सितंबर 16, 2009

साँसों में लोबान जलाना........

काफी दिनों बाद इधर ब्लॉग पर लिखने की भूख बढ़ गयी . दिल नहीं माना और फिर से लिखना शुरू किया....... व्यस्तता के बाद ब्लॉग पर लिखने का क्रम जोड़ना वाकई सुखद रहा. इधर कल बारिश हो रही थी....ऐसे शानदार मौसम में मैंने एक ग़ज़ल लिखी...... या यूँ कहिये बस लिख गयी. अपने दोस्त शायर अकील नोमानी से कुछ ज़ुरूरी इस्लाह कराने के बाद ग़ज़ल आप की नज़र कर रहा हूँ ……….गौर फरमाएं..............!

साँसों में लोबान जलाना आखिर क्यों !
पल पल तेरी याद का आना आखिर क्यों !!

जिसको देखो वो मशरूफ है अपने में,
रिश्तों का फिर ताना बाना आखिर क्यों !!

एक से खांचे सांचे में सब ढलते है,
फिर ये मज़हब-जाति-घराना आखिर क्यों !!

एक खता, यानी चाहत थी जीने की
पूरी उम्र का ये जुर्माना आखिर क्यों !!

मसअले उसके शम्सो -कमर के होते हैं,
मेरी मशक्कत आबो दाना आखिर क्यों !!

7 टिप्‍पणियां:

psingh ने कहा…

this ghazal is very nice


i impresd you


Pushpendra Singh

भंगार ने कहा…

bahut achhi gzal likhi aapne ,likha kijiye

ओम आर्य ने कहा…

साँसों में लोबान जलाना आखिर क्यों !
पल पल तेरी याद का आना आखिर क्यों !!
कितना पाक होता है इश्क़ का एहसास ......ये आपके शेर बखुबी बयान कर रहे है .......हृदयस्पर्शी रचना......आभार

रंजना ने कहा…

एक से खांचे सांचे में सब ढलते है,
फिर ये मज़हब-जाति-घराना आखिर क्यों !!

एक खता, यानी चाहत थी जीने की
पूरी उम्र का ये जुर्माना आखिर क्यों !!


लाजवाब ग़ज़ल.....मंत्रमुग्ध कर गयी.......बहुत ही सुन्दर...आभार.

XX ने कहा…

Really great. Infect in my understanding the feeling of your heart is coming out as words and in presentable format in terms of Shayari. Which describe ur heart.....

I can say only.....thsi article is force me to go with other article also.

Nice.....

Vijay Dubey/NTPC

raj ने कहा…

एक खता, यानी चाहत थी जीने की
पूरी उम्र का ये जुर्माना आखिर क्यों !!..pahli baar apka blog padha...its really very nice...kitni gahri baat hai..pal pal yado ka aanaaa akhir hai kya??azeeb swaal jiska koee jwaab nahi...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जिसको देखो वो मशरूफ है अपने में,
रिश्तों का फिर ताना बाना आखिर क्यों !!

वाह...वाह...वाह...इस एक शेर पर खड़े हो कर तालियाँ बजा रहा हूँ...सच कमाल लिखते हैं आप...वाह....बेहतरीन ग़ज़ल
नीरज