अप्रैल 08, 2010

वृंदा और कंचन का विलाप कानों में गूंजता है.......!


मंगलवार दिनांक 6 अप्रैल 2010 का दिन भारत के इतिहास में हिंसात्मक नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जायेगा....इस दिन नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में दंतेवाडा जिले में 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया.......यह घटना तब घटी जब केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों को ले जा रही एक बस को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया गया ......इस बस में 76 जवान सवार थे. मुकरना के जंगल में घटी इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया. इस हादसे में शहीद हुए जवानों में 42 जवान उत्तर प्रदेश के थे.........और इन जवानों में भी 4 गोरखपुर के थे.......! बुधवार की रात जब इन जवानों के शव गोरखपुर लाये गए तो दिल हिला देने वाले दृश्य देखने को मिले ........दो जवानों की अंत्येष्टि में मैं भी शामिल हुआ, जवान थे-अवधेश यादव और प्रवीन राय......! 28 वर्षीय प्रवीण अपने तीन भाईयों में सबसे बड़े थे.......बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ अपने दो छोटे भाइयों को सहारा दिया ......पिता के साथ कन्धा मिलाते हुए जीवन का सफ़र तय किया था.......2002 में वे सी. आर. पी. एफ. में भर्ती हो गए.......2004 में शादी की ........उनकी पत्नी वृंदा बस अगले महीने ही माँ बनने वाली थीं...........उससे पहले ही यह दुखद घटना घट गयी........! अल सुबह 2 बजे जब मैं शहीद के पार्थिव शरीर को लेकर बघराई गाँव पहुंचा तो ग्रामीणों का जमघट वहां था..........सन्नाटा चारों तरफ पसरा हुआ था........जैसे सी. आर. पी. एफ. की गाड़ी से तिरंगे में लिपटा शव उतारा गया तो लगा कि जवान यह पूरे गाँव का लाडला था..........हर और विलाप की आवाजें ........पत्नी और छोटे भाई का हाल रो-रो के जो हो रहा था .....मैं चाह के भी बयां नहीं कर सकता......पिता तो जैसे घटना पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे........चुप्पी सी लगी हुयी थी उनके होठों पर. यही हाल दूसरे शहीद अवधेश के घर का था. 25 साल सेवा कर चुके 45 वर्षीय अवधेश यादव ने अपने बड़े पुत्र की शादी अगले जून माह में तय कर दी थी.............तारीख भी मुकर्रर हो गयी थी.......11 जून............मगर शायद नियति को कुछ और ही मंज़ूर था उससे पहले यह घटना घट गयी . उनके दोनों बेटों और चौदह वर्षीय बेटी कंचन का विलाप देखकर किसी की आँखें नम हो सकती थीं.............सरयू के किनारे मुक्तिधाम घाट पर इन दोनों जवानों को सलामी के बीच अंत्येष्टि करते वक्त जो मंज़र था वो अब तक मेरी आँखों से उतरा नहीं है............ रात भर जगे होने के बावजूद......... उदास -टूटे हुए मन से पोस्ट लिखने बैठ गया.........बार-बार प्रवीन की पत्नी वृंदा का विलाप और अवधेश की चौदह वर्षीय बेटी कंचन का करुण क्रंदन कानों में गूंजता रहा ..............ऐसे में मन में बारम्बार यही प्रश्न कौंधता रहा कि आंतरिक अशांति से जूझते देश को इन दुखद स्थितियों से कैसे निजात मिलेगी ?

30 टिप्‍पणियां:

psingh ने कहा…

वाकई ६ अप्रैल का दिन भुलाया नहीं
जा सकता
यह दिन देश के लिए बहुत ही दुखद है
बेहद दुखद घटना अमर शहीद अवधेश
प्रवीन को भावभीनी श्रधांजलि|

'अदा' ने कहा…

बहुत दुखद घटना है यह...
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति और परिवार जानो को हिम्मत दे...
मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि ...!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सचमुच एक काला दिन था ६ अप्रेल. दिवन्गतों को श्रद्धान्जलि.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

क्या लिखें ,जो कुछ भी हो रहा है बहुत घातक है ,
किस क़ुसूर की सज़ा मिली उन शहीदों को ,हम लोग १०-१५ दिन दुखी होंगे बातें करेंगे फिर बस .....
समस्या तो घर वालों की है ,उस बच्चे की है जिसने दुनिया में अभी क़दम भी नहीं रखा ,उस बेटी की है जिसे पिता के सहारे की ज़रूरत थी,
अगर हम उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहते हैं तो हम जवानों को आदर ,सम्मान दें ,ट्रेन में अपनी बर्थ दें,उन की भावनाओं की क़द्र करना सीखें ,

जो लोग ये घिनौना कृत्य अंजाम दे रहे हैं वो शायद इंसान ही नहीं हैं और क्या कहा जा सकता है
सभी शहीदों को हम सब की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि

सत्यम न्यूज़ ने कहा…

देश के लिए ६ अप्रैल का दिन दुखद है.लोकतान्त्रिक देश में इस तरह की आन्तरिक अशांति हर स्तर पर घातक है .कहने के लिए इस घटना में मरने वालों की भलेही तादात ७६ हो लेकिन इस संख्या के पीछे जो सपने और जीते जी लोग मरे हैं उनकी गिनती कौन करेगा.अब वक़्त आ गया है कि सरकार ठोस कदम उठाये.आपके साथ हम भी इस दुखी की घडी में साथ है.

डॉ .अनुराग ने कहा…

इस देश को धीरे धीरे बिखरते देख क्रोध अपर अपनी विवशता देख हताशा होती है ....आदमी का इस्तेमाल कर उसे दूसरो की जान लेने के लिए तैयार करना .मुझे नहीं मालूम ये कैसी क्रांति है ओर कौन इसके लम्बर दार है .पर अभी तो आज़ादी हुए सौ साल भी नहीं हुए....

Rangnath Singh ने कहा…

भावभीनी श्रद्धांजलि.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

ठीक लिखा है आपने. एक टिप्पणी जो कई जगह दी यहां भी पोस्ट कर रहा हूं, यदि अन्यथा न लें.
पूरे देश में नक्सल वाद फैलने वाला है और देश गृहयुद्ध की भट्टी में जलने वाला है..
शोषण, पक्षपात, अन्याय, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, नेताओं का देश को विध्वंस करने का रवैया
अफसरों का राजाओं जैसा व्यवहार
कानून को पंगु बनाने वाले लोग...
माननीय बहुत जल्द यह पूरे देश में फैलेगा बस चेहरे अलग होंगे.

और दूसरा शहीदों के लिये
हे सैनिक मर

मर जायेगा तो क्या जायेगा ?
वोट बैंक भी तो नहीं है
फिर क्या पता कितने अपने कितने विपक्षियों के होते
हो सकता है कि साम्प्रदायिक होते,
धर्मनिरपेक्षियों के लिये न होते...
इसलिये मर..
आत्मा है अजर, अमर
इस पर विश्वास कर...
मर..

मरेगा तभी तो शहीद का दर्जा पायेगा...
तभी तो वादा कर पायेंगे तेरे बुत लगाने का..
एक पेट्रोल पम्प दिलाने का...
तू मरेगा तभी तो नोबेल शांति का हमें मिलेग..
शांति की जमीन पर ही तो खड़ा होता है दोस्ती का महल..
चल घर से निकल, टहल..
अपनी चेकपोस्ट पर पहुंच,
सीमा पर पहरेदारी कर,
और इंतजार कर,
दुश्मन की गोली का,
नेताओं की बेशर्म ठिठोली का,
घर से निकल,
बाजार चल, यात्रा कर,
और फिर इंतजार कर,
बम के फटने का, एक दुर्घटना घटने का,
कफन का, भाषण का..
नेताओं की कुटिल राजनीति के
राशन का.
मर.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

६ अप्रैल का दिन वाकई दुखद है!
सभी शहीदों को श्रद्धांजलि!

बेचैन आत्मा ने कहा…

इस घटना के बारे में जितना पढ़ता हूँ, जितना महसूस करता हूँ, दुःख होता है. जो आपने देखा वह कितना करूण होगा..! सोंच कर ह्रदय दहल जाता है।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

स्तब्ध कर देने वाली घटना है ...
सबसे बड़ा 'फेल्योर' तो सरकार का दिखता है .. पब्लिक को पब्लिक ही मार
रही है .. कोई विदेशी आतंकवादी नहीं आकर यह कार्य कर रहे हैं .. जनता का
विश्वास सरकार पर दो तरह से उठ रहा है ---
१) .. पहला यह कि सरकारी तंत्र से आस्था उठ रही है कि वह लापरवाही से
मुद्दे को देख रही है ... हमारे गृह मंत्री जी बस इतना कह कर मुंह छुपा लेते हैं
कि 'सोरी,चूक हो गयी' .. सैनिक भी पस्त हौसला होते हैं .. आखिर घर उजाड़ना
कैसे कोई बर्दास्त करेगा .. वृंदा और कंचन का विलाप वस्तुतः सरकार की
मूक - कार्यशैली को रेखांकित करती है .. जाने कितने विलाप और हो रहे हैं , कौन
सुनता है इनकी ... कुछ समय बाद सब आयी गयी हो जाती है .. दुखद है जनता का
'तंत्र' से विश्वास उठना ..
२) .. जिन क्षेत्रों में नक्सल हैं वहाँ की जनता भी इन नक्सलों की 'समानांतर सरकार'
में ज्यादा विश्वास करने लगी है , वह इनको 'लेवी' देकर ज्यादा सुरक्षित महसूस
करती है .. यह सरकारी तंत्र की दूसरी विफलता है ..
---------- अगर इन सबपर ध्यान न दिया गया तो मुल्क को बाहरी नहीं भीतरी
ताकतें ही कमजोर कर देंगी , ध्यान रहे कि इन विघटनकारी तत्वों को सहायता
देने में देश के शातिर पड़ोसी भी नहीं चूकते हैं .. समस्या दिनोदिन बढ़ रही हैं , हम सब
असहाय से हैं .. दुःख होता है कि हमें अभी जाने कितना 'वृंदा और कंचन का विलाप'
सुनना पडेगा , दुष्यंत याद आते हैं ---
'' हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए | ''

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

अंत में , टाइपिंग मिस्टेक = 'निकालनी' को 'निकलनी' पढ़ा जाय .. क्षमा !

वाणी गीत ने कहा…

गोलियां दोनों ओर से ही चली होंगी ...
मरने वाले और मारने वाले एक दूसरे के भाई ही रहे होंगे ...

बहुत दुखद ....!!

महफूज़ अली ने कहा…

आपकी यह पोस्ट ने अंतर्मन को हिला दिया....

BrijmohanShrivastava ने कहा…

अत्यन्त दुखद घटना ,शहीदों को श्रद्धांजलि ।किसी घटना के वारे मे सुनना देखना या पढना अलग बात है लेकिन घटना अपने गांव या नगर की हो ,अपनों से सम्बन्धित हो तो पीडा और बढ़ जाती है ।प्रबीण जिनकी माता का बचपन मे ही स्वर्गबास हो चुका हो पांच छ: साल पूर्व शादी हुइ हो ,पत्नी मां बनने वाली हो जब हम पाठको का सोच सोच कर बुरा हाल हो रहा है तो जिन घर वालो पर यह मुसीबत आई उन्का क्या हाल हो रहा होगा ।और अवधेश जिनके बेटे की शादी होने वाली हो । आपने किस बोझिल मन से पोस्ट लिखी होगी उस परिस्थिति को समझा जा सकता है । सिवाय धीरज धारण करने के और किया भी क्या जा सकता है

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ना ही इस हृदय विदारक घटना के लिये शब्द थे और न ही आपकी पोस्ट के लिये...!

बस उसी दिन से मन व्यथित है....!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बार-बार प्रवीन की पत्नी वृंदा का विलाप और अवधेश की चौदह वर्षीय बेटी कंचन का करुण क्रंदन कानों में गूंजता रहा ...........

ओह......दिल दहला देने वाली घटना है यह ......!!

रब्ब से दुआ है परिवार जनों को इस स्थिति से सामना करने के लिए हिम्मत और हौंसला दे .....!!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

करूण क्रंदन...


शहीदों को श्रद्धांजलि ...!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

उस हृदय-विदारक घटना को भूलने में वक्त लगेगा इस देश को ! अनुभूति चीत्कार कर उठी थी खबर सुनकर !
प्रविष्टि ने उस अनुभव को आत्मसात कर लिया है, वह दृश्य भी, विलाप भी ! छ्लक रहा हूं बार-बार !
शहीदों को श्रद्धांजलि !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

६ अप्रैल वाकई दुखद है ...सभी शहीदों को, प्रवीन को भावभीनी श्रधांजलि ..

KESHVENDRA ने कहा…

पवन भाई, आपकी इस पोस्ट ने आत्ममंथन करने को मजबूर कर दिया. पिछले ही सप्ताह की हिंदी आउटलुक पत्रिका में अरुंधती राय का नक्सल प्रदेशों की यात्रा कर के लिखा गया आलेख पढ़ा था. उनकी सहानुभूति पूरी तरह नक्सलों के साथ थी. और दूसरी तरफ वैसे लोग है जो इस समस्या को पूरी तरह कानून की समस्या के रूप में देखते हैं. नक्सल समस्या से निपटने के लिए सशस्त्र करवाई के साथ पिछड़े छेत्रों के विकास की दोहरी नीति अपनाये बिना काम नही चलेगा. इस जघन्य कांड में मारे गए जवानों को मेरी विनम्र श्रधांजलि .

ज्योति सिंह ने कहा…

waakai ye dinaak nahi bhoola jaa sakta ,darnaak ghatna ,un sabhi jawaano ko shat shat naman ,marmik

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Bhai mere, in mardooto ki jitni bhi bhartsna kee jaye kam hai!
Lekin, ye dhoti wale bhi kam nahin!

kshama ने कहा…

Jo afsaar Naxal wadi ilaqonko jante hain, unki salah gruhmantralay padhata tak nahi...aisi ghatna ghat jati hai, log/mantri aavesh me bol jate hain, aur phir wahee purani chal bedhangi!
Kendreey reserve police naxalwadiyon ka thaur thikana kaise jaan saktuii hai?
Aalekh padh man udvign ho gaya..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सचमुच एक काला दिन था ६ अप्रेल| दिवन्गतों को मेरी भावभीनी श्रद्धान्जलि|

Hariyali ने कहा…

sabhi shahidon ko sat sat bar naman. Ishwar unke parivar valon ko si dukh ko sahane ki shakti de.

रचना दीक्षित ने कहा…

देश के लिए ६ अप्रैल का दिन दुखद है. टी वी पर भी देखा ये सब पर आपकी पोस्ट पढ़ कर मन व्यथित हो गया बस मौन ही रहना चाहूंगी ...
अमर शहीद अवधेश, प्रवीन को भावभीनी श्रधांजलि|

श्रद्धा जैन ने कहा…

Aankh Nam hai .........

is kaale din ko kabhi koi nahi bhula paayega

dipayan ने कहा…

बहुत दुखद घटना का दिन था वो । जो बिछड़ गये, उनमे से कोई भाई, कोई बेटा, कोई शौहर रहा होगा । जाने कब इन्सानियत की जीत होगी । वो सुबह कभी तो आयेगी। जय हिन्द ॥

Rahul Singh ने कहा…

छत्‍तीसगढ आपसे और आप छत्‍तीसगढ से इस तरह जुडे पढकर दहल गयाा ऐसा तो शायद उस दिन भी महसूस नहीं हुआ थ, जिस दिन रायपुर के अखबारों में इस हादसे की खबर छपी थीा