सितंबर 22, 2012

अरसे बाद ग़ज़ल  कही है...... ! आप की खिदमत में हाज़िर कर रहा हूँ_____----

किया सब उसने सुन कर अनसुना क्या
वो खुद में इस क़दर था मुब्तिला क्या

मैं हूँ गुज़रा हुआ सा एक लम्हा
मिरे हक़ में दुआ क्या बद्दुआ क्या

किरन आयी कहाँ से रौशनी की
अँधेरे में कोई जुगनू जला क्या


मुसाफ़िर सब पलट कर जा रहे हैं
‘यहाँ से बंद है हर रास्ता क्या’

मैं इक मुद्दत से ख़ुद में गुमशुदा हूँ
बताऊँ आपको अपना पता क्या

ये महफ़िल दो धड़ों में बंट गयी है
ज़रा पूछो है किसका मुद्दु’आ क्या

मुहब्बत रहगुज़र है कहकशां की
सो इसमें इब्तिदा क्या इंतिहा क्या

17 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

"मैं इक मुद्दत से ख़ुद में गुमशुदा हूँ
बताऊँ आपको अपना पता क्या"

वाह ... मेरे हिसाब से तो हासिल ए ग़ज़ल शेर है यह !

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

थोड़ा कहा बहुत समझना - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

वाह बहुत खूब

रश्मि प्रभा... ने कहा…


मैं इक मुद्दत से ख़ुद में गुमशुदा हूँ
बताऊँ आपको अपना पता क्या....are waah

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

ये महफ़िल दो धड़ों में बंट गयी है
ज़रा पूछो है किसका मुद्दु’आ क्या

बहुत दिन बाद कही है ,गज़ल बढ़िया कही है .

मैं भी मुंह में जुबां रखता हूँ ,

काश पूछो के मुद्दा क्या है .

लोग कहतें हैं उनको ये पूडल ,

कोई पूछो तो मांजरा क्या है ?

ram ram bhai
शनिवार, 22 सितम्बर 2012
असम्भाव्य ही है स्टे -टीन्स(Statins) से खून के थक्कों को मुल्तवी रख पाना

ram ram bhai
शनिवार, 22 सितम्बर 2012
असम्भाव्य ही है स्टे -टीन्स(Statins) से खून के थक्कों को मुल्तवी रख पाना

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत सृजन, बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें , अपना स्नेह प्रदान करें.

Arvind Mishra ने कहा…

आपकी रचनायें बहुत इंटेंस होती हैं डीपनेस के साथ -बहुत खूब!

सोनरूपा विशाल ने कहा…

"मैं इक मुद्दत से ख़ुद में गुमशुदा हूँ
बताऊँ आपको अपना पता क्या

ये महफ़िल दो धड़ों में बंट गयी है
ज़रा पूछो है किसका मुद्दु’आ क्या

ये दो शेर विशेष पसंद आये .....

mridula pradhan ने कहा…

मुहब्बत रहगुज़र है कहकशां की
सो इसमें इब्तिदा क्या इंतिहा क्या....kya baat hai.....

alka sarwat ने कहा…

सो इसमें इब्तिदा क्या इंतिहा क्या...

kumar uday ने कहा…

gr8....

हेमन्त कुमार ने कहा…

अत्यन्त सारगर्भित , आभार !

Rangnath Singh ने कहा…

गजल पसंद आई...

वीनस केसरी ने कहा…

मैं हूँ गुज़रा हुआ सा एक लम्हा
मिरे हक़ में दुआ क्या बद्दुआ क्या

मुहब्बत रहगुज़र है कहकशां की
सो इसमें इब्तिदा क्या इंतिहा क्या

पवन जी,
इन दो शेर के लिए विशेष बधाई स्वीकारें
रिवर्स कंट्रास्ट क्या निखर कर आया है
वाह वा

tbsingh ने कहा…

sunder rachana.

Rohit "meet" ने कहा…

WAH BAHUT UMDA GHAZAL BHAIYA

Dr Moolchand Gautam ने कहा…

दार्शनिक अंदाज