अप्रैल 06, 2011

मैनपुरी का मुशायरा... पहली किश्त !


मैनपुरी की ऐतिहासिक श्रीदेवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी २०११ शुरू हो चुकी है.... इस नुमाइश में कादंबरी मंच पर हमेशा से बेहतरीन साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते रहे है. इस वर्ष शहर के युवा पत्रकार हृदेश को इस मुशायरे का संयोजक बनाया गया है . गत वर्ष उन्होंने युवा महोत्सव का शानदार संयोजन किया था, संभवत: उनकी मेहनत और उनकी जीवटता को मद्देनज़र रखते हुए इस बार उन्हें आल इण्डिया मुशायरे की कमान सौंपी गयी गयी है.... ! संयोजक ह्रदेश से बात हुयी तो उन्होंने मुशायरे में आने वाले शायरों की फेहरिस्त सुनायी तो मन खिल उठा.... अच्छा लगा कि हमारे शहर में इस दर्जे का मुशायरा हो रहा है. इस बार के मुशायरे में जो शायर जुट रहे हैं वे सारे के सारे अव्वल दर्जे के शायर हैं, सोचा कि मुशायरे से पूर्व इन सब हुनरमंदों से आप सबका राब्ता करा दूं..... दो-तीन कड़ियों की इस पोस्ट का पहला अंक आज पेश कर रहा हूँ।

इस मुशायरे की शान होंगी मोहतरमा इशरत आफरीन......! वे इस मुशायरे को इंटरनेशनल दर्ज़ा दिलाएंगी क्योंकि मोहतरमा पाकिस्तान की हैं और फिलहाल अमेरिका में शिफ्ट हो चुकी हैं.....! हमारी खुशकिस्मती होगी उन्हें सुनना। मोहतरमा इशरत आफरीन का नाम उर्दू अरब में बडी इज्ज़त के साथ लिया जाता है. वे मूलतः पाकिस्तानी हैं जो एक भारतीय वकील जनाब़ सैयद परवेज से विवाह करने के बाद अमेरिका में हयूस्टन टेक्सास में बस गयीं. मोहतरमा इशरत आफरीन उर्दू-अदब की उन नामचीन शायराओं में से एक हैं जिन्होने ‘‘नारीवादी आन्दोलन‘‘ को चलाने में मजबूत भूमिका निभाई है. अदा ज़ाफरी, जोहरा निगाह, फहमीदा रियाज़, किश्वर नाहीद, परवीन शाकिर की श्रृंखला में मोहतरमा इशरत आफरीन का नाम बड़े अदब के साथ शामिल किया जाता है. मोहतरमा आफरीन के दो गज़ल संग्रह ‘कुंज पीले फूलों का‘ (1985) तथा ‘धूप अपने हिस्से की‘ (2005) प्रकाशित हो चुके हैं. मुझे याद आ रहा है कि जगजीत सिंह ने मोहतरमा की एक गज़ल गाई है जो बहुत पॉपुलर हुयी.....

अपनी आग को जिन्दा रखना कितना मुश्किल है,

पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है !!

चुल्लू में हो दर्द का दरिया ध्यान में उसके होंठ,

यू भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है !!

आज कल मोहतरमा आफरीन टेक्सास यूनीवर्सिटी में उर्दू की हेड आफ डिपार्टमेण्ट हैं। भारत में उनका आगमन, और वो भी मैनपुरी मुशायरे में हमारे लिए शान की बात होगी। हम तो बस यही कहेंगे कि मोहतरमा इशरत आफरीन अपने नाम के मुताबिक ‘उपलब्धि की सकारात्मक प्रतिक्रिया‘ ही साबित होंगी.

अब चलते हैं मंच के अगले नामवर शायरों की जानिब.....! इधर कुछ समय से जिन युवा गज़लकारों ने बडी मजबूती से अपनी कलम से अपने होने का एहसास कराया है उनमें से ‘आलोक श्रीवास्तव‘ एक बडा नाम है। आलोक मेरे मित्र हैं और सच तो यह है कि मुझे फक्र है कि आलोक मेरे मित्र हैं. आलोक को उनके शानदार लेखन के लिए हाल ही में रूस का साहित्यिक ‘पुश्किन ‘ अवार्ड मिला है. युवावस्था में ही इस शायर की कृति ‘आमीन‘ धूम मचा चुकी है. गज़ल गायक जगजीत सिंह और शुभा मुदगल ने यदि इस युवा शायर की ग़ज़लें गाई है तो उसका चुनाव कहीं से गलत नहीं है. मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक नगर विदिशा में आलोक श्रीवास्तव का बचपन गुज़रा और वहीं से आपने हिंदी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण की. बाद में वे पत्रकारिता से जुड़ गए. बेहद बारीक़ अहसासात को स्पर्श करती हुई आपकी ग़ज़लियात अपनी संवेदनाओं के लिये जानी जाती हैं. सलीक़े से कही गई कड़वी बातें भी आपकी रचनाधर्मिता की उंगली पकड़ कर अदब की महफ़िल में आ खड़ी होती हैं. जगजीत सिंह और शुभा मुद्गल जैसे फ़नक़ारों ने आपकी ग़ज़लियात को स्वर दिया है. इन दिनों आप दिल्ली में एक समाचार चैनल में कार्यरत हैं. यदि पुरस्कारों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान 2002′; ‘मप्र साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार पुरस्कार-2007′; ‘भगवशरण चतुर्वेदी सम्मान 2008′; ‘परंपरा ऋतुराज सम्मान-2009′ और ‘विनोबा भावे पत्रकारिता सम्मान-2009′ आपके खाते में अभी तक आते हैं. कल ही वे अपनी नयी ग़ज़ल मुझे फ़ोन पर सुनकर एहसासों से तर बतर कर रहे थे.....फिलहाल मैं यहाँ उनकी उस ग़ज़ल को पोस्ट जकर रहा हूँ जिसने मुझे उनका मुरीद बना दिया.... मुलाहिजा फरमाएं -

चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र पर छाई अम्मा

सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा !!

घर के झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे

चुपके -चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा !!

सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,

झरना, दरिया, झील, समन्दर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा !!

बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक्सीम हुईं,

तो-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा !!

अब ज़रा आगे बढ़ते हैं....... आलोक श्रीवास्तव की ही उम्र के ही एक और शायर से तआर्रुफ़ करा रहा हूँ नाम है मदन मोहन 'दानिश'......वे सिर्फ नाम के ही नहीं वाकई 'दानिश' हैं। दानिश भी उन नौजवान शायरों में से हैं जिनकी शायरी उनकी उम्र से बड़ी लगती है।यदि उनके बारे में अगर आपको पता न हो तो उनकी शायरी पढने-सुनाने के बाद यही महसूस करेंफ्गे की दानिश ज़रूर ही कोई बुजुर्ग शायर होंगे. उनके बारे में राहत इन्दौरी जैसे नामचीन शायर अगर यह कहते हैं कि "शायरी पुलसरात पर नहीं तो कम अज़ कम रस्सिओं पर चलने का अमल ज़रूर है. आसमानों को पढ़ना, ख़लाओं को सुनना और मौत को जीने का हुनर है. बीसवीं सदी की आखिरी दहाई में जिन चंद नौजवानों ने मुझे मुतवज्जा किया उनमें एक नाम मदन मोहन दानिश का है." तो कत्तई गलत नहीं कहते. निदा फाजली तो यहाँ तक कहते हैं कि दानिश की ग़ज़ल अपने शख्सी दायरे में इस विधा के तकाजों का एहतराम भी करती है और इन्हीं पाबंदियों में अपने अंदाज़ संवारती है. वो आज के शायर हैं. आज की ज़िन्दगी से उनकी ग़ज़ल का रिश्ता है. इस रिश्ते को उन्होंने ग़ज़ल के तवील इतिहास के शऊर से ज़यादा पुख्ता बनाया है और जो जिया है उसे ग़ज़ल में दर्शाया है. उन्होंने अपने लिए जिस भाषा का इन्तखाब किया है वो सड़क पर चलती भी है, वक़्त के साथ बदलती भी है, चाँद के साथ ढलती भी है. मुझे याद है जब उनकी ग़ज़ल की पुस्तक "अगर" छापी तो उसकी एक प्रति बड़े प्यार से उन्होंने मुझे भेजी थी... "अगर" आज तक मेरी शेल्फ में सहेजी हुयी है.....जब भी कुछ नया पढने का मन करता हूँ तुरंत उनकी किसी भी ग़ज़ल के दो तीन शेर पढता हूँ यकीं मानिये जिंदगी से जुदा हुआ महसूस करता हूँ। उनकी एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है यहाँ लगा रहा हूँ....... आप भी महसूस कीजिये-

जीते जी ये रोज़ का मरना ठीक नहीं,

अपने आप से इतना डरना ठीक नहीं।

मीठी झील का पानी पीने की खातिर,

इस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं।

कुछ मौजों ने मुझको भी पहचान लिया,

अब दरया के पार उतरना ठीक नहीं।

वरना तुझसे दुनिया बच के निकलेगी,

ख़ुद से इतनी बातें करना ठीक नहीं।

सीधे सच्चे बाशिंदे हैं बस्ती के,

दानिश, इन पर जादू करना ठीक नहीं।

क्रमश:

**सन्दर्भ- कविता कोष,गूगल.

जनवरी 21, 2011

वो मेरा खुदा है कि नहीं.....!


इधर लम्बे समय से कोई पोस्ट ब्लॉग पर नहीं लगा सका....सोचा चुप्पी तोड़ी जाये. आगाज़ एक ऎसी ग़ज़ल से कर रहा हूँ जो मेरी धर्मपत्नी ने लिखी है.....तमाम अरूज़ी गलतियों के बावजूद सिर्फ रदीफ़ के निबाह के आधार पर इसे ग़ज़ल का नाम दिया जा रहा है ! मुलाहिजा फरमाएं.... :-


उसकी बातों में कहीं मेरी अदा है कि नहीं
मैं भी देखूं कि वो मेरा खुदा है कि नहीं !!

बढ़ते ही जाते हैं उसकी यादों के सफ़र
जेह्न जाता है कहाँ दिल को पता है कि नहीं !!

कल उड़ाई थीं जुल्फें परीशाँ जिसने
आज भी उसकी गली में वो हवा है कि नहीं !!

तब तो बिखरी थी तुम्हारी ही नज़र से खुश्बू
अब भी क्या तेरी नज़र में वो नशा है कि नहीं !!

उसने छोड़ा था जिस हाल में 'गेसू' तुझको
आज भी तीर वहीँ दिल पे लगा है कि नहीं !!

नवंबर 26, 2010

गाँवों में भी अब पहले सा अपनापन और प्यार नहीं !!


एक मुद्दत से अपनी प्रिय विधा ग़ज़ल को लेकर कोई पोस्ट नहीं लगा पाया था...... शायद इसकी एक वज़ह यह थी कि व्यस्तता बहुत रही। ग़ज़ल पोस्ट करने के लिए जब एक मित्र ने शिकायती लहजे में बात की तो लगा कि ग़ज़ल पोस्ट कर ही देनी चाहिए, सो आज एक ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ........ मुलाहिजा फरमाएं.

अपने अपने हालातों से कौन यहाँ बेज़ार नहीं !!
ग़म से परेशाँ सब मिलते हैं, मिलते हैं गमख्वार नहीं !!

या के मंजिलें दूर हो गयीं, या के रास्ते मुश्किल हैं,
मेरे पाँवों में पहले सी तेजी और रफ़्तार नहीं !!

महज हाकिमों की दुनिया ही उनकी ख़ातिर ख़बरें हैं,
मज़लूमों के हक में लिखने वाले अब अखवार नहीं !!

शह्रों की तहज़ीब पे जब भी तंज कसूँ तो लगता है,
गाँवों में भी अब पहले सा अपनापन और प्यार नहीं !!

बेच चुका हूँ नज़्में ग़ज़लें महफ़िल महफ़िल गा गाकर,
मेरे हिस्से में अब कोई मेरा ही अशआर नहीं !!

कहने को मैं रंग शक्ल में उसके जैसा हूँ लेकिन ,
मेरे लहज़े में उस जैसा पैराया-ए-इज़हार नहीं !!

मेरे मुँह पर मेरे जैसी उसके मुँह पर उस जैसी,
रंग बदलती इस दुनियाँ में सब कुछ है किरदार नहीं !!
ग़ज़ल का कोई भी शेर अगर आपको पसंद आ सका तो अपनी कोशिश कामयाब समझूंगा........ खुदा हाफिज़ !!!!!!

नवंबर 09, 2010

एक सार्थक उपन्यास.....'ये वो सहर तो नहीं' !

" ये दाग दाग उजाला ये शब ग़जीदा सहर,
वो इन्तिजार था जिसको ये वो सहर तो नहीं "

फैज साहब की नज़्म से प्रारम्भ होने वाला उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं......‘ वर्तमान परिदृश्य को जिस बेबाकी से बयान करता है उसके लिए लेखक पंकज सुबीर प्रशंसा के पात्र हैं। गुदगुदी करते करते कोई तेजी से कचोट जाये तो कैसा लगता है........ बस यही एहसास है "ये वो सहर तो नहीं".....!
यह उपन्यास विन्यास और शिल्प की दृष्टि से इसलिए अद्भुत है क्योंकि यह उपन्यास 1857-2007 के 150 वर्षों की कहानी कहता है। अगर यह कहा जाए कि डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय की थाह लगाते हुए लेखक पंकज सुबीर ने प्रकारान्तर से लोकतंत्र की सामर्थ्य और सीमा को परखा है, तो कहीं से गलत न होगा. उपन्यास के पात्र आजादी के पूर्व के आशावाद और आजादी के बाद की उपजी परिस्थितियों के बीच हिचकोले खाते नजर आते हैं. देश में तख़्त बदलता है, निजाम बदलता है मगर परिस्थितियॉ जस की तस रहती हैं. उपन्यास सिद्धपुर (जिसे बाद में सीदपुर कहा गया है) के अंग्रेजी केंटोमेंट और नबावी हुकूमत से आरंभ होती हुई आज के सीदपुर तक जाती है. यद्यपि सिद्धपुर की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करने में पंकज काफी समय लगाते हैं किन्तु यह परिचय काफी रोचक है सो पाठकों को बोझिलता महसूस नहीं होती कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, पात्रों को वुसअत मिलती है. कहानी की शुरुआत में अँगरेज़ पोलिटिकल एजेण्ट हृयूरोज का बंगला उपन्यास का मुख्य पात्र बनता है. इस बंगले में 1857 में हृयूरोज अपने सहयोगियों के साथ एक पोलिटिकल एजेण्ट की भांति जो कुछ भी कर गुजरने की फिराक में है वही कमोबेश 2007 में इसी जगह सीदपुर के कलेक्टर (आई.ए.एस.) मानवेन्द्र सिंह द्वारा अपनी चाण्डाल चैकडी के मार्फत दोहराया जाता है। शासन -प्रशासन -पत्रकारों की यह तिकड़ी जिस भी तरह अपने स्वार्थों की पूर्ति करती है, उसे यह उपन्यास बखूबी प्रस्तुत करता है.

राजनीतिक व्यक्तित्वों और उनके सोचने की प्रवृत्ति को यह उपन्यास जिस बेबाकी से प्रस्तुत करता है वह लाजबाव है। उपन्यास के पात्र और घटनाएं भले ही काल्पनिक हों लेकिन वास्तव में वे हमारे आस-पास से उठाए गए प्रतीत होते हैं....! यही इस उपन्यास की सफलता है...!पात्र और घटनाएँ किस तरह पाठक से नाता जोड़ लेते हैं, इसकी एक बानगी उपन्यास के इस अंश में देखिये....... ‘‘बात तब की है जब उस घटना को बीते कुछ ही दिन हुए थे जब एक संन्यासिन ने एक राजा को सूबे के चुनावों में हरा कर सत्ता हथिया ली थी. यह भी बिल्कुल अलग बात है कि राजा, राजा नहीं थे केवल नाम के ही थे और संन्यासिन भी संन्यासिन होकर केवल नाम की ही थीं. राजा केवल इसलिए राजा थे क्योंकि उनके पूर्वज किसी रियासत के राजा हुआ करते थे और संन्यासिन केवल इसलिए संन्यासिन थीं क्योंकि वे भगवा रंग के वस्त्र धारण करती हैं. इसके अलावा न तो राजा के आचरण में राजा जैसा कुछ था और ना ही संन्यासिन के आचरण में संन्यासिन जैसा ही कुछ था. संन्यासिन के हाथ से सत्ता जानी थी सो अन्ततः चली ही गयी. सत्ता गयी इसका मतलब यह कि उनकी पार्टी से उनको चलता कर दिया गया. उनकी पार्टी यूज एंड थ्रो में बहुत विश्वास करती थी.‘‘

आई।ए.एस.-पत्रकार-नेताओं की यह तिकड़ी किस प्रकार निजी स्वार्थों में लिप्त और आकण्ठ डूबी हुई है, यह इस उपन्यास का केन्द्र बिन्दु है। विकास और जनता के हितों की अनदेखी कर कैसे यह तिकड़ी अपने स्वार्थों की पूर्ति करती है....उपन्यास में यह रोमांचक मोड़ है. सिद्धपुर का कलेक्टर मानवेन्द्र जो एक आई.ए.एस. अफसर है वो जिस कूटनीतिक ढंग से अपने विरोधी पत्रकार ‘परमार‘ से निपटता है वो उपन्यास में ‘थ्रिल‘ पैदा करता है.

बहरहाल इस उपन्यास में आज की सच्चाईयों को पंकज सुबीर ने बहुत ही बेबाकी से परोसा है। ‘तंत्र‘ किस प्रकार अपने हितों तक सिमट कर रह गया है, यह उपन्यास इस सोच की बेहतरीन प्रस्तुति है. भाषा की दृष्टि से तो उपन्यास बेजोड़ है. स्थानीय लोकोक्तियों को समाहित करते हुए पात्रों का आपसी संवाद सहज रोचकता पैदा करता है,जैसे ‘हाथ पुंछे भैरों', ‘बीमार कुत्ते वाला किस्सा' (पृष्ठ 111), 'कच्चा कैरी पक्का आम, टॉई टुईँ लेंडी फुस्स' (पृष्ठ 32) जैसे कई जुमलों का प्रयोग इतनी सावधानी से किया गया है कि लेखक पंकज सुबीर का लेखकीय कौशल देखते ही बनता है.

ब्लोगर नीरज गोस्वामी यदि यह कहते हैं कि "ये वो सहर तो नहीं" पढते वक्त कई बार ऐसा लगता है कि जैसे हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित व्यंगकारों जैसे परसाई जी, शरद जोशी जी, श्री लाल शुक्ल जी या फिर ज्ञान चतुर्वेदी जी को पढ़ा जा रहा है तो गलत अथवा अतिश्योक्ति नहीं लगता.......! दो काल में सामानांतर चल रही कहानियों में तालमेल बिठाना कोई हंसी खेल नहीं, पंकज जी का ये विलक्षण लेखन उन्हें अपने समकक्ष लेखकों से बहुत आगे ले जाता है। बकौल नीरज, लेखन की इतनी खूबियां एक ही उपन्यास में समेटना बहुत आश्चर्य का विषय है और ये पंकज जी के गहन अध्यन और हमारे समाज में घट रही गतिविधियों पर उनकी गहरी पकड़ का परिचायक है. उन्होंने जिस अंदाज़ से पात्रों का चरित्र चित्रण किया है उसे पढ़ कर लगता है जैसे हम उन्हें जानते हैं और वो हमारे बीच के ही हैं.

बहरहाल जागरूक पाठकों के लिए यह कृति संग्रहणीय व अपरिहार्य है। एतिहासिक पगडण्डियों से गुजरते हुए वर्तमान की गंदी गलियों तक पहुँचने में यह कृति एक ‘गाइड‘ की तरह कार्य करती है. वैसे तो पंकज सुबीर युवा लेखकों की श्रेणी में अग्रिम पंक्ति में आ ही चुके हैं मगर फिर भी पंकज सुबीर जैसे लेखकों को प्रोत्साहित करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि नयी पीढी के लेखकों में महान कथाकार कमलेश्वर सरोखी ‘किस्सा गोई‘ की प्रवृत्ति इतनी दृढ़ रूप में कम ही देखने को मिलती है. कथा-शिल्प-भाषा की दृष्टि से उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं‘ के लिए लेखक पंकज सुबीर को इस उपन्यास के लिए कोटिश: बधाई, साधुवाद. भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार से यह कृति यदि सम्मानित की गयी है तो यह कृति इसकी सही हकदार है भी.

निष्कर्षत: फैज के मोहभंग ‘वो इन्तजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं‘ से साहिर के प्रबल आशावाद ‘वो सुबह कभी तो आएगी‘ के बीच यह कृति एक साहित्यिक, सामाजिक दस्तावेज है जिसके लिए लेखक पंकज सुबीर की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है.

अक्टूबर 29, 2010

अलविदा वियतनाम !











वियतनाम दरअसल अंकल 'हो' का देश माना जाता है............... सो इस यात्रा वृत्तांत की चर्चा इसी महान व्यक्तित्व से किया जाना उचित होगा। अंकल 'हो' अर्थात 'हो-चि-मिन्ह', जिनका नाम मार्क्स क्रांति के प्रबल पुरोधा के रूप में लिया जाता है. हो-चि-मिन्ह को मार्क्स, ऐंजिल्स, लेनिन, स्टालिन के समकक्ष माना जाता है. अंकल 'हो' की कहानी, सर्वहारा क्रांति तथा राष्ट्रवादियों के लिए विश्व की तत्कालीन साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष की अद्भुत दास्तान हैं. 1890 में हो-चि-मिन्ह का जन्म साम्राज्यवादी शोषण से पीड़ित देश, वियतनाम में हुआ था जहाँ उस समय राष्ट्रवाद की सजा मौत होती थी..............! साम्राज्यवादियों को चुनौती के रूप में 'हो' ने वियतनाम में राष्ट्र नायक की पहचान बनाई...... इसी दरमियां हो-चि-मिन्ह ने फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड देशों की यात्रा की और साम्राज्यवादी शोषण को और करीब से समझा-देखा. इन यात्राओं के बाद साम्राज्य वादी शक्तियों के विरुद्ध 'हो' के तेवर और मुखर हो गए. 1917 की रूसी क्रांति से आकर्षित होकर वे फ्रांसीसी कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और 'दी पारिया' नमक पत्र प्रकाशित करना आरंभ किया, जो फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के विरुद्ध उसके सभी उपनिवेशों में शोषित जनता को क्रांति के लिए प्रोत्साहित करती थी. साम्राज्वाद से अपने देश को मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने 1933 में 'वियत मिन्ह' नामक संयुक्त मोरचा बनाया। 'हो' 1945 तक हिंद चीन के कम्यूनिस्ट आंदोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के सक्रिय नेता रहे. वे 'लंबे अभियान' और जापान विरोधी युद्ध में भी उपस्थित थे. कालांतर में सितंबर, 1945 में 'हो' ने वियतनाम जनवादी गणराज्य की स्थापना की. आज़ादी के इस संघर्ष में उनकी सेना का फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों से युद्ध शुरू हुआ, यहाँ फ़्रांसिसी- अंग्रेजों का गठबंधन हुआ, साम्राज्यवादियों ने साम्राज्य वापस लेना चाहा. भयंकर लड़ाइयों का दौर आरंभ हुआ और आठ वर्षों की खूनी लड़ाई के पश्चात् फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को 'दिएन वियेन फू' के पास 1954 में भयंकर मात खानी पड़ी, तत्पश्चात् जिनेवा सम्मेलन बुलाना स्वीकार किया गया. इसी वर्ष हो-चि-मिन्ह वियतनामी जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति नियुक्त हुए. बहरहाल 1969 तक जब तक हो जिंदा रहे , ताउम्र साम्राज्यवादियों की आखों की किरकिरी बने रहे.

इस महान नेता के मेमोरिअल म्यूजियम पर जाना और इस सर्वकालिक महान नेता के पार्थिव शरीर को देखना वास्तव में इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि रही। मद्धम प्रकाश में मुसोलियम के केन्द्रीय कक्ष में इस नेता को शरीर को जिस तरह रासायनिक तरीके से संरक्षित किया गया है, वो चमत्कारिक था. इस नेता के प्रति इस देश की जनता की अगाध श्रद्धा है, इसका प्रमाण यह है कि इस नेता को याद करने और इनके संरक्षित शरीर के दर्शनार्थ मुसोलियम के बाहर लम्बी लाइन हमेशा देखी जा सकती है.

वियतनाम का दूसरा आकर्षण यहाँ की 'लाइफ स्टाइल' देखना रहा............ हनोई की सडकों को दोनों और स्ट्रीट फ़ूड की हजारों दुकाने है.......... जहाँ अलसुबह से रात भर चहल-पहल बनी रहती है। यहाँ छोटे छोटे स्टूलों पर बैठकर वियतनामी जनता सूप-व्यंजनों का आनंद लेते हुए हमेशा देखी जा सकती है. सड़क के फुटपाथ इन्ही स्ट्रीट फ़ूड दुकानों से हर समय सजी रहती हैं. यहाँ के नाईट मार्केट के बारे में अवश्य लिखना चाहूँगा......... यहाँ नाईट मार्केट में शौपिंग करने का अपना अनोखा अनुभव है.............! इस मार्केट में भारी भीड़ में धक्के खाते हुए रोज़मर्रा की चीजों को खरीदते हुए जन सामान्य का उत्साह देखते ही बनता है....!

वियतनाम का एक अन्य आकर्षण यहाँ का सिल्क है . वियतनाम में सिल्क (रेशम) निर्माण करने की पुरानी परम्परा है. वियतनाम में सदियों से सिल्क को बनाने और एम्ब्रोइडरी का काम किया जा रहा है. वियतनाम के ग्रामीण अंचलों में बड़े पैमाने पर सिल्क को बुनने का काम किया जाता है. इस काम में वियतनामी महिलाओं को विशेषज्ञता हासिल है, वे समूह बनाकर सिल्क को बुनने का काम करती हैं. वियतनाम के सिल्क मार्केट से हमने सिल्क के बहुत से वस्त्र हमने ख़रीदे............ ये प्रोडक्ट अपेक्षाकृत सस्ते और बहुत खूबसूरत थे.

हमारा अगला पड़ाव 'हेलोंग बे' रहा. यह यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्थल भी है........... लगभग 1600 वर्ग किमी के क्षेत्रफल में फैली इस साईट को पानी के जहाज से देखना अत्यंत रोमांचक रहा। चरों और विशालकाय लाइमस्टोन के पहाड़ों के बीच से गुजरते हुए इन प्राकृतिक दृश्यों को देखना रुचिकर रहा. इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था को जानना समझना भी नवीन अनुभव रहा. ‘कम्यूनों‘ को और उनकी व्यवस्थाओं को देखना रूचिकर था, ‘कम्यून‘ एक प्रशासनिक इकाई है,ठीक वैसे ही जैसे हमारे देश में ‘लोकल अर्बन बॉडी‘ हो. स्थानीय 'कम्यून' अपने सीमा के अन्तर्गत सार्वजनिक सम्पत्तियों, प्रशासन, पब्लिक डिलीवरी सिस्टम के लिए जिम्मेदार होती है. हमने हनोई से लगभग पचास कि0मी0 आगे एक ‘कम्यून‘ की व्यवस्था का अध्ययन किया. कम्यून द्वारा संचालित स्कूल, स्टेडियम और अस्पताल को देखने का अवसर मिला. कम्यून जिस प्रतिबद्धता और ईमानदारी से इन सार्वजनिक संस्थाओं को संचालित कर रहे हैं, वह वियतनाम के प्रशासन में कम्यून व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रकट करते हैं.

बहरहाल एक सप्ताह बाद जब हनोई से हम भारत के लिए विदा हुए तो, इस देश की बहुत सी यादों का पिटारा हमारे साथ था। विदाई के समय एहसास हुआ कि हम एक ऐसे विकासशील देश की यादों को संजोकर वापस हो रहे हैं जो असीम संभावनाओं से भरा हुआ देश है. एक ऐसा देश जो भले ही आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न न हो, मानसिक रूप से अत्यन्त दृढ है। अपनी मुख्तलिफ पहचान बनाये रखने के लिए इस देश के न केवल नेताओं ने बल्कि जन सामान्य ने साम्राज्यवादी शक्तियों से जिस मजबूती से लोहा किया है वह अदभुत तो है ही प्रेणादायक भी.

इस देश में भारतीयों से मुलाकातें नहीं हो सकीं. अंकल 'हो' के इस देश को इतने करीब से देखना किसी के लिए भी नया अनुभव हो सकता है....इस देश का इतिहास, लोक संस्कृति, परम्पराएं इस देश को और करीब से जानने की उत्कंठा जगाती हैं........! इन्ही यादों को जेहन में समेटे हुए अपने प्लेन की खिड़की से वियतनाम को अलविदा कहा तो लगा कि इस विकासशील देश को अगले दस वर्षों में विकास की सीढियां चढ़ने से शायद ही कोई रोक पाए......!

अक्टूबर 05, 2010

वियतनाम यात्रा पार्ट-1







सिंगापुर के चांगी एयरपोर्ट से वियतनाम विदा होते वक्त दिल में उदासी और प्रशन्नता दोनों भावों का अहसास हो रहा था। उदासी का एहसास इसलिए कि बीते सप्ताह सिंगापुर को बहुत नजदीक से देखने-समझने का अवसर मिला था। सिंगापुर की बहुलवादी संस्कृति, विकास के प्रतिभान, सिविक सेंस, प्रशासनिक कर्मठता इत्यादि को करीब से देखने के बाद दिल में यह जज्बा कुलांचे मारने लगा था कि कुछ ऐसा ही परिवर्तन अपने देश में भी किया जाए। सिंगापुर में भारतीय मित्रों ने जो प्यार-सम्मान दिया था , उसे भी दिल भुला नहीं पा रहा था। सिंगापुर के दर्शनीय स्थलों ने दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी थी, उसे भुलाना भी इतना आसान न था। सिंगापुर की यादों से निकलने का जी नहीं चाह रहा था, सो उदासी का घेरा मन के चारों ओर था किन्तु वियतनाम जैसे देश में पहुँचाने की लालसा भी अपनी जगह थी।



बहरहाल इस मानसिक उतार-चढाव में हिलोरे खाते हम सिंगापुर से विदा हुए। लगभग तीन घण्टे की हवाई यात्रा के बाद हम वियतनाम के नोई-बाई एअरपोर्ट पर जब उतरे तो विकसित एवम् विकासशील राष्ट्र के बीच का अन्तर स्पष्ट दिखने लगा। सिंगापुर में जहॉ सब कुछ व्यवस्थित सा था वहीं हनोई के इस एअरपोर्ट पर वह 'प्रोफेसनल कॉम्पीटेंसी' नहीं दिखी। इमीग्रेशन इत्यादि क्लीयर कराने में ही दो घण्टे से ज्यादा वक्त लग गया। इस थकाऊ प्रक्रिया के बाद हम ‘मिनी बस‘ से रवाना हुए अपने होटल ‘सिल्क पथ‘ की तरफ। हनोई एअरपोर्ट से हमारा होटल लगभग 35किमी0 दूर था। होटल की तरफ जाते वक्त हनोई की सड़कों का नज़ारा ऐसा एहसास दिला रहा था था कि जैसे हम अपने ही देश में हों। इन सडकों पर भी भारी ट्रैफिक था। सडको पर कार, बड़े वाहन, दुपहिया वाहन, साइकिल, पैदल और तो और पशु-जानवर सब एक साथ चल रहे थे। हनोई शहर में ट्रैफिक भी उतना ही अव्यवस्थित था जितना कि हमारे देश के किसी मध्यम स्तर के शहरमें हों। सडकों पर दुकानों का फैलाव भी कमोबेश अपने देश के ही किसी शहर की याद दिला रहा था। 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 70 प्रतिशत हयूमिडिटी के वातावरण में हनोई के 'सिल्क पथ' होटल में पहुँच कर यहॉ के मौसम में गर्मी की तीव्रता का एहसास हुआ। सिल्क पथ पहुँच कर यह आदेश मिला कि हमें तत्काल 'नेशनल अकेडमी ऑफ़ पब्लिक एड्मिनिस्त्रेसन' पहुँचना है। हालांकि हम हवाई यात्रा व तदोपरान्त इस सड़क यात्रा के बाद पर्याप्त रूप से थक चुके थे किन्तु आदेश के पालन के लिए तत्काल राष्ट्रीय अकादमी निकल लिए।



हनोई की सडकों पर यात्रा करने का यह अनूठा अनुभव था। होटल से अकादमी की दूरी लगभग 10-12 कि0मी0 रही होगी। इस यात्रा के दौरान हनोई के बाजार, लोगों, सामान्य रहन-सहन, व्यवहार आदि के विशय में एक राय पुख्ता आकार लेने लगी थी। हनोई की इन कम चौड़ी सडकों पर दुपहिया वाहनों की भरमार थी हालाँकि चैपहिया वाहनों की संख्या काफी कम थी। लगभग आधे घण्टे की यात्रा के बाद हम अकादमी पहुंचे । अकादमी में घुसते ही लगा कि किसी ‘‘टिपिकल गवर्नमेण्ट आफिस बिल्डिंग‘‘ में आ चुके हैं। अकादमी के परिचयात्मक सत्र में वियतनाम के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने-वार्ता करने का अवसर प्राप्त हुआ। उनसे मिलते समय हैरानी हुई की वरिष्ठतम नौकरशाह भी ‘वियतनामीज‘ भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे। हमारी सम्प्रेषण की भाषा तो अंग्रेजी थी किन्तु वियतनामी अधिकारी अपनी राष्ट्र भाषा में ही वार्तालाप कर रहे थे, सहूलियत के लिए अनुवादक की व्यवस्था थी , लेकिन इसके बावजूद आपसी सम्प्रेषण में तारतम्यता का अभाव साफ दिख रहा था। बहरहाल इस अभाव के बावजूद वियतनामी लोगों का अपनी भाषा के प्रति लगाव प्रशंसनीय तो था ही.........।



अगले कुछ दिन इसी तरह वियतनाम में गुजरे। हर दिन वियतनाम से जुडाव गहराता गया। यहॉ के जन सामान्य पर अपनी प्राचीन इतिहास- संस्कृति-सभ्यता और भाषा का प्रभाव साफ नजर आता है। वियतनाम के वर्तमान पर कुछ लिखने से पूर्व वियतनाम के बारे में कुछ सामान्य जानकारी देना आवश्यक समझता हूँ । 86 मिलियन जनसंख्या वाले इस देष में 90% साक्षरता है और आधी जनसंख्या बौद्ध धर्म की अनुयायी है। 02 सितम्बर, 1945 को आजाद होने के बाद 15 अप्रैल, 1952 को इस देश में नया संविधान बना। प्रशासकीय दृष्टिकोण से यह देश 58 प्रान्तों तथा 5 म्यूनिसपैलिटीज में विभाजित है। ‘हनोई‘ जो वियतनाम की राजधानी है, वह भी एक म्यूनिसपैलिटी ही है। 1052डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले इस देश की विकास दर 5% से कुछ ज्यादा है । इस देश में आय के साधन कोयला, कच्चा तेल, जस्ता, तांबा सोना, मैगनीज जैसे खनिज हैं। इनके अतिरिक्त चावल, कॉफी, मक्का, काजू, मसाले (काली मिर्च), आलू, मूंगफली मछली आदि उत्पाद भी देश के विकास में महती योगदान देते हैं।



वियतनाम का इतिहास लगातार बनता-बिगड़ता रहा है। चीन, जापान और फ्रांस की सभ्यताओं ने इस देश के इतिहास- सभ्यता को समय-समय पर प्रभावित किया है। इन देशों में वियतनाम जनता के साथ लगातार संघर्ष भी होता रहा है। यही संघर्ष वियतनाम की जनता को अपनी ‘अलग पहचान‘ स्थापित करने के लिये लगातार प्रेरित करते रहे। वियतनामियों को अपनी भाषा-संस्कृति से जुडाव यकीनन इन्हीं संघर्षों का परिणाम है। 1985 तक यह देश अंतर्राष्टीय नवाचारों से बहत ज्यादा नहीं जुड पाया था, 1986 में आर्थिक सुधारों को अपनाने के बाद वियतनाम अंतर्राष्टीय अर्थव्यवस्था से जुडा है। यह सुधार वियतनाम में डोई-मोई (क्व्प्।डव्प्) के नाम से जाने जाते हैं। ये सुधार केन्द्रीकृत नियोजन से इस देश को खुले अंतर्राष्टीय बाजार से जोडते हैं।



फिलहाल इस बार अपनी बात यहीं समाप्त करता हूँ, अगली पोस्ट में वियतनाम के महान नेता 'हो-ची-मिन्ह‘, प्रशासनिक व्यवस्था, यहाँ के लोक-पक्ष‘ और ‘लोक-व्यवहार‘ के विषय में लिखने का प्रयास करूंगा।




***** एक बात और वियतनाम जाने से पूर्व इस देश के बारे में बड़े भाई और देश के नामचीन पत्रकार (संपादक-हिंदुस्तान) श्री शशि शेखर जी से भी विस्तृत वार्ता हुई थी.....वे इस देश के इतिहास- संस्कृति-सभ्यता और भाषा से बहुत प्रभावित थे। वियतनाम जाने से पूर्व उनसे हुई बात-चीत ने वियतनाम को और भी करीब से देखने-समझने की दृष्टि विकसित की. आभारी हूँ श्री शशि शेखर जी का जिन्होंने इस देश को देखने और समझने के लिए परिष्कृत दृष्टि को अंकुरित-पल्लवित होने का अवसर दिया.




क्रमश:

सितंबर 06, 2010

सिंगापुर से.......! (पार्ट -2)



सिंगापुर यूँ तो ऐसा देश है जिसमें इतने दर्शनीय स्थल हैं कि जिन्हें देखने के लिए काफी वक्त चाहिए.............. किन्तु हमारे पास वक्त की कमी थी, सो चाहकर भी कुछ ही दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कर पाए।


दरअसल दिन भर के क्लासरूम सेसन तथा विभिन्न संस्थाओं/ प्राधिकारियों से ‘इन्टरएक्शन’ के बाद सांय का वक्त ही हमें ऐसा मिलता था कि जब हम सिंगापुर के दर्शनीय स्थलों और यहां के खूबसूरत बाजारों का अवलोकन कर सकते थे। सिंगापुर में ऐसे कई दर्शनीय स्थल हैं, जो किसी भी पर्यटक को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं-जैसे, मेगाजिप एडवेंचर पार्क, सेन्टोसा पार्क, मिंट म्यूजियम ऑफ ट्वायज, चांगी बार म्यूजियम, एशियन सिविलाइजेशन म्यूजियम, पेरनकान म्यूजियम, सिंगापुर डिस्कवरी सेंण्टर, मेरीना बैराज, न्यूवाटर विजिटर सेण्टर, साइंस सेण्टर सिंगापुर, चेंग हो क्रूज, ज्वेल केबल कार ड्राइव, क्लार्क क्वे, रेड डॉट डिजाइन म्यूजियम, सिंगापुर फ्लायर, सिंगापुर रिवर क्रूज, सिगापुर टर्फ क्लब, बटरफ्लाई पार्क, नेशनल आर्चिड गार्डेन इत्यादि इत्यादि। भारतीय पर्यटकों के लिए यहां लिटिल इण्डिया, मुस्तफा कामर्शियल सेण्टर घूमना अपने देश में ही घूमने जैसा है।

बहरहाल समयाभाव के बावजूद हमने सिंगापुर को अधिकाधिक ‘एक्सप्लोर’ करने का प्रयास किया। सिंगापुर सिविल सर्विसेज कॉलेज से छूटते ही हम वापस अपने ‘फ्यूरामा रिवर फ्रंट’ होटल आते और इन स्थलों को देखने के लिए निकल पड़ते। कुछ स्थानीय भारतीय मित्रों ने कहा कि सिंगापुर दर्शन ‘सेण्टोसा बीच’ के भ्रमण के बिना अधूरा है सो हमने तय किया कि ‘सेण्टोसा बीच’ जरूर देख लिया जाए। सेण्टोसा पार्क में अण्डर वाटर सी व जलचरों का सजीव प्रदर्शन, स्काई ड्राइविंग तथा सिंगापुर म्यूजियम देखना शानदार अनुभव था। इस अनुभव में अपना रोमांच तब चरम पर पहुंचा जब हमनें ‘सांग ऑफ द सी’ पर जबरदस्त वाटर लेजर शो देखा। हजारों दर्शकों की भीड़ के बीच इस वाटर लेजर शो के प्रदर्शन ने हमारा मन मोह लिया। सेण्टोसा में इसके अलावा 4-D थिएटर, फोर्ट सिलिसों को घूमना भी अदभुत क्षण थे।

सेण्टोसा के अलावा मुझे सिंगापुर के ‘फ्लायर’ ने बहुत आकर्षित किया। 165 मीटर ऊंचाई वाले इस फ्लायर में ‘ट्रांसपेरेण्ट बॉक्स’ से सिंगापुर को देखना अत्यंत रोमाचंक अनुभव था। इस फ्लायर से यूथ ओलम्पिक की गतिविधियाँ देखना तो और भी रोमांचकारी था। सिंगापुर के बाजारों में देर रात तक रौनक रहती है। यहां जगह-जगह फूड कोर्टस देखे जा सकते है। इन फूड कोर्टस में दुनिया के अलग-अलग देशों के लजीज व्यंजन खाए जा सकते हैं। एम॰आर॰टी॰ (भारतीय मेट्रो ट्रेन की तरह) से चंद सिंगापुरी डालर्स में सिंगापुर को घूमना यादगार अनुभव रहा। विश्वास नहीं होता कि महज 700 वर्ग कि॰मी॰ में फैले किसी देश में इतने पर्यटक स्थल हो सकते हैं। इस देश की प्रगति में भारतीयों का भी बहुत बड़ा योगदान है।

जनसंख्या में लगभग दस फीसदी भागेदारी भारतीयों की है और कोई भी क्षेत्र हो, चाहे उद्योग या उत्पादन या फिर तकनीक....... सर्वत्र भारतीयों की भूमिका सहज स्वीकार्य है।

सिंगापुर में बिल्डिंग्स की बनावट तथा भू-खण्डों के प्रयोग को देखकर बार-बार इस देश के नीति निर्माताओं को धन्यवाद देने का मन करता रहा, जिन्होंने छोटे-से-छोटे भूखण्ड का ‘आप्टिमम यूज’ करते हुए उसे सुंदर से सुंदरतम बना दिया है। सड़क पर पैदल यात्रियों को सड़क पार करते हुए ट्रैफिक का रूक जाना......... रेड-ग्रीन लाइट सिग्नलस का शत-प्रतिशत अनुपालन करना ऐसे उदाहरण थे जो वास्तव में इस देश में ‘‘सिविक सेंस’’ होने का अहसास कराते थे। रेन वाटर हार्वेस्टिंग, रूफ टॉप ग्रीनरी इत्यादि को देखकर यहां की प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होता रहा।

एक सप्ताह की इस सिंगापुरी यात्रा से निश्चित रूप से प्रशासनिक समझ विकसित हुई। यहां की चुस्त-दुरूस्त कानून और व्यवस्था को देखकर मन बार-बार यही सोचता रहा कि योजनाबद्ध प्रतिबद्धता और योजनाओं के क्रियान्वयन में ईमानदारी ने इस देश को विगत 45 साल में कहां से कहां पहुंचा दिया है। 1965 में आजाद हुये इस देश ने आशा से कहीं ज्यादा तेजी से विकास किया है और दुनिया में अपने अस्तित्व का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत किया है।

सिंगापुर से लौटने के बाद भी कुछ स्थानीय भारतीय मित्रों की याद आती रही। इस यात्रा के दौरान श्रद्धा जैन जी, प्रशांत जी, अरूण दीक्षित दम्पत्ति, विक्रम-अम्बिका द्वारा दिए दिए गए स्नेह-सम्मान के प्रति मन अब तक आभारी है। सिंगापुर के बाद हमारा अगला पड़ाव वियतनाम था, जिसके बारे में तफसील से अगली प्रस्तुति में लिखने का प्रयास करूंगा।

क्रमशः