महसूस किया हो।

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खुशियों का विज्ञान-3
एक साइंटिस्‍ट का दुखद अंत

Babli ने कहा…

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बढ़िया लिखा है आपने! मैं तो आपका पोस्ट पड़कर अपने बचपन के दिनों में लौट गई!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

Sushant Singhal ने कहा…

मैं भी उस पीढ़ी से ताल्लुक रखता हूं जिसका बचपन नंदन, चंदामामा, चंपक, बेताल के सान्निध्य में बीता करता था। बाद में पिताजी ने मुझे अंग्रेज़ी के बाल-उपन्यास लाकर देने आरंभ किये जिसका कारण उनका hidden agenda :-) यह था कि अंग्रेज़ी भाषा की ओर भी मेरा झुकाव बढ़े ! Enid Blyton की mystery stories पढ़ने को मिली, जिसने मुझे एक नयी और रहस्यमयी दुनिया से परिचित कराया।
आजकल के बच्चों को अपने भारी भरकम पाठ्यक्रम के बाद जितना समय मिलता है, उसमें वह मोबाइल, टी.वी., वीडियो गेम्स या फिर सोशल मीडिया के संपर्क में आते हैं! हां, अभी सहारनपुर में पुस्तक मेले के दौरान बहुत सारे बच्चों से पुस्तकों के बारे में बात करने का अवसर मिला तो अनुभव हुआ कि कक्षा 9 से 12 के बच्चों को हिन्दी के लेखकों से कोई विशेष लगाव नहीं है, लगभग सभी ने अपने फ़ेवरिट उपन्यासकार के रूप में एक ही नाम लिया - ’चेतन भगत’ !

हमारी पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी में एक मज़ेदार अन्तर मुझे ये भी नज़र आता है कि उस कालखंड में हमारे पिताजी और चाचाजी तय करते थे कि हमें कौन सी फिल्म दिखानी है। आज कल बच्चे तय करते हैं कि कौन सी फिल्म उनके मां-बाप के लिये उपयुक्त रहेगी!