सितंबर 01, 2010

सिंगापुर से (पार्ट-1) !











13 अगस्त की सुबह 7.30 बजे सिंगापुर के चाँगी एअरपोर्ट पर उतरने के बाद यह महसूस होने लगा था कि हम अब दुनिया के उस देश की सरजमीं पर कदम रख चुकें हैं जिसे दुनिया के सबसे विकसित और प्रगतिशील देश के रूप में जाना जाता है। सिंगापुर के अगले पाँच दिन नये - नये अनुभवों से परिपूर्ण रहे, वो चाहे सिविल सर्विसेज कॉलेज में सिंगापुर के प्रशासन के बारे में जानकारी लेना रहा हो अथवा भारतीय उच्चायुक्त कार्यालय में स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने का गौरवशाली क्षण रहा हो।
सिंगापुर के पब्लिक डिलीवरी सिस्टम को देखना समझना अपने - आप में नया अनुभव था। इस सिस्टम में सिंगापुर के लोकल ट्रेन (एम0आर0टी0) का सफर, लोकल बस सर्विस में यात्रा करना, पानी की कमीं से झूझते हुए देश में स्वच्छ पानी की आपूर्ति देखना, कन्क्रीट और सीमेण्ट की बहुमंजिली इमारतों के बीच जगह-जगह हरियाली व पार्कों का होना इस देश की बेहतरीन प्रशासनिक व्यवस्था और सुलझे हुए सिविक-सेन्स की अद्भुत दास्तान जैसा था। अपने सीमित संसाधनों के माध्यम से कोई देश कैसे आर्थिक प्रगति और खुशहाली का सफर तय करता है यह सिंगापुर से बेहतर दुनिया में शायद ही कहीं पर देखने को मिले। सिविल सर्विसेज कॉलेज सिंगापुर में बहुत रोचक क्लास रूम माहौल में वहां के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सिंगापुर के प्रशासन के बारे में जानना-समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा। योजनाओं का निर्माण और उनका सफलता पूर्वक क्रियान्वयन सिंगापुर की पहचान है। हैरानी की बात यह थी कि सिंगापुर में नीति निर्माण को लेकर उच्च प्रशासकीय स्तर पर जब़रदस्त प्रतिबद्धता देखने को मिली। अर्बन रि-डेवलपमेण्ट अथॉरिटी तथा पब्लिक यूटीलिटी बोर्ड के अधिकारियों से मिलने के बाद यह धारणा और भी पुख्ता हुई कि किसी भी योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए दूरदर्शिता, संसाधनों के अधिकाधिक उपयोग तथा प्रशासकीय प्रतिबद्धता अत्यन्त आवश्यक है।
पचास लाख जनसँख्या वाले सिंगापुर की एक पहचान यह भी है कि इस सिटी - स्टेट में सब-कुछ व्यवस्थित सा दिखता है। बड़ी-बड़ी इमारतों के ऊपर हरियाली बनाए रखने का जज्ब़ा इस देश को इको-फ्रेण्डली बनाए हुए है। मरीना बीच पर फ्लायर पर पूरे शहर को देखना अद्भुत था। सत्तावन मंजिली इमारत की छत पर बाग होना एक आश्चर्य से कम नहीं था।यह सौभाग्य था कि जब हम सिंगापुर पहुँचे तो दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम हमारे सामने हुए। सिंगापुर मे स्वतंत्रता दिवस 09 अगस्त को मनाया जाता है। 13 अगस्त को जब हम सिंगापुर पहुँचे तो यह देश स्वतंत्रता दिवस के जोश मंे पूरी तरह डूबा हुआ था। जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज फहरे हुए थे। दूसरी महत्वपूर्ण घटना यह थी कि 13 अगस्त को ही सिंगापुर में यूथ-ओलम्पिक गेम्स का शुभारम्भ हुआ था, जिस कारण पूरा शहर/राष्ट्र जोश मंे डूबा हुआ था।
सिंगापूर में कुछ भारतीय मित्रों से मिलना सुखद अहसास रहा। अरुण दीक्षित जी से यहाँ पहली बार मुलाकात हुई। वे एसेन्चर कन्सल्टेण्ट कम्पनी में कार्यरत हैं। उनके कुछ रिश्तेदारों से मेरी मित्रता भारत मे थी, उन्हीं के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि सिंगापुर में श्री अरुण दीक्षित कार्यरत हैं। सिंगापुर जाने के बाद स्वयं अरुण दीक्षित द्वारा मुझसे सम्पर्क करना उल्लेखनीय बात थी। श्री दीक्षित द्वारा अपने स्थानीय भारतीय मित्रों से मिलवाना भी इसी मुलाकात को महत्वपूर्ण अंग रहा। यहाँ आने के बाद लखनऊ से सर्वत एम0 द्वारा फोन पर बताया गया कि ब्लागर श्रद्धा जैन भी सिंगापुर में ही है। श्रद्धा जी को मैं विगत लम्बे अर्से से पढ़ता चला आ रहा था। गज़ले लिखने में श्रद्धा जी ने ब्लॉग समुदाय में अपनी अच्छी पहचान बनाई है। सर्वत एम साहब ने मुझे और श्रद्धा जी को मिलवाने में महत्वपूर्ण मध्यस्थ की अदा की। श्रद्धा जी के घर जाकर उनको सुनना और लज़ीज डिनर लेना इस यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। श्रद्धा जी के साथ उनके पति प्रशान्त जैन से मिलना अतिरिक्त उपलब्धि रही प्रशान्तजी भी कम्प्यूटर एनालिस्ट हैं जो किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्यरत हैं। प्रशान्तजी का सेन्स ऑफ ह्यूमर इतना लाजबाब था कि हम तीन-चार घंटे लगातार हंस-हंस कर लोट-पोट होते रहे। हर एक बात पर उनके ‘‘वन लाइनर कमेण्ट’’ हंसी-ठहाके का वातावरण तैयार कर देते थे। इसके अलावा मैनपुरी के ही एक अन्य कम्प्यूटर एनालिस्ट श्री विक्रम और उनकी पत्नी अम्बिका से मिलना और उनके साथ लिटिल इण्डिया, फेयरर पार्क घूमना अविस्मरणीय रहा।
क्रमश:

21 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

सार्थक सिंगापुरी यात्रा !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आपने सिंगापूर के बारे में बिलकुल सही लिखा है..ये अजीब देश है...मजाक में लोग इसे फाइन देश कहते हैं क्यूँ की यहाँ हर छोटी मोटी गलती के लिए भी फाइन देना पड़ता है...:)) मैं खुद अपनी डायरी एक टेलीफोन बूथ पर (कोई दस साल पहले की घटना है ) छोड़ने के जुर्म में बीस सिंग डालर फाइन के दे चूका हूँ...ऐसा लगता है जैसे पूरा देश एक खूबसूरत बगीचे में बसा हुआ है...हरियाली सफाई अनुशाशन सब उच्च कोटि का है वहां...और दर्शनीय स्थलों की तो भरमार है...यूँ तो पूरी दुनिया घूमा हूँ लेकिन मुझे सिंगापूर जाना हमेशा अच्छा लगता है...
आप श्रधा जी से मिले जान कर अच्छा लगा..उनसे मुंबई में मुलाकात होनी थी लेकिन नहीं हो पाई अब कभी वहीँ जा कर शायद उनसे भेंट हो...उनके पतिदेव प्रशांत जी की आपने इतनी प्रशंशा की है के मिलने की चाह बढ़ गयी है...इश्वर दोनों को खूब खुश रखे...

नीरज

बेचैन आत्मा ने कहा…

सुदंर संस्मरण.

अभिषेक ओझा ने कहा…

हम सिंगापूर जाते जाते इधर आ गए :) नहीं तो आपसे मुलाकात हो गयी होती. बढ़िया संस्मरण.

श्रद्धा जैन ने कहा…

Ham dono ko bhi aapse milkar bahut khushi hui ....Prashant aapke bare mein poochte hain .. Sarwat ji ka shurkiya ki unhone ek achcha dost diya ....

Neeraj ji aapse milne ki bahut ichcha hai, last time galatfahmi ke karan rah gaya agli baar aapse zarur milungi... singapore aane ka phir se plan banaye ham dono ko bahut khushi hogi ...

महफूज़ अली ने कहा…

यह ट्रेवलोग तो बहुत ही शानदार लगा.... मुझे तो आपसे जानने की क्यूरोसिटी है... मैं फोन करता हूँ कल...आपको....

सर्वत एम० ने कहा…

सिंगापुर के बारे मे जैसा सुना था वैसा ही आप की लेखनी ने रचा भी. शर्म भी मह्सूस हुई कि एक नन्हा सा देश और तरक़्क़ी की दौड मे हम से कोसे आगे. श्र्द्धा और प्रशांत दोनो ही बेह्द मिलंसार है और आप ने प्रर्थी को नाहक़ स्मेत लिया इस पोस्ट मे.
मन नही भरा अभी.

Vijay ने कहा…

Hope this experience will be definetly a trigger for new thought process/ idea for betterment of reform process in our country situation/ scenerio.

Offcourse now u have opportunity and responsibilty as well to bring another hight for country....
....
reagrds/vijay/ntpc

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सब से पहले बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं नयी पोस्टिंग की !
मैनपुरी जल्दी आइये फिर आपके साथ बैठ कर इन पलो को साथ साथ जीना है ! वैसे भी जिस तरह से आप ने यहाँ लिखा है उस को पढ़ कर यही मलाल होता है कि काश हम भी साथ होते ! किसी भी जगह के विकास में वहाँ के लोगो का बहुत बड़ा योगदान होता है ......सिंगापूर के बारे में यह कहना एकदम सटीक होगा कि वहाँ के लोगो में हम लोग से ज्यादा सिविक सेन्स है!

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा वृतांत..

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

भारत को सिंगापुरी डंडा मंगवा ही लेना चाहिये.

संजीव गौतम ने कहा…

यात्रा वृतान्त भी बिल्कुल सिंगापुर की तरह आकर्षक। एक ही सांस में पठनीय। हमारे लिए तो सिंगापुर का मतलब है आदरणीय श्रद्धा जी। आप उनसे मिले तो लगा कि हम मिल लिए। यात्रा की बहुत-बहुत बधाई। आगे की कड़ी का इंतजार विस्तार से लिखिए।

Bhavesh (भावेश ) ने कहा…

अच्छा संस्मरण. नीरज जी सिंगापुर अब दस साल पहले से काफी बदल गया है. कुछ नियम में भी ढील और कई जगह पर आजकल कम सफाई भी दिखती है. दस साल पहले यहाँ कसीनो नहीं थे अब दो दो है और अच्छा राजस्व कमा कर सरकार को दे रहे है. सरकार समय के अनुसार बदलाव करती रहती है. कल की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पचास लाख की आबादी में यहाँ करीब दस प्रतिशत भारतीय है.

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत बढ़िया, सिंगापूर तो हमेशा से ही पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है.

श्री कृष्ण जन्माष्ठमी की बहुत-बहुत बधाई, ढेरों शुभकामनाएं!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

आपकी अपनी यायावरी शैली में पढ़ा यह वृत्तांत | सुष्ठु रूप में डायरी के पृष्ठों को पढ़ने जैसा | 'क्रमशः' को देखकर अगले की प्रतीक्षा अभी से !
@सर्वत एम साहब ने मुझे और श्रद्धा जी को मिलवाने में महत्वपूर्ण मध्यस्थ की अदा की।
--- ''भूमिका'' ( या इसी वजन का कोई और शब्द ) शब्द शायद छूट गया है | यथेष्ट अर्थ नहीं निकल रहा है | आभार !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी सिंगापुर यात्रा का व्रतांत बहुत अच्छा लगा ... श्रधा जी के बारे में जानकार भी अच्छा लगा ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

singhsdm ji
नमस्कार !
" सिंगापुर से पार्ट 2 " का इंतज़ार अभी से शुरू है ।
बहुत रोचक विवरण दिया है आपने …
और हम सबकी प्रिय स्नेहमूर्ति मलिका -ए - ग़ज़ल श्रद्धा जैन जी से आपने साक्षात् मुलाकात की है , प्रशांत जी समेत … ईर्ष्या हो रही है आपसे ।

आपकी नई ग़ज़ल का भी इंतज़ार है …


शुभकामनाओं सहित …
- राजेन्द्र स्वर्णकार

'अदा' ने कहा…

बहुत रोचक विवरण...!
आपकी पोस्ट हो और ग़ज़ल न हो...
ई नहीं जमता..
हाँ नहीं तो..!!

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

गौतम राजरिशी ने कहा…

...तो इसलिये जनाब का फोन नहीं मिल रहा था। अब तो आप वापस भी आ गये हैं और मैं अब पढ़ रहा हूँ ये रोचक यात्रा-वृतांत।

श्रद्धा जी से मिलना सचमुच आनंददायक रहा होगा, ये मेरे जैसा उनकी ग़ज़लों का फैन अच्छी तरह समझ सकता है।

तिलक राज कपूर ने कहा…

2 सितम्‍बर को प्राप्‍त सूचना पर आज लगभग 25 दिन बाद अमल।
बहरहाल आपके यात्रा-वृतान्‍त से हमें भी सिंगापुर का आनंद मिल गया।
पता नहीं आपका ध्‍यान गया या नहीं यह नाम भारतीय मूल का है और रामायण काल से संबंध भी रखता है।