अक्तूबर 05, 2009

ओरछा के किले से.............

हुज़ूर फिर हाज़िर हूँ......पिछले दिनों मैं यू पी दर्शन पर था....अकेलापन नए एहसास को जगाने में हमेशा मोडरेटर की भूमिका निभाता है......ऐसा ही कुछ मेरे साथ ओरछा में हुआ . ओरछा के किले में अकेलेपन के माहौल में और बेतवा के किनारे बैठकर ओरछा रिसॉर्ट में एक ग़ज़ल लिख डाली....बगैर किसी इस्लाह और तरमीम के यह ग़ज़ल आप सब के हवाले कर रहा हूँ....अच्छी लगे या बुरी निष्पक्ष प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तिज़ार रहेगा......ग़ज़ल हाज़िर है.

मेरी तन्हाई क्यों अपनी नहीं है !
ये गुत्थी अब तलक सुलझी नहीं है !!

बहुत हल्के से तुम दीवार छूना,
नमी इसकी अभी उतरी नहीं है !!

मुआफी बख्श दी एक तंज़ देकर,
"तुम्हारी भूल ये पहली नहीं है" !!

समझना है तो बस आँखों से समझो,
कोई तहरीर या अर्जी नहीं है !!

बुलंदी, शोहरतें, इज्ज़त, नजाकत,
मुझे पाना है, पर जल्दी नहीं है !!

बहुत चाहा तेरे लहजे में बोलूं,
मेरे लहजे में वो नरमी नहीं है !!

11 टिप्‍पणियां:

shubhi ने कहा…

बहुत से घटिया तर्जुमे सुनने के बाद गजल से गैरदिलचस्पी हो गई थी। लेकिन यह गजल ताजा हवा के झोंके की तरह है। शायदा ओरछा के छोड़ दिये गये महलों के पूरे जज्बात यह गजल कहती है जहां दफन हैं राय प्रवीण के जज्बात और अनेकों ऐसे ही किस्से जो इतिहास के साथ ही दफन हो गये हैं।

पारूल ने कहा…

बहुत बढिया ग़ज़ल .....खासकर
-बहुत हल्के से तुम दीवार छूना,
नमी इसकी अभी उतरी नहीं है !!

अभिषेक ओझा ने कहा…

आखिर की ४ लाइने बेहद पसंद आई.

अनिल कान्त : ने कहा…

शुभी जी की बात गौर करने लायक है
मुझे बहुत बहुत बहुत अच्छी लगी ये रचना

monali ने कहा…

मुआफी बख्श दी एक तंज़ देकर,
"तुम्हारी भूल ये पहली नहीं है" !!


Ye ada to kai logo ki h...badi khubssorati se keh gaye aap ye sachchayi...

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut khoob .
समझना है तो बस आँखों से समझो,
कोई तहरीर या अर्जी नहीं है !!

सत्यम न्यूज़ ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
सत्यम न्यूज़ ने कहा…

बहुत खूब भाई....ओरछा का किला अब इस ग़ज़ल के लिए भी जाना जायेगा.

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

बुलंदी, शोहरतें, इज्ज़त, नजाकत,
मुझे पाना है, पर जल्दी नहीं है !!

बहुत हल्के से तुम दीवार छूना,
नमी इसकी अभी उतरी नहीं है !!

बहुत बढ़िया..........

हार्दिक शुभकामनाएं.....ऐसी ही और भी सुन्दर ग़ज़लों की प्रतीक्षा है...........

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

गौतम राजरिशी ने कहा…

बड़े दिनों बाद एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली है। बधाई नये अंदाज़ और अनूठी जमीन के लिये। मुश्किल रदीफ़ को बड़ी सहजता से निभाया है आपने। सारे अशआर मन को छूते हुये...तीसरे शेर में "एक" मिस्‍रे को वजन से खारिज कर रहा है। मेरे ख्याल से ये टाइपिंग गलती है। "इक" की जगह "एक" हो गया होगा...

"बुलंदी, शोहरतें..." वाला शेर तो आह! ...संग लिये जा रहा हूँ।

आपको शायद याद नहीं हो, जब मैंने ब्लौग में नया उतरा ही था तो सबसे पहली हौसलाअफ़जाई आपसे ही मिली थी.....

सुलभ सतरंगी ने कहा…

बुलंदी, शोहरतें, इज्ज़त, नजाकत,
मुझे पाना है, पर जल्दी नहीं है !!

Sher bahut bhali lagi.