अक्टूबर 29, 2010

अलविदा वियतनाम !











वियतनाम दरअसल अंकल 'हो' का देश माना जाता है............... सो इस यात्रा वृत्तांत की चर्चा इसी महान व्यक्तित्व से किया जाना उचित होगा। अंकल 'हो' अर्थात 'हो-चि-मिन्ह', जिनका नाम मार्क्स क्रांति के प्रबल पुरोधा के रूप में लिया जाता है. हो-चि-मिन्ह को मार्क्स, ऐंजिल्स, लेनिन, स्टालिन के समकक्ष माना जाता है. अंकल 'हो' की कहानी, सर्वहारा क्रांति तथा राष्ट्रवादियों के लिए विश्व की तत्कालीन साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष की अद्भुत दास्तान हैं. 1890 में हो-चि-मिन्ह का जन्म साम्राज्यवादी शोषण से पीड़ित देश, वियतनाम में हुआ था जहाँ उस समय राष्ट्रवाद की सजा मौत होती थी..............! साम्राज्यवादियों को चुनौती के रूप में 'हो' ने वियतनाम में राष्ट्र नायक की पहचान बनाई...... इसी दरमियां हो-चि-मिन्ह ने फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड देशों की यात्रा की और साम्राज्यवादी शोषण को और करीब से समझा-देखा. इन यात्राओं के बाद साम्राज्य वादी शक्तियों के विरुद्ध 'हो' के तेवर और मुखर हो गए. 1917 की रूसी क्रांति से आकर्षित होकर वे फ्रांसीसी कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और 'दी पारिया' नमक पत्र प्रकाशित करना आरंभ किया, जो फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के विरुद्ध उसके सभी उपनिवेशों में शोषित जनता को क्रांति के लिए प्रोत्साहित करती थी. साम्राज्वाद से अपने देश को मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने 1933 में 'वियत मिन्ह' नामक संयुक्त मोरचा बनाया। 'हो' 1945 तक हिंद चीन के कम्यूनिस्ट आंदोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के सक्रिय नेता रहे. वे 'लंबे अभियान' और जापान विरोधी युद्ध में भी उपस्थित थे. कालांतर में सितंबर, 1945 में 'हो' ने वियतनाम जनवादी गणराज्य की स्थापना की. आज़ादी के इस संघर्ष में उनकी सेना का फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों से युद्ध शुरू हुआ, यहाँ फ़्रांसिसी- अंग्रेजों का गठबंधन हुआ, साम्राज्यवादियों ने साम्राज्य वापस लेना चाहा. भयंकर लड़ाइयों का दौर आरंभ हुआ और आठ वर्षों की खूनी लड़ाई के पश्चात् फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को 'दिएन वियेन फू' के पास 1954 में भयंकर मात खानी पड़ी, तत्पश्चात् जिनेवा सम्मेलन बुलाना स्वीकार किया गया. इसी वर्ष हो-चि-मिन्ह वियतनामी जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति नियुक्त हुए. बहरहाल 1969 तक जब तक हो जिंदा रहे , ताउम्र साम्राज्यवादियों की आखों की किरकिरी बने रहे.

इस महान नेता के मेमोरिअल म्यूजियम पर जाना और इस सर्वकालिक महान नेता के पार्थिव शरीर को देखना वास्तव में इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि रही। मद्धम प्रकाश में मुसोलियम के केन्द्रीय कक्ष में इस नेता को शरीर को जिस तरह रासायनिक तरीके से संरक्षित किया गया है, वो चमत्कारिक था. इस नेता के प्रति इस देश की जनता की अगाध श्रद्धा है, इसका प्रमाण यह है कि इस नेता को याद करने और इनके संरक्षित शरीर के दर्शनार्थ मुसोलियम के बाहर लम्बी लाइन हमेशा देखी जा सकती है.

वियतनाम का दूसरा आकर्षण यहाँ की 'लाइफ स्टाइल' देखना रहा............ हनोई की सडकों को दोनों और स्ट्रीट फ़ूड की हजारों दुकाने है.......... जहाँ अलसुबह से रात भर चहल-पहल बनी रहती है। यहाँ छोटे छोटे स्टूलों पर बैठकर वियतनामी जनता सूप-व्यंजनों का आनंद लेते हुए हमेशा देखी जा सकती है. सड़क के फुटपाथ इन्ही स्ट्रीट फ़ूड दुकानों से हर समय सजी रहती हैं. यहाँ के नाईट मार्केट के बारे में अवश्य लिखना चाहूँगा......... यहाँ नाईट मार्केट में शौपिंग करने का अपना अनोखा अनुभव है.............! इस मार्केट में भारी भीड़ में धक्के खाते हुए रोज़मर्रा की चीजों को खरीदते हुए जन सामान्य का उत्साह देखते ही बनता है....!

वियतनाम का एक अन्य आकर्षण यहाँ का सिल्क है . वियतनाम में सिल्क (रेशम) निर्माण करने की पुरानी परम्परा है. वियतनाम में सदियों से सिल्क को बनाने और एम्ब्रोइडरी का काम किया जा रहा है. वियतनाम के ग्रामीण अंचलों में बड़े पैमाने पर सिल्क को बुनने का काम किया जाता है. इस काम में वियतनामी महिलाओं को विशेषज्ञता हासिल है, वे समूह बनाकर सिल्क को बुनने का काम करती हैं. वियतनाम के सिल्क मार्केट से हमने सिल्क के बहुत से वस्त्र हमने ख़रीदे............ ये प्रोडक्ट अपेक्षाकृत सस्ते और बहुत खूबसूरत थे.

हमारा अगला पड़ाव 'हेलोंग बे' रहा. यह यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्थल भी है........... लगभग 1600 वर्ग किमी के क्षेत्रफल में फैली इस साईट को पानी के जहाज से देखना अत्यंत रोमांचक रहा। चरों और विशालकाय लाइमस्टोन के पहाड़ों के बीच से गुजरते हुए इन प्राकृतिक दृश्यों को देखना रुचिकर रहा. इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था को जानना समझना भी नवीन अनुभव रहा. ‘कम्यूनों‘ को और उनकी व्यवस्थाओं को देखना रूचिकर था, ‘कम्यून‘ एक प्रशासनिक इकाई है,ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश में ‘लोकल अर्बन बॉडी‘ हो. स्थानीय 'कम्यून' अपने सीमा के अन्तर्गत सार्वजनिक सम्पत्तियों, प्रशासन, पब्लिक डिलीवरी सिस्टम के लिए जिम्मेदार होती है. हमने हनोई से लगभग पचास कि0मी0 आगे एक ‘कम्यून‘ की व्यवस्था का अध्ययन किया. कम्यून द्वारा संचालित स्कूल, स्टेडियम और अस्पताल को देखने का अवसर मिला. कम्यून जिस प्रतिबद्धता और ईमानदारी से इन सार्वजनिक संस्थाओं को संचालित कर रहे हैं, वह वियतनाम के प्रशासन में कम्यून व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रकट करते हैं.

बहरहाल एक सप्ताह बाद जब हनोई से हम भारत के लिए विदा हुए तो, इस देश की बहुत सी यादों का पिटारा हमारे साथ था। विदाई के समय एहसास हुआ कि हम एक ऐसे विकासशील देश की यादों को संजोकर वापस हो रहे हैं जो असीम संभावनाओं से भरा हुआ देश है. एक ऐसा देश जो भले ही आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न न हो, मानसिक रूप से अत्यन्त दृढ है। अपनी मुख्तलिफ पहचान बनाये रखने के लिए इस देश के न केवल नेताओं ने बल्कि जन सामान्य ने साम्राज्यवादी शक्तियों से जिस मजबूती से लोहा किया है वह अदभुत तो है ही प्रेणादायक भी.

इस देश में भारतीयों से मुलाकातें नहीं हो सकीं. अंकल 'हो' के इस देश को इतने करीब से देखना किसी के लिए भी नया अनुभव हो सकता है....इस देश का इतिहास, लोक संस्कृति, परम्पराएं इस देश को और करीब से जानने की उत्कंठा जगाती हैं........! इन्ही यादों को जेहन में समेटे हुए अपने प्लेन की खिड़की से वियतनाम को अलविदा कहा तो लगा कि इस विकासशील देश को अगले दस वर्षों में विकास की सीढियां चढ़ने से शायद ही कोई रोक पाए......!

अक्टूबर 05, 2010

वियतनाम यात्रा पार्ट-1







सिंगापुर के चांगी एयरपोर्ट से वियतनाम विदा होते वक्त दिल में उदासी और प्रशन्नता दोनों भावों का अहसास हो रहा था। उदासी का एहसास इसलिए कि बीते सप्ताह सिंगापुर को बहुत नजदीक से देखने-समझने का अवसर मिला था। सिंगापुर की बहुलवादी संस्कृति, विकास के प्रतिभान, सिविक सेंस, प्रशासनिक कर्मठता इत्यादि को करीब से देखने के बाद दिल में यह जज्बा कुलांचे मारने लगा था कि कुछ ऐसा ही परिवर्तन अपने देश में भी किया जाए। सिंगापुर में भारतीय मित्रों ने जो प्यार-सम्मान दिया था , उसे भी दिल भुला नहीं पा रहा था। सिंगापुर के दर्शनीय स्थलों ने दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी थी, उसे भुलाना भी इतना आसान न था। सिंगापुर की यादों से निकलने का जी नहीं चाह रहा था, सो उदासी का घेरा मन के चारों ओर था किन्तु वियतनाम जैसे देश में पहुँचाने की लालसा भी अपनी जगह थी।



बहरहाल इस मानसिक उतार-चढाव में हिलोरे खाते हम सिंगापुर से विदा हुए। लगभग तीन घण्टे की हवाई यात्रा के बाद हम वियतनाम के नोई-बाई एअरपोर्ट पर जब उतरे तो विकसित एवम् विकासशील राष्ट्र के बीच का अन्तर स्पष्ट दिखने लगा। सिंगापुर में जहॉ सब कुछ व्यवस्थित सा था वहीं हनोई के इस एअरपोर्ट पर वह 'प्रोफेसनल कॉम्पीटेंसी' नहीं दिखी। इमीग्रेशन इत्यादि क्लीयर कराने में ही दो घण्टे से ज्यादा वक्त लग गया। इस थकाऊ प्रक्रिया के बाद हम ‘मिनी बस‘ से रवाना हुए अपने होटल ‘सिल्क पथ‘ की तरफ। हनोई एअरपोर्ट से हमारा होटल लगभग 35किमी0 दूर था। होटल की तरफ जाते वक्त हनोई की सड़कों का नज़ारा ऐसा एहसास दिला रहा था था कि जैसे हम अपने ही देश में हों। इन सडकों पर भी भारी ट्रैफिक था। सडको पर कार, बड़े वाहन, दुपहिया वाहन, साइकिल, पैदल और तो और पशु-जानवर सब एक साथ चल रहे थे। हनोई शहर में ट्रैफिक भी उतना ही अव्यवस्थित था जितना कि हमारे देश के किसी मध्यम स्तर के शहरमें हों। सडकों पर दुकानों का फैलाव भी कमोबेश अपने देश के ही किसी शहर की याद दिला रहा था। 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 70 प्रतिशत हयूमिडिटी के वातावरण में हनोई के 'सिल्क पथ' होटल में पहुँच कर यहॉ के मौसम में गर्मी की तीव्रता का एहसास हुआ। सिल्क पथ पहुँच कर यह आदेश मिला कि हमें तत्काल 'नेशनल अकेडमी ऑफ़ पब्लिक एड्मिनिस्त्रेसन' पहुँचना है। हालांकि हम हवाई यात्रा व तदोपरान्त इस सड़क यात्रा के बाद पर्याप्त रूप से थक चुके थे किन्तु आदेश के पालन के लिए तत्काल राष्ट्रीय अकादमी निकल लिए।



हनोई की सडकों पर यात्रा करने का यह अनूठा अनुभव था। होटल से अकादमी की दूरी लगभग 10-12 कि0मी0 रही होगी। इस यात्रा के दौरान हनोई के बाजार, लोगों, सामान्य रहन-सहन, व्यवहार आदि के विशय में एक राय पुख्ता आकार लेने लगी थी। हनोई की इन कम चौड़ी सडकों पर दुपहिया वाहनों की भरमार थी हालाँकि चैपहिया वाहनों की संख्या काफी कम थी। लगभग आधे घण्टे की यात्रा के बाद हम अकादमी पहुंचे । अकादमी में घुसते ही लगा कि किसी ‘‘टिपिकल गवर्नमेण्ट आफिस बिल्डिंग‘‘ में आ चुके हैं। अकादमी के परिचयात्मक सत्र में वियतनाम के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने-वार्ता करने का अवसर प्राप्त हुआ। उनसे मिलते समय हैरानी हुई की वरिष्ठतम नौकरशाह भी ‘वियतनामीज‘ भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे। हमारी सम्प्रेषण की भाषा तो अंग्रेजी थी किन्तु वियतनामी अधिकारी अपनी राष्ट्र भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे, सहूलियत के लिए अनुवादक की व्यवस्था थी , लेकिन इसके बावजूद आपसी सम्प्रेषण में तारतम्यता का अभाव साफ दिख रहा था। बहरहाल इस अभाव के बावजूद वियतनामी लोगों का अपनी भाषा के प्रति लगाव प्रशंसनीय तो था ही.........।



अगले कुछ दिन इसी तरह वियतनाम में गुजरे। हर दिन वियतनाम से जुडाव गहराता गया। यहॉ के जन सामान्य पर अपनी प्राचीन इतिहास- संस्कृति-सभ्यता और भाषा का प्रभाव साफ नजर आता है। वियतनाम के वर्तमान पर कुछ लिखने से पूर्व वियतनाम के बारे में कुछ सामान्य जानकारी देना आवश्यक समझता हूँ । 86 मिलियन जनसंख्या वाले इस देष में 90% साक्षरता है और आधी जनसंख्या बौद्ध धर्म की अनुयायी है। 02 सितम्बर, 1945 को आजाद होने के बाद 15 अप्रैल, 1952 को इस देश में नया संविधान बना। प्रशासकीय दृष्टिकोण से यह देश 58 प्रान्तों तथा 5 म्यूनिसपैलिटीज में विभाजित है। ‘हनोई‘ जो वियतनाम की राजधानी है, वह भी एक म्यूनिसपैलिटी ही है। 1052डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले इस देश की विकास दर 5% से कुछ ज्यादा है । इस देश में आय के साधन कोयला, कच्चा तेल, जस्ता, तांबा सोना, मैगनीज जैसे खनिज हैं। इनके अतिरिक्त चावल, कॉफी, मक्का, काजू, मसाले (काली मिर्च), आलू, मूंगफली मछली आदि उत्पाद भी देश के विकास में महती योगदान देते हैं।



वियतनाम का इतिहास लगातार बनता-बिगड़ता रहा है। चीन, जापान और फ्रांस की सभ्यताओं ने इस देश के इतिहास- सभ्यता को समय-समय पर प्रभावित किया है। इन देशों में वियतनाम जनता के साथ लगातार संघर्ष भी होता रहा है। यही संघर्ष वियतनाम की जनता को अपनी ‘अलग पहचान‘ स्थापित करने के लिये लगातार प्रेरित करते रहे। वियतनामियों को अपनी भाषा-संस्कृति से जुडाव यकीनन इन्हीं संघर्षों का परिणाम है। 1985 तक यह देश अंतर्राष्टीय नवाचारों से बहत ज्यादा नहीं जुड पाया था, 1986 में आर्थिक सुधारों को अपनाने के बाद वियतनाम अंतर्राष्टीय अर्थव्यवस्था से जुडा है। यह सुधार वियतनाम में डोई-मोई (क्व्प्।डव्प्) के नाम से जाने जाते हैं। ये सुधार केन्द्रीकृत नियोजन से इस देश को खुले अंतर्राष्टीय बाजार से जोडते हैं।



फिलहाल इस बार अपनी बात यहीं समाप्त करता हूँ, अगली पोस्ट में वियतनाम के महान नेता 'हो-ची-मिन्ह‘, प्रशासनिक व्यवस्था, यहाँ के लोक-पक्ष‘ और ‘लोक-व्यवहार‘ के विषय में लिखने का प्रयास करूंगा।




***** एक बात और वियतनाम जाने से पूर्व इस देश के बारे में बड़े भाई और देश के नामचीन पत्रकार (संपादक-हिंदुस्तान) श्री शशि शेखर जी से भी विस्तृत वार्ता हुई थी.....वे इस देश के इतिहास- संस्कृति-सभ्यता और भाषा से बहुत प्रभावित थे। वियतनाम जाने से पूर्व उनसे हुई बात-चीत ने वियतनाम को और भी करीब से देखने-समझने की दृष्टि विकसित की. आभारी हूँ श्री शशि शेखर जी का जिन्होंने इस देश को देखने और समझने के लिए परिष्कृत दृष्टि को अंकुरित-पल्लवित होने का अवसर दिया.




क्रमश:

सितंबर 06, 2010

सिंगापुर से.......! (पार्ट -2)



सिंगापुर यूँ तो ऐसा देश है जिसमें इतने दर्शनीय स्थल हैं कि जिन्हें देखने के लिए काफी वक्त चाहिए.............. किन्तु हमारे पास वक्त की कमी थी, सो चाहकर भी कुछ ही दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कर पाए।


दरअसल दिन भर के क्लासरूम सेसन तथा विभिन्न संस्थाओं/ प्राधिकारियों से ‘इन्टरएक्शन’ के बाद सांय का वक्त ही हमें ऐसा मिलता था कि जब हम सिंगापुर के दर्शनीय स्थलों और यहां के खूबसूरत बाजारों का अवलोकन कर सकते थे। सिंगापुर में ऐसे कई दर्शनीय स्थल हैं, जो किसी भी पर्यटक को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं-जैसे, मेगाजिप एडवेंचर पार्क, सेन्टोसा पार्क, मिंट म्यूजियम ऑफ ट्वायज, चांगी बार म्यूजियम, एशियन सिविलाइजेशन म्यूजियम, पेरनकान म्यूजियम, सिंगापुर डिस्कवरी सेंण्टर, मेरीना बैराज, न्यूवाटर विजिटर सेण्टर, साइंस सेण्टर सिंगापुर, चेंग हो क्रूज, ज्वेल केबल कार ड्राइव, क्लार्क क्वे, रेड डॉट डिजाइन म्यूजियम, सिंगापुर फ्लायर, सिंगापुर रिवर क्रूज, सिगापुर टर्फ क्लब, बटरफ्लाई पार्क, नेशनल आर्चिड गार्डेन इत्यादि इत्यादि। भारतीय पर्यटकों के लिए यहां लिटिल इण्डिया, मुस्तफा कामर्शियल सेण्टर घूमना अपने देश में ही घूमने जैसा है।

बहरहाल समयाभाव के बावजूद हमने सिंगापुर को अधिकाधिक ‘एक्सप्लोर’ करने का प्रयास किया। सिंगापुर सिविल सर्विसेज कॉलेज से छूटते ही हम वापस अपने ‘फ्यूरामा रिवर फ्रंट’ होटल आते और इन स्थलों को देखने के लिए निकल पड़ते। कुछ स्थानीय भारतीय मित्रों ने कहा कि सिंगापुर दर्शन ‘सेण्टोसा बीच’ के भ्रमण के बिना अधूरा है सो हमने तय किया कि ‘सेण्टोसा बीच’ जरूर देख लिया जाए। सेण्टोसा पार्क में अण्डर वाटर सी व जलचरों का सजीव प्रदर्शन, स्काई ड्राइविंग तथा सिंगापुर म्यूजियम देखना शानदार अनुभव था। इस अनुभव में अपना रोमांच तब चरम पर पहुंचा जब हमनें ‘सांग ऑफ द सी’ पर जबरदस्त वाटर लेजर शो देखा। हजारों दर्शकों की भीड़ के बीच इस वाटर लेजर शो के प्रदर्शन ने हमारा मन मोह लिया। सेण्टोसा में इसके अलावा 4-D थिएटर, फोर्ट सिलिसों को घूमना भी अदभुत क्षण थे।

सेण्टोसा के अलावा मुझे सिंगापुर के ‘फ्लायर’ ने बहुत आकर्षित किया। 165 मीटर ऊंचाई वाले इस फ्लायर में ‘ट्रांसपेरेण्ट बॉक्स’ से सिंगापुर को देखना अत्यंत रोमाचंक अनुभव था। इस फ्लायर से यूथ ओलम्पिक की गतिविधियाँ देखना तो और भी रोमांचकारी था। सिंगापुर के बाजारों में देर रात तक रौनक रहती है। यहां जगह-जगह फूड कोर्टस देखे जा सकते है। इन फूड कोर्टस में दुनिया के अलग-अलग देशों के लजीज व्यंजन खाए जा सकते हैं। एम॰आर॰टी॰ (भारतीय मेट्रो ट्रेन की तरह) से चंद सिंगापुरी डालर्स में सिंगापुर को घूमना यादगार अनुभव रहा। विश्वास नहीं होता कि महज 700 वर्ग कि॰मी॰ में फैले किसी देश में इतने पर्यटक स्थल हो सकते हैं। इस देश की प्रगति में भारतीयों का भी बहुत बड़ा योगदान है।

जनसंख्या में लगभग दस फीसदी भागेदारी भारतीयों की है और कोई भी क्षेत्र हो, चाहे उद्योग या उत्पादन या फिर तकनीक....... सर्वत्र भारतीयों की भूमिका सहज स्वीकार्य है।

सिंगापुर में बिल्डिंग्स की बनावट तथा भू-खण्डों के प्रयोग को देखकर बार-बार इस देश के नीति निर्माताओं को धन्यवाद देने का मन करता रहा, जिन्होंने छोटे-से-छोटे भूखण्ड का ‘आप्टिमम यूज’ करते हुए उसे सुंदर से सुंदरतम बना दिया है। सड़क पर पैदल यात्रियों को सड़क पार करते हुए ट्रैफिक का रूक जाना......... रेड-ग्रीन लाइट सिग्नलस का शत-प्रतिशत अनुपालन करना ऐसे उदाहरण थे जो वास्तव में इस देश में ‘‘सिविक सेंस’’ होने का अहसास कराते थे। रेन वाटर हार्वेस्टिंग, रूफ टॉप ग्रीनरी इत्यादि को देखकर यहां की प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होता रहा।

एक सप्ताह की इस सिंगापुरी यात्रा से निश्चित रूप से प्रशासनिक समझ विकसित हुई। यहां की चुस्त-दुरूस्त कानून और व्यवस्था को देखकर मन बार-बार यही सोचता रहा कि योजनाबद्ध प्रतिबद्धता और योजनाओं के क्रियान्वयन में ईमानदारी ने इस देश को विगत 45 साल में कहां से कहां पहुंचा दिया है। 1965 में आजाद हुये इस देश ने आशा से कहीं ज्यादा तेजी से विकास किया है और दुनिया में अपने अस्तित्व का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत किया है।

सिंगापुर से लौटने के बाद भी कुछ स्थानीय भारतीय मित्रों की याद आती रही। इस यात्रा के दौरान श्रद्धा जैन जी, प्रशांत जी, अरूण दीक्षित दम्पत्ति, विक्रम-अम्बिका द्वारा दिए दिए गए स्नेह-सम्मान के प्रति मन अब तक आभारी है। सिंगापुर के बाद हमारा अगला पड़ाव वियतनाम था, जिसके बारे में तफसील से अगली प्रस्तुति में लिखने का प्रयास करूंगा।

क्रमशः

सितंबर 01, 2010

सिंगापुर से (पार्ट-1) !











13 अगस्त की सुबह 7.30 बजे सिंगापुर के चाँगी एअरपोर्ट पर उतरने के बाद यह महसूस होने लगा था कि हम अब दुनिया के उस देश की सरजमीं पर कदम रख चुकें हैं जिसे दुनिया के सबसे विकसित और प्रगतिशील देश के रूप में जाना जाता है। सिंगापुर के अगले पाँच दिन नये - नये अनुभवों से परिपूर्ण रहे, वो चाहे सिविल सर्विसेज कॉलेज में सिंगापुर के प्रशासन के बारे में जानकारी लेना रहा हो अथवा भारतीय उच्चायुक्त कार्यालय में स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने का गौरवशाली क्षण रहा हो।
सिंगापुर के पब्लिक डिलीवरी सिस्टम को देखना समझना अपने - आप में नया अनुभव था। इस सिस्टम में सिंगापुर के लोकल ट्रेन (एम0आर0टी0) का सफर, लोकल बस सर्विस में यात्रा करना, पानी की कमीं से झूझते हुए देश में स्वच्छ पानी की आपूर्ति देखना, कन्क्रीट और सीमेण्ट की बहुमंजिली इमारतों के बीच जगह-जगह हरियाली व पार्कों का होना इस देश की बेहतरीन प्रशासनिक व्यवस्था और सुलझे हुए सिविक-सेन्स की अद्भुत दास्तान जैसा था। अपने सीमित संसाधनों के माध्यम से कोई देश कैसे आर्थिक प्रगति और खुशहाली का सफर तय करता है यह सिंगापुर से बेहतर दुनिया में शायद ही कहीं पर देखने को मिले। सिविल सर्विसेज कॉलेज सिंगापुर में बहुत रोचक क्लास रूम माहौल में वहां के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सिंगापुर के प्रशासन के बारे में जानना-समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा। योजनाओं का निर्माण और उनका सफलता पूर्वक क्रियान्वयन सिंगापुर की पहचान है। हैरानी की बात यह थी कि सिंगापुर में नीति निर्माण को लेकर उच्च प्रशासकीय स्तर पर जब़रदस्त प्रतिबद्धता देखने को मिली। अर्बन रि-डेवलपमेण्ट अथॉरिटी तथा पब्लिक यूटीलिटी बोर्ड के अधिकारियों से मिलने के बाद यह धारणा और भी पुख्ता हुई कि किसी भी योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए दूरदर्शिता, संसाधनों के अधिकाधिक उपयोग तथा प्रशासकीय प्रतिबद्धता अत्यन्त आवश्यक है।
पचास लाख जनसँख्या वाले सिंगापुर की एक पहचान यह भी है कि इस सिटी - स्टेट में सब-कुछ व्यवस्थित सा दिखता है। बड़ी-बड़ी इमारतों के ऊपर हरियाली बनाए रखने का जज्ब़ा इस देश को इको-फ्रेण्डली बनाए हुए है। मरीना बीच पर फ्लायर पर पूरे शहर को देखना अद्भुत था। सत्तावन मंजिली इमारत की छत पर बाग होना एक आश्चर्य से कम नहीं था।यह सौभाग्य था कि जब हम सिंगापुर पहुँचे तो दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम हमारे सामने हुए। सिंगापुर मे स्वतंत्रता दिवस 09 अगस्त को मनाया जाता है। 13 अगस्त को जब हम सिंगापुर पहुँचे तो यह देश स्वतंत्रता दिवस के जोश मंे पूरी तरह डूबा हुआ था। जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज फहरे हुए थे। दूसरी महत्वपूर्ण घटना यह थी कि 13 अगस्त को ही सिंगापुर में यूथ-ओलम्पिक गेम्स का शुभारम्भ हुआ था, जिस कारण पूरा शहर/राष्ट्र जोश मंे डूबा हुआ था।
सिंगापूर में कुछ भारतीय मित्रों से मिलना सुखद अहसास रहा। अरुण दीक्षित जी से यहाँ पहली बार मुलाकात हुई। वे एसेन्चर कन्सल्टेण्ट कम्पनी में कार्यरत हैं। उनके कुछ रिश्तेदारों से मेरी मित्रता भारत मे थी, उन्हीं के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि सिंगापुर में श्री अरुण दीक्षित कार्यरत हैं। सिंगापुर जाने के बाद स्वयं अरुण दीक्षित द्वारा मुझसे सम्पर्क करना उल्लेखनीय बात थी। श्री दीक्षित द्वारा अपने स्थानीय भारतीय मित्रों से मिलवाना भी इसी मुलाकात को महत्वपूर्ण अंग रहा। यहाँ आने के बाद लखनऊ से सर्वत एम0 द्वारा फोन पर बताया गया कि ब्लागर श्रद्धा जैन भी सिंगापुर में ही है। श्रद्धा जी को मैं विगत लम्बे अर्से से पढ़ता चला आ रहा था। गज़ले लिखने में श्रद्धा जी ने ब्लॉग समुदाय में अपनी अच्छी पहचान बनाई है। सर्वत एम साहब ने मुझे और श्रद्धा जी को मिलवाने में महत्वपूर्ण मध्यस्थ की अदा की। श्रद्धा जी के घर जाकर उनको सुनना और लज़ीज डिनर लेना इस यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। श्रद्धा जी के साथ उनके पति प्रशान्त जैन से मिलना अतिरिक्त उपलब्धि रही प्रशान्तजी भी कम्प्यूटर एनालिस्ट हैं जो किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्यरत हैं। प्रशान्तजी का सेन्स ऑफ ह्यूमर इतना लाजबाब था कि हम तीन-चार घंटे लगातार हंस-हंस कर लोट-पोट होते रहे। हर एक बात पर उनके ‘‘वन लाइनर कमेण्ट’’ हंसी-ठहाके का वातावरण तैयार कर देते थे। इसके अलावा मैनपुरी के ही एक अन्य कम्प्यूटर एनालिस्ट श्री विक्रम और उनकी पत्नी अम्बिका से मिलना और उनके साथ लिटिल इण्डिया, फेयरर पार्क घूमना अविस्मरणीय रहा।
क्रमश:

जुलाई 31, 2010

यार जुलाहे...... गुलज़ार !

लाइब्रेरी के रैक में रखी किताबों को उलटते पलते अचानक यार जुलाहे...... गुलज़ार हाथ में आ गयी. यह स्थिति मेरे लिए समंदर में सीपी-मोती मिल जाने वाली थी....याद आया कि यह किताब मैंने लखनऊ के पुस्तक मेले में देखी थी, बस किसी वज़ह से खरीद नहीं पाया था. बहरहाल किताब तुरंत इश्यू कराई और पढने बैठ गया.
यह किताब दरअसल यतीन्द्र मिश्र के संपादन में वाणी प्रकाशन ने निकाली है..... इस किताब में गीतकार-शायर-फिल्मकार गुलज़ार साहब के बारे में संपादक का 25-26 पन्नों का बेहतरीन भूमिका/ परिचय " कितना अरसा हुआ कोई उम्मीद जलाये" है. संपादक यतीन्द्र मिश्र ने इस भूमिका को लिखने में अपनी काबिलियत का परिचय दिया है उन्होंने गुलज़ार साहब के फ़िल्मी व्यक्तित्व और उनके साहित्यिक पक्ष का बेबाक विश्लेषण करते हुए लिखा है... “हमें उनकी उस पृष्ठभूमि की ओर भी जाना चाहिए, जो मुम्बई से सम्बन्धित नहीं है, इसीलिए गुलज़ार की नज़्मों की पूरी पड़ताल, उन्हें हम उनके सिनेमा वाले व्यक्तित्व से निरपेक्ष न रखते हुए, उसका सहयात्री या पूरक मान कर कर रहे हैं."
यूँ तो गुलज़ार साहब पर इतना ज्यादा लिखा गया है की जब भी कुछ लिखा जाता है वो नया कम दोहराव ज्यादा लगता है....फिर भी यतीन्द्र मिश्र की रचनात्मक साहस की प्रशंसा करनी होगी कि इसके बाद भी उन्होंने अज़ीम शायर गुलज़ार पर लिखने की कोशिश की...और कामयाब कोशिश की है. मिश्र जी इस किताब के वाबत और शायर गुलज़ार साहब के बारे में अपनी बात की शुरुआत कुछ यूँ करते हैं "उर्दू और हिन्दी की दहलीज़ पर खड़े हुए शायर और गीतकार गुलज़ार की कविता, जो हिन्दी की ज़मीन से निकल कर दूर आसमान तक उर्दू की पतंग बन कर उड़ती है, उसका एक चुनिन्दा पाठ तैयार करना अपने आप से बेहद दिलचस्प और प्रासंगिक है. इस चयन की उपयोगिता तब और बढ़ जाती है, जब हम इस बात से रू-ब-रु होते हैं कि पिछले लगभग पचास बरसों में फैली हुई इस शायर की रचनात्मकता में दुनिया भर के रंग, तमाशे, जब्बात और अफ़साने मिले हुए हैं. गुलज़ार की शायरी की यही पुख़्ता ज़मीन है, जिसका खाका कुछ पेंटिंग्ज, कुछ पोर्टेट, कुछ लैंडस्केप्स और कुछ स्केचेज़ से अपना चेहरा गढ़ता है. अनगिनत नज़्मों, कविताओं और ग़ज़लों की समृद्ध दुनिया है गुलज़ार की, जो अपना सूफियाना रंग लिये हुए शायर का जीवन-दर्शन व्यक्त करती हैं. इस अभिव्यक्ति में हमें कवि की निर्गुण कवियों की बोली-बानी के करीब पहुँचने वाली उनकी आवाज़ या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव हमें एकबारगी उदासी में तब्दील होता हुआ नज़र आता है। इस अर्थ में गुलज़ार की कविता प्रेम में विरह, जीवन में विराग, रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी और हमारे समय में अधिकांश चीजों के सम्वेदनहीन होते जाने की पड़ताल की कविता है. ‘यार जुलाहे........,’ इस अर्थ में उनकी पिछले पाँच दशकों में फैली हुई कविता की स्याही से निकला हुआ ऐसा आत्मीय पाठ है, जिसे मैंने उनके ढेरों प्रकाशित संग्रहों में से अपनी पसन्द की कुछ कविताओं, शेरों, गीतों और ग़ज़लों की शक्ल में चुना है. इस संग्रह को तैयार करने में मेरी पसन्द और मर्ज़ी का जितना हिस्सा शामिल है, उतने ही अनुपात में, इसमें गुलज़ार के शायर किरदार की कैफ़ियत, उनके जज़्बात और निजी लम्हों की रूहें क़ैद हैं. हिन्दुस्तानी जुबान में कुल एक सौ दस नज़्मों का यह दीवान है, तब उसको बनाने, उसको सँजोने की प्रक्रिया तथा गुलज़ार के कवि-व्यक्तित्व और उन दबावों-ऊहापोहों को तफ़सील से बयाँ करना भी यहाँ बेहद ज़रूरी है, जो ऐसे अप्रतिम शायर की खानकाह से निकल कर हमें हासिल हुआ है."
यह कहना कहीं से गलत न होगा की गुलज़ार साहब उब परम्परा के चमकते हुए नगीने है जिसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास, राजेन्द्र सिंह बेदी, सआदत हसन मंटो, कृष्ण चन्दर, शैलेन्द्र, बलराज साहनी, शुम्भु मित्र, गिरीश कर्नाड, विजय तेण्डुलकर, डॉ. राही मासूम रजा, ज़ाँनिसार अख़्तर और पं. सत्यदेव दुबे जैसे नाम शामिल हैं , जिन्होंने सिनेमा माध्यम को गहराई से समझ कर न सिर्फ़ उसे अभिनवता प्रदान की, बल्कि स्वयं की लेखकीय रचनात्मकता को भी अपने-अपने ढंग से समृद्ध किया. गुलज़ार जैसे शायर और फ़िल्मकार का जब कभी भी आकलन हो, तब इसी तरह होना चाहिए कि उनके सिनेमाई क़द को जाँचते समय हम उनके शायर से मुखातिब न हों और जब उनकी रचनाओं पर बात करें, तो थोड़ी देर के लिए इस बात को भूल जायें कि जिस लेखक की चर्चा हो रही है, उसका अधिकांश जीवन सिनेमा के समाज में बीता है.
इस संकलन के विषय में यह तो कहना ही पड़ेगा कि गुलज़ार साहब की झोली में इतने गौहर-मोती हैं कि उनमे से बेस्ट का चुनाव मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल है मगर मिश्र जी ने यह कारनामा बहुत संजीदगी और सफाई से कर दिखाया है..... गुलज़ार साहब की चुनी हुयी नज्में, त्रिवेनियाँ और फिर ग़ज़लें पेश की हैं। यह संकलन अपने बेहतरीन प्रिंटिंग के लिए तो संग्रहणीय है ही....चित्रकार गोपी गजनवी के रेखांकन कृति को सूफियाना रंग देने में और भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.....गुलज़ार साहब के प्रशंसकों के लिए यतीन्द्र मिश्र का यह ऐसा तोहफा है जो दिल से लगाये रखने के काबिल है. यतीन्द्र मिश्र को उनके शानदार प्रयास के लिए कोटिश: बधाई.
गुलज़ार साहब इतने मकबूल शायर-गीतकार- आर्टिस्ट हैं कि उनकी हरेक रचना इतनी ज्यादा लिखी -पढ़ी जा चुकी है कि कुछ भी अनसुना नहीं लगता। सो पेश हैं, इस संकलन से ली गयी वे नज्में -ग़ज़लें जो अपेक्षाकृत कम सुनी पढ़ी गयी हैं...ताकि इस किताब की ताजगी का भी एहसास बना रहे.


गुलों को सुनना ज़रा तुम, सदायें भेजी हैं
गुलों के हाथ बहुत सी, दुआएं भेजी हैं
जो अफताब कभी भी गुरूब नहीं होता
हमारा दिल है, इसी कि शुआयें भेजी हैं.
तुम्हारी खुश्क-सी आँखे भली नहीं लगती
वो सारी चीजें जो तुमको रुलाएं भेजी हैं
सियाह रंग, चमकती हुई किनारी है
पहन लो अच्छी लगेंगी, घटायें भेजी हैं
तुम्हारे ख्वाब से हर शब लिपट कर सोते हैं
सज़ाएँ भेज दो, हमने खताएं भेजी हैं
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तिनका तिनका कांटे तोड़े ,सारी रात कटाई की
क्यों इतनी लम्बी होती है चांदनी रात जुदाई की
आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं
क्या तुमने उड़ती देखी है, रेत कभी तन्हाई की
तारों की रोशन फसलें और चाँद की एक दराँती थी
साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की
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तेरे शहर तक पहुँच तो जाता
रस्ते में दरिया पड़ते हैं--

पुल सब तूने जला दिए थे.
**********

मैं कायनात में,
सय्यारों कि तरह भटकता था
धुएं में धुल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस ज़मीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त से कटकर जो लम्हा उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा

गली में घर का निशाँ तलाश करता रहा बरसों

तुम्हारी रूह में अब ,जिस्म में भटकता हूँ


लबों से चूम लो आंखो से थाम लो मुझको

तुम्हारी कोख से जनमू तो फ़िर पनाह मिले ॥

जुलाई 23, 2010

समंदर सामने और तिश्नगी है.......!


मित्रों अपने ब्लॉग पर एक नयी- ताज़ा ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ....! पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत ज़रूर कराईयेगा ....!

समंदर सामने और तिश्नगी है !
अज़ब मुश्किल में मेरी ज़िन्दगी है !!

तेरी आमद की ख़बरों का असर है,
फ़िज़ा में खुशबूएं हैं,ताज़गी है !!

दरो-दीवार से भी हैं मरासिम,
मगर बुनियाद से बावस्तगी है !!

वो आते ही नहीं हैं कर के वादा,
हमारी मौत उनकी दिल्लगी है !!


तेरी आँखों से रोशन है नज़ारे,
तेरी ज़ुल्फों से कोई शब जगी है !!

सुनाये थे जो नग्में कुर्बतों में,
ख्यालों में उन्हीं से नग्मगी है !!


लुटाता रोशनी है बेसबब जो,
उसी के हक में देखो तीरगी है !!

ख़फ़ा मुझसे हो तो मुझको सज़ा दो,
ज़माने भर से क्या नाराज़गी है !!


तुम्हें हर सिम्त हो मंज़िल मुबारक,
हमारे हक में बस आवारगी है !!

जुलाई 14, 2010

"जार्ज एवरेस्ट" पर ब्रेकफास्ट.....!

गत शुक्रवार को अकादमी में आदेश जारी हुआ कि शनिवार कि सुबह सभी लोग "जार्ज एवरेस्ट" प्वाईंट ट्रेकिंग करते हुए चलेंगे.....शनिवार का ब्रेकफास्ट वहीँ लेकर लंच वापस अकेडमी में करेंगे....! जार्ज एवरेस्ट प्वाइंट मसूरी से लगभग 6 किमी दूरी पर है.......पैदल ट्रेकिंग करते हुए अपने 100 साथियों के साथ इस प्वाईंट तक पहुँचना बहुत ही मजेदार अनुभव था......100 अफसरों का यह दल हंसी-ठहाके करते हुए चल पड़ा.....लगभग एक-डेढ़ घंटे के पैदल सफ़र के बाद जब जार्ज एवरेस्ट पहुंचे तो लगा कि क्या ही खूबसूरत जगह पर हम पहुँच गए है....चोटी पर आकर अचानक फैले हुए घास के मैदान जैसा था यह गंतव्य और इस मैदान के बीचों-बीच एक बड़ा सा बंगला भी था, जिसे 'जार्ज एवरेस्ट का बंगला' कहा जाता है ........! यहाँ पहुँच कर हमारे साथियों ने पहले तो नाश्ता लिया....फोटोग्राफी की गयी....देर तक हम सब इस चोटी से पहाड़ों की खूबसूरती को निहारते रहे......! ब्रेकफास्ट लेकर दोस्तों ने इसी पहाड़ी पर अन्त्याक्षरी का दौर शुरू कर दिया जो अगले दो-ढाई घंटे तक चला.
इसी बीच एक जिज्ञासा यह भी जगी कि जार्ज एवरेस्ट के बंगले का जायजा भी ले लिया जाए....यह विशालकाय बंगला जार्ज एवरेस्ट द्वारा 1832 में बनवाया गया था.....! हम देर तक यही सोचते रहे कि आज जबकि दुनिया बहुत आगे पहुँच गयी तब यहाँ छोटा सा घर बनाया जाना मुश्किल काम है.....1832 में यह काम कितना कठिन रहा होगा.....इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है. जार्ज एवरेस्ट (1790-1866) वेल्श के सर्वेक्षणकर्ता थे जो भारत में 1830-43 की अवधि में सर्वेयर जनरल ऑफ़ इंडिया रहे. उन्हें भारत के दक्षिण भारत से लेकर नेपाल तक तकरीबन 2400 किमी तक के भूभाग का ट्रिगोनोमेत्रिक सर्वे करने के लिए जाना जाता है. यह भी जानकर आपको आश्चर्य हो सकता है कि माउन्ट एवरेस्ट का नाम इसी महान सर्वेयर के नाम पर रखा गया है. मसूरी में के जार्ज एवरेस्ट के बंगले तक जाना एक नया अनुभव था......उन्होंने यह घर 1832 में बनवाया था. वे यह भी चाहते थे कि सर्वे ऑफ़ इंडिया का हेड ऑफिस मसूरी में ही बने....हालाँकि उनकी यह इच्छा अधूरी ही रही...यह ऑफिस बाद में देहरादून में बनाया गया. इस प्वाईंट से हिमालय पर्वत श्रृंखला का दृश्य बहुत ही मनोरम था.
बहरहाल एक मनोरंजक- खुशनुमा दिन का प्रथमार्ध जार्ज एवरेस्ट पर बिताने के लिए लम्बे समय तक याद रहेगा....!