जनवरी 23, 2010

सुब्ह की उम्मीद .........विप्लवी साहब !

मैंने अपनी पिछली पोस्ट जो नवाज़ देबवंदी साहब पर लिखी थी......उसे आप लोगों का प्यार मिला......शुक्रिया ! उस पोस्ट में मैंने यह ज़िक्र किया था कि जब नवाज़ साहब अपने शेरों का खजाना हम पर लुटा रहे थे तो उसे हम तीन लोग ही लूटने पर आमादा थे...एक मैं ,एक मेरी पत्नी और तीसरे शख्स थे बी. आर. ‘विप्लवी’ साहब जो रेलवे में अफसर हैं मगर संजीदा शायर भी.......! पोस्ट पढने के बाद कई कमेन्ट आये मगर अपने मेजर साब गौतम राजरिशी भी गज़ब के शिकारी हैं......मजाल है कि कोई बात उनसे कही जाई और वो नज़रअंदाज कर दें..........दबोच लिया मुझे ……. कह डाला कि नवाज़ साहब पर लिखा वो तो ठीक है मगर बी. आर. विप्लवी साहब पर भी लिखिए......! मेजर साहब की बात सर आँखों पर.......!
...........जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ कि बी. आर. विप्लवी साहब जो रेलवे में अफसर हैं मगर संजीदा शायर होना भी उनकी एक अलहदा पहचान है...........! . मेरी उनसे मुलाकात बरेली में हुई थी किसी पुस्तक मेले में. उनका तार्रुफ़ कराया था कमलेश भट्ट कमल साहब ने. सिलसिला बढ़ा ....हम लोगों की मुलाकातें होती रही………..कभी किसी मुशायरे में, कभी किसी साहित्यिक आयोजन में .............कभी वसीम बरेलवी साहब के यहाँ...........! एक बार आकाशवाणी पर भी साथ साथ पढने का मौका मिला.....! उनकी किताब "सुब्ह की धूप" के विमोचन के अवसर पर भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में बोलने का मिला...........ऐसे ही वक्त चलता रहा....मैं भी बरेली से चला गया....... विप्लवी साहब भी कोलकाता चले गए.......! मगर दुनिया गोल है ……....गोरखपुर में आने के बाद अचानक पता चला कि वे यहीं पोस्टेड हैं..........पता लगाया तो बात सही निकली.....! अब फिर मुलाकातों का सिलसिला जारी है...........! बी. आर. विप्लवी जितने अच्छे आदमी हैं उतनी ही अच्छी उनकी शायरी भी ..........जीवन के जो अनेकानेक रंग हैं वे उनकी शायरी में इतने रचे बसे हैं कि क्या कहने……....गंगा जमुनी संस्कृति की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं वो….......उम्र का एक फासला होने के बावजूद बिलकुल छोटे भाई की तरह स्नेह मिला है मुझे उनका……..!
गाजीपुर के सामान्य परिवार में जन्मे विप्लवी जी के सर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया..........मेधावी होने के बावजूद सामाजिक परिस्थितियों से उनकी जंग- जद्दोजहद चलती रही जो कमोबेश आज तक जारी है ................कम उम्र में ही जिंदगी के थपेड़ों ने उन्हें मजबूत कर दिया.........इंजीनीयरिंग करने के बाद रेलवे में आ गए.........अफसर बन गए मगर सामाजिक विरोधाभाषों से लड़ते हुए उनके कदम आगे बढ़ते रहे...........उनकी यही कशमकश उनकी शायरी में उभरी...........संजीदगी से शायरी के गणित में अपनी भावनाओं को पिरोते हुए अपनी बात आम आदमी तक पहुँचाने की ललक उनकी हिम्मत है ..........और शायद उपलब्धि भी !
उस्ताद शायर वसीम बरेलवी साहब अगर यह कहते हैं की " विप्लवी की आवाज़ हवा का आवारा झोंका नहीं- नसीमे सुबह का वह नगमा है जिसका आज भी और कल भी। अपने माहौल की बेदर्द सच्चाइयों, अपनी जात की तह-दर-तह गहराइयों और अपने तजरबों की रौशन इकाइयों को शेरी-पैकर देना और ज़मीनी एहसास से जुड़े रहना उनकी काव्य यात्रा का वो असासा है जो नए आयाम देने में पूरी तरह सक्षम है............." तो सही ही कहते हैं।
फ़िलहाल तो ऐसे माहौल में विप्लवी साहब की चंद ग़ज़लें ,कुछ शेर पेश कर रहा हूँ..........!
उम्र की दास्तान लम्बी है !
चैन कम है थकान लम्बी है !!
हौसले देखिए परिंदों के,
पर कटे हैं उड़ान लम्बी है !!
पैर फिसले ख़ताएँ याद आईं ,
कैसे ठहरें ढलान लम्बी है !!
************************
आँख का फ़ैसला दिल की तज्वीज़ है !
इश्क़ गफ़लत भरी एक हसीं चीज़ है !!
आँख खुलते ही हाथों से जाती रही ,
ख़्वाब में खो गई कौन सी चीज़ है !!
मैं कहाँ आसमाँ की तरफ देखता ,
मेरे सजदों को जब तेरी दहलीज़ है!!
*************************
ये कौन हवाओं में ज़हर घोल रहा है !
सब जानते हैं कोई नहीं बोल रहा है !!
बाज़ार कि शर्तों पे ही ले जाएगा शायद,
वो आँखों ही आँखों में मुझे तोल रहा है !!
मर्दों की नज़र में तो वो कलयुग हो कि सतयुग,
औरत के हसीं जिस्म का भूगोल रहा है !!
***********************
ज़रूरत के मुताबिक़ चेहरे लेकर साथ चलता है !
मिरा दमसाज़ ये देखें मुझे कैसे बदलता है !!

दो नयी ग़ज़लें भी पेश कर रहा हूँ ये ग़ज़लें अभी कहीं प्रकाशित भी नहीं हैं.......मुझे बेहद पसंद भी हैं.....पेशे-ख़िदमत है....,

ज़मीं के लोग हों जब बेज़ुबां से,
शिकायत क्या करेंगे आसमाँ से !
नदी से नाव की रस्साकसी है,
हवा उलझी हुयी है बादवां से !
हमें भी मस्जिदों की है ज़रुरत,
हमारी नींद खुलती है अजाँ से !
*****************

जब से हूँ ईमान के पीछे,
जिस्म पड़ा है जान के पीछे !
खुद को मत पत्थर कर डालो,
पत्थर के भगवान के पीछे !
इक दिन रेत बना डालेंगी,
नदियाँ हैं चट्टान के पीछे !

फिलहाल वे दिखावे से दूर रहते हुए अपने कृतित्व में लगे हुए हैं.......कोई अचरज नहीं होना चाहिए की अगले एक दो सालों में उनकी फिर कोई किताब पढने को मिले......"सुब्ह की उम्मीद " की तरह ...........इसी उम्मीद में.....!

24 टिप्‍पणियां:

गिरिजेश राव ने कहा…

'उड़ान लम्बे हैं ' को 'उड़ान लम्बी हैं' कीजिए।

@
मैं कहाँ आसमाँ की तरफ देखता,
मेरे सजदों को जब तेरी दहलीज़ है!!

क्या बात है !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत बढ़िया, शुक्रिया!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

किसको उठा कर कोट करूँ ! सब की सब एक से बढ़कर एक हैं !
विप्लवी जी इतना सहज- विप्लव करते हैं ! मैं तो प्रवाह ही देख रहा हूँ !
साहब तो शायरी की दुनिया के रंगीले रतन हैं .. और इस दृष्टि से आप
रत्नगर्भा हैं .. (तुलना के क्रम में लिंग बदला हूँ , माफ़ कीजियेगा ! ) ..
.
प्रेरणा यहाँ से लिया है ..
'' पैर फिसले ख़ताएँ याद आईं ,
कैसे ठहरें ढलान लम्बी है !! ''

अपूर्व ने कहा…

पैर फिसले ख़ताएँ याद आईं ,
कैसे ठहरें ढलान लम्बी है !!

क्या बात है..एक शेर मे इतना कुछ!! एकदम सही कहा है उनके बारे मे वसीम साहब ने..इतनी गहरी बात इतनी सिम्प्लिसिटी के साथ यूँ ही नही आती है...
..और फिर यह

इक दिन रेत बना डालेंगी,
नदियाँ हैं चट्टान के पीछे !

किसी सभ्यता के विकास की कहानी सी लगती है..
शायरी लिखना जितना अहम्‌ है उतना ही खास है शायरों पर लिखना..जिसके लिये आपका आभार!

psingh ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना
हर एक फारमेट में लिखना यही
एक अच्छे लेखक की पहचान है |
और यह रचना आपको महान लेखकों की कतार में
खड़ा करने के लिए मील का पत्थर साबित होगी|
बल्कि मै तो इस रचना से आप में गुलज़ार
साहब का अक्स देख रहा हूँ |
किन्ही पंक्तियों लो जायदा अच्छा कह के में
बाक़ी के साथ नाइंसाफ़ी नहीं कर सकता
क्यों की सारी रचनाएँ उम्दा है |
गुरदेव आपके चरणों में सत सत नमन|
पी.सिंह .

सर्वत एम० ने कहा…

विप्लवी साहब, वाह-वाह. और सिंह साहब जिंदाबाद.
एक बहुत ही शानदार शायर से परिचित कराया, शुक्रिया. इया शुक्रिये का ३/४ मेजर गौतम राजरिशी की भेंट कीजिएगा.
मैं पहली बार आपके ब्लाग तक पहुँचने में कामयाब हो सका हूँ. इससे पहले जाने क्यों जब आना चाहा, कोई न कोई बाधा सामने खड़ी हो गयी. अफ़सोस कि देर से आया.
मैं गोरखपुर से हूँ और लखनऊ में हूँ . आप कहाँ हैं, गोरखपुर या लखनऊ?
मेरा सेल नम्बर है ९६९६३१८२२९. मुझे आपसे बात करके खुशी होगी, आप को हो न हो.

महफूज़ अली ने कहा…

आदरणीय विप्लवी जी का नाम मैंने भी बहुत सुना है.... आपने जो उनका तआर्रुफ़ कराया उसका मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ. इतने गिरां-ऐ-लाज़िम शख्सियत से हज्ज़-ऐ-वस्ल-ऐ-ख़ुत्बा का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. खूबसूरत ग़ज़लों से मुलाक़ात का यह सिलसिला आगे भी आप कराते रहेंगे... इसी उम्मीद में आपका....

महफूज़...

श्रद्धा जैन ने कहा…

maine vipalvi ji kitaab padhi hai
waqayi bahut sanzeeda shayar hai
har gazal khoosburat

aapke lekh mein unke vayaktitv ke bare mein padhkar bahut achcha laga
unke bare mein kuch aur bhi bataye

अभिषेक ओझा ने कहा…

आपके साथ मेजर साब का भी शुक्रिया... इस परिचय को हम तक पहुचाने के लिए.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

गजब का परिचय कराया आपने ! एक कशिश पैदा करती शायरी की प्रस्तुति भा गयी मन को !
जो ऐसा रचेंगे, उन्हें कुछ दिखाने की क्या जरूरत !

हर एक पंक्ति खूबसूरत है, पर हम ठहरे यहीं -
"उम्र की दास्तान लम्बी है !
चैन कम है थकान लम्बी है !!
हौसले देखिए परिंदों के,
पर कटे हैं उड़ान लम्बी है !!
पैर फिसले ख़ताएँ याद आईं ,
कैसे ठहरें ढलान लम्बी है !!"

यहाँ ’हंसी’ को ’हसीं’(हसीन)होना चाहिये क्या -
"आँख का फ़ैसला दिल की तज्वीज़ है !
इश्क़ गफ़लत भरी एक हंसी चीज़ है!!"

योगेश स्वप्न ने कहा…

singh sahab , aap mere blog par aaye aapka swagat, rachna padhna aur comments ke liye dhanyawaad, punah padharen, aur sneh banaye rakhen.


जब से हूँ ईमान के पीछे,
जिस्म पड़ा है जान के पीछे !
खुद को मत पत्थर कर डालो,
पत्थर के भगवान के पीछे !
इक दिन रेत बना डालेंगी,
नदियाँ हैं चट्टान के पीछे !

aapki rachnayen dil ko chhoo gain , behatareen aur lajawaab, badhaai sweekaren.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विप्लव जी ने तो अपनी ग़ज़लों के माध्यम सेचूपचाप ही विप्लव ही मचा दिया ....... बहुत हक़ीकत से जुड़ी ग़ज़लें हैं ..... कमाल के शेर हैं ..... आपने परिचय करवाया .. बहुत बहुत शुक्रिया ..........

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

'सिंह साहब आदाब
आपका तहे-दिल से शुक्रिया
बी. आर. ‘विप्लवी’ साहब
और उनके कलाम से मिलवाने के लिये
ये शायरी की ज़बान में कितना बड़ा पैग़ाम दे गये ‘विप्लवी’ साहब-
खुद को मत पत्थर कर डालो,
पत्थर के भगवान के पीछे !

हमें भी मस्जिदों की है ज़रुरत,
हमारी नींद खुलती है अजाँ से

काश हर मज़हब का अहतराम करने के लिये हम सभी ऐसा ही सोचें..!!
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

गौतम राजरिशी ने कहा…

शुक्रिया सर जी, मेरी फरमाइश को कबूल करने का।
विप्लवी साब का ये शेर "मैं कहाँ आसमाँ की तरफ देखता ,मेरे सजदों को जब तेरी दहलीज़ है" जाने कब से मेरे लिये किसी एंथेम से कम नहीं। बता दीजियेगा जनाब को अगर जिक्र छिड़े तो...

दो ताजी ग़ज़लों के लिये टोकरी भर-भर शुक्रिया। अभी कई बार आना पड़ेगा इस पोस्ट पर।

संजीव गौतम ने कहा…

apki tippni ke bahaane aapke rachna sansar ko dekhane aur padhane ka saubhagya milaa.
बेहतर कल की आस में जीने की ख़ातिर,
अच्छे-खासे आज को खोना ठीक नहीं !!
bahut achchhaa likhate hain aap.
dada kamlesh bhatt kamal ji se aapka parichaya hai jaankar achchhaa laga.
apse mulaakaat ki ichchhaa rahegi.

KESHVENDRA ने कहा…

पवन भाई, बिप्लवी जी कि इतनी शानदार शायरी और ताज़ा-तरीन ग़ज़लें पढवाने के लिए आभार. जी खुश हो गया शायरी के इतने शानदार नमूने पढ़कर. आपके संस्मरण भी काफी बेहतरीन हो रहे हैं..देखे अगली बार आप हमलोगों का परिचय किनसे करते हैं...

sumati ने कहा…

why you left this sher any way you covered much about him
zindagi ki jaruraten samjho.
waqt kam hai dukaan lambi hai..

i liked this sher of this gazal very much ...

सत्येन्द्र सागर ने कहा…

बहुत बढ़िया दोस्त. विप्लव साहब की शायरी से परिचय करने का शुक्रिया. उनकी शायरी बेहद संजीदा है दोस्त. उनकी शायरी में अस्तित्ववाद की झलक मिलती है. उनकी शायरी में मानववाद तथा मानव के अस्तित्व की वेदना का स्पष्ट चित्रण होता है. मुझे विप्लव साहब का पता तथा उनका मोबाइल नंबर जरूर समस कीजियेगा.
खुदा हाफिज़.

Devendra ने कहा…

महफूज भाई के ब्लॉग से यहाँ आया तो आकर ठहर सा गया. आस जगी थी कि कुछ अच्छा मिलेगा मगर इतना अच्छा, यकीं नहीं होता!
सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं.

'' पैर फिसले ख़ताएँ याद आईं ,
कैसे ठहरें ढलान लम्बी है !! ''

या फिर यह..

इक दिन रेत बना डालेंगी,
नदियाँ हैं चट्टान के पीछे !

..सुन्दर पोस्ट के लिए आभार.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... बेहतरीन गजल,एक से बढकर एक शेर,....प्रभावशाली प्रस्तुति !!!!

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

ज़मीं के लोग हों जब बेज़ुबां से,
शिकायत क्या करेंगे आसमाँ से !
नदी से नाव की रस्साकसी है,
हवा उलझी हुयी है बादवां से !
हमें भी मस्जिदों की है ज़रुरत,
हमारी नींद खुलती है अजाँ से !
shandaar lines.....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

किसी एक की तारीफ़ गलत होगा ये. शानदार. आभार.

pramod kush ' tanha' ने कहा…

behad khoobsoorat...laajaab...

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! हर एक शेर एक से बढ़कर एक है! इस लाजवाब और उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!