जुलाई 01, 2010

"आइस ब्रेकिंग" ग़ज़ल......!

काफी दिनों के बाद आज ब्लॉग को देखा तो अपनी मशरूफियत का एहसास हुआ.....न कोई पोस्ट न कोई टिप्पणी .......गोरखपुर से मसूरी का ये सफ़र बहुत ही शांति से गुज़र रहा है.....इस ख़ामोशी को एक ग़ज़ल के साथ तोड़ रहा हूँ एक ग़ज़ल के साथ......मगर यह ग़ज़ल मेरी न होकर मेरी हमसफ़र और शरीके हयात अंजू की है...... ग़ज़ल कच्ची है, गलतियाँ होनी ही हैं....! मगर फिर भी पेश है ये ग़ज़ल अपने उसी रूप में बगैर किसी इस्लाह के.......!

हवाओं का दरख्तों से मुसलसल राब्ता है
कि उसकी याद का खुश्बू से जैसे वास्ता है !!
हसीं मंज़र है वो नज़रों में उसको कैद कर लो
इन्ही लम्हों से सदियों का निकलता रास्ता है !!
तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता है !!
हरे पत्तों पे ठहरी बारिशों कि चाँद बूँदें
इन्ही आँखों से उन अश्कों का गहरा रस्स्ता है !!
किसी भी हाल में 'गेसू' कभी तन्हा कहाँ है
कि गोया साथ उसके चल रहा एक रास्ता है !!
जल्दी मुलाक़ात होगी एक नयी ग़ज़ल के साथ

21 टिप्‍पणियां:

आचार्य उदय ने कहा…

सार्थक अभिव्यक्ति।

माधव( Madhav) ने कहा…

nice

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया !!

Sulabh Jaiswal "सुलभ" ने कहा…

पवन जी, बहुत अच्छे भाव हैं ग़ज़ल में.

हसीं मंज़र है वो नज़रों में उसको कैद कर लो
इन्ही लम्हों से सदियों का निकलता रास्ता है !

ये शेर बहुत पसंद आया है.!! दाद की हक़दार हैं "हमसफ़र"!

तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता है !!

अचानक वासिम साहब का एक शेर याद आ गया "...क्या इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना जरुरी है"
इंतज़ार है अगले पोस्ट का.

Udan Tashtari ने कहा…

हसीं मंज़र है वो नज़रों में उसको कैद कर लो
इन्ही लम्हों से सदियों का निकलता रास्ता है !



उम्दा शेर है! बधाई!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता है !..

शरीके हयात ने तो अपनी सादगी कुछ ही लफ़्ज़ों ... या यूँ कहूँ इतने लाजवाब शेर में उतार दी है .... ग़ज़ब की शेर है ....

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

उम्दा शायरी है...
आगाज़ का यह आलम है तो अंजाम क्या होगा...:)

निर्मला कपिला ने कहा…

तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता है !..
वाह क्या खूबसूरत शेर हैं । आपकी शरीके हयात को बहुत बहुत बधाई शुभकअमनायें । इन्तजार रहेगा अगली गज़ल का।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अब यह बतायें कि आपने अपनी उनसे सीखा है या आपकी उन्होंने आपसे...
वैसे भाव बढ़िया हैं...

sonal ने कहा…

तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता
bahut khoobsoorat gazal

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

तेरी चाहत के दरिया में उतर कर सोचते हैं
कि इसके बाद भी जीने का कोई रास्ता है !!

क्या खूब कहा...उम्दा प्रस्तुति..बधाई

Himanshu Mohan ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत और नाज़ुक़ शायरी है
मज़ा आ गया!

नीरज मुसाफ़िर ने कहा…

बहुत खूबसूरत।

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत खूब , सुन्दर पंक्तियाँ
हवाओं का दरख्तों से मुसलसल राब्ता है
कि उसकी याद का खुश्बू से जैसे वास्ता है !!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल !

अब यह बताइए जनाब ..............तबियत कैसी है अब ??

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

खूबसूरत!

गौतम राजऋषि ने कहा…

अरे वाह-वाह पवन साब...मैम ने तो कमाल कर दिया है। ऊपर वाले ने एकदम चुन कर आपदोनों को मिलवाया है...

मैम को सैल्युट है। मतले ने और इस मिस्रे ने खासकर "इन्ही लम्हों से सदियों का निकलता रास्ता है" मन मोह लिया है।

कैसी चल रही है मसूरी में? पुराने ट्रेनिंग के दिन याद आ रहे होंगे... ;-)

daanish ने कहा…

huzoor
bahut hi achhee gzl padhvaaee aapne
har sher kisi shaayar ke zehn se nikalaa huaa .... !!

शरद कोकास ने कहा…

उम्दा गज़ल है भाभी जी को बधाई कहें ।

Vijay ने कहा…

Sir,

पहली बार भाभी जी ग़ज़ल आपके पोस्ट पर पढने को मिली और ग़ज़ल के प्रति उनकी चाहत की अनुभूति हुई. आप शब्दों के चयन और व्याकरण का हवाला देकर जज्बात को कम नहीं कर सकते क्योकि किसी मशहूर shyaar ( नाम नहीं याद आ rahan ) हैं:-


"तेरे चिराग अलग, मेरे चिराग अलग,
मगर उजाला तो फिर भी अलग नहीं होगा "

regards/vijay

Amrendra Nath Tripathi ने कहा…

यह कच्ची ( जैसा कि आपने लिखा है ) गजल भी कितनी पकी सी है !
अब कुछ उर्दू शब्दों का शब्द ज्ञान बढ़ाना होगा , नहीं तो आस्वादन और
चिंतन दोनों नहीं कर पाउँगा ! आभार !