जून 22, 2011

......कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!


ये ज़िन्दगी है, इस ज़िन्दगी में हर आदमी को बहुत से लिबास बदलते रहने होते हैं.......! आम आदमी की बात करें तो उसे एक ही समय में बहुत से किरदार अदा करने पड़ते हैं.......! इसी बीच खुद को बचाए रखने कि ज़द्दोज़हद- कवायद भी चलती रहती है.......! अजीब सी कशमकश है ये, बहुत आसाँ नहीं होता अपने आपको बचाए रखना.......! जीवन में संतुलन बहुत ज़ुरूरी है, असल में होता यह है कि "एक को मनाऊँ तो दूजा रूठ जाता है.......! इन्ही सब हालात में इसी बेकसी और बेबसी को बयां करती एक ग़ज़ल हो गयी....... सोचा आप सबको पेश करूँ........!!! मुलाहिजा फरमाएं.....,

गुज़ारी ज़िन्दगी हमने भी अपनी इस करीने से,
पियाला सामने रखकर किया परहेज पीने से !!

अजब ये दौर है लगते हैं दुश्मन दोस्तों जैसे,
कि लहरें भी मुसलसल रब्त रखती हैं सफी़ने से !!

न पूछो कैसे हमने हिज्र की रातें गुजा़री हैं
गिरे हैं आँख से आँसू उठा है दर्द सीने से !!

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!

समझता खूब हूँ जा कर कोई वापस नहीं आता
मगर एक आस पर ज़िन्दा हूँ मैं कितने महीने से !!

रहें महरूम रोटी से उगायें उम्र भर फस्लें
मजा़क ऐसा भी होता है किसानों के पसीने से !!

कभी द़र्जी, कभी आया, कभी हाकिम बनी है माँ
नहीं है उज़्र उसको कोई भी किरदार जीने से !!

30 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

हासिल - ऐ - ग़ज़ल शेर है यह तो भाई जान ... वाह बहुत खूब ...

"कभी द़र्जी, कभी आया, कभी हाकिम बनी है माँ
नहीं है उज़्र उसको कोई भी किरदार जीने से !!"

बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

S.M.HABIB ने कहा…

मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से....
उम्दा ग़ज़ल...
बधाईयाँ...
सादर

मनोज कुमार ने कहा…

रहें महरूम रोटी से उगायें उम्र भर फस्लें
मजा़क ऐसा भी होता है किसानों के पसीने से !!
कटु यथार्थ।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

पहली बार आया हूँ,हर एक शेर उम्दा ,लाजवाब,बेमिसाल .अब तो आपको पढने के लिए आते रहना पड़ेगा.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

रहें महरूम रोटी से उगायें उम्र भर फस्लें
मजा़क ऐसा भी होता है किसानों के पसीने से !!

कभी द़र्जी, कभी आया, कभी हाकिम बनी है माँ
नहीं है उज़्र उसको कोई भी किरदार जीने से !!

ख़ूबसूरत अश’आर से मुरस्सा’ ग़ज़ल जिस में मुआ’शरे के दर्द को भी मह्सूस किया जा सकता है और ग़ज़ल की रवायती नज़ाकत को भी
मुबारक हो !!!!!

SACHIN SINGH ने कहा…

"KABHI DARJI,KABHI AAYA, KABHI HAAKIM BANI HAI MAA,
NAHI HAI URJ USKO KOI BHI KIRDAAR NIBHANE MEIN".......

THESE BEAUTIFUL LINES EXPRESS BEAUTIFUL TEACHINGS- EVERY PERSON SHOULD PLAY HIS ROLE PASSIONATELY WITHOUT ANY EXCUSES....

DEAR CHACHA JI,YOUR EVERY LINE EXPRESS THE GREAT TRUTHS OF LIFE...
WITH ENDLESS LOVE AND PRAYERS....

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

इस जद्दोज़हद का नाम ही तो जीवन है। बहुत शानदार गज़ल लगी, जिन्दगी से जुड़ी हुई।

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

खूबसूरत पंक्तियाँ

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!

Babli ने कहा…

न पूछो कैसे हमने हिज्र की रातें गुजा़री हैं
गिरे हैं आँख से आँसू उठा है दर्द सीने से !!
यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से!!
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! हर एक शेर एक से बढ़कर एक है! शानदार और लाजवाब ग़ज़ल! उम्दा प्रस्तुती!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


मैं समय हूँ ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .

रश्मि प्रभा... ने कहा…

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!
kamaal hai

शारदा अरोरा ने कहा…

behad khoobsoorat , ek jagah kuchh atak rahaa hai ...mai hoo jinda kitne maheene se ...generally maheenon se kaha jata hai ..ab pataa nahi kisi aur ko bhi aisa laga ya nahi ....muaaf keejiyega ...

manishshukla ने कहा…

bahut achhi ghazal hai

Abhishek Ojha ने कहा…

सच्ची बात.

वाणी गीत ने कहा…

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!

नगीने से ही शब्द जड़े हैं इस ग़ज़ल में ...
शानदार !

Babli ने कहा…

टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

SACHIN SINGH ने कहा…

DEAR CHACHA JI,
THANK FOR YOUR BLESSINGS AND LOVE....YOUR EVERY COMMENT IS LIKE TORCH-BEARER FOR MY LIFE.......AND BLOG ALSO !!!!
WITH LOVE !!!!


FOR MY BLOG-
[http//- Success-aneverendingpleasentjourney.
blogspot.com]

psingh ने कहा…

भईया (गुरदेव ) कमाल कर दिया
आपने पूरी जिन्दगी की हकीकत बयां कर दी चन्द पंक्तियों में
हर किरदार को बहुत ही खूबसूरती उकेरा है "भविष्य के गुजार आप है "
इस ग़ज़ल में तो में भ्रम में पढ़ गया हूँ मेरी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे ईख के खेत में
घुस कर गन्ने छांटना .....|
सारे सेर नगीने है
हमतो तुच्छ सफीने है
फिर भी
मतला बेहद उम्दा है
यह सेर बहुत अच्छा है
न पूछो कैसे हमने हिज्र की रातें गुजा़री हैं
गिरे हैं आँख से आँसू उठा है दर्द सीने से !!
दिल को छूता सेर......
यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!
लाजबाब........पेशकश
रहें महरूम रोटी से उगायें उम्र भर फस्लें
मजा़क ऐसा भी होता है किसानों के पसीने से !!
और इस पर में कुर्बान.......|
कभी द़र्जी, कभी आया, कभी हाकिम बनी है माँ
नहीं है उज़्र उसको कोई भी किरदार जीने से !!
गर आप पास होते तो आपके श्री चरणों को चूम कर आशीर्वाद जरुर ले लेता
प्रणाम स्वीकारें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से ..

बहुत खूब शेर है इस लाजवाब गज़ल का ... सच है अपने आप को भीड़ से बचाए रखना आसान नहीं होता ... नगीने की तरह चमकना भी तो आसान नहीं होता ...

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

सारी बंदि‍शें अच्‍छी हैं जी।

कुश्वंश ने कहा…

न पूछो कैसे हमने हिज्र की रातें गुजा़री हैं
गिरे हैं आँख से आँसू उठा है दर्द सीने से !!


हर एक शेर लाजवाब,बेमिसाल, बधाइयाँ

upendra shukla ने कहा…

पहली बार आया हू आपके ब्लॉग पर् अच्छा लगा
my blog link- "samrat bundelkhand"

रविकर ने कहा…

रहें महरूम रोटी से उगायें उम्र भर फस्लें
मजा़क ऐसा भी होता है किसानों के पसीने से !!


बंजर धरती से मैंने सोना उपजाया

कूप और नलकूपों का इक जाल बिछाया




जीवन भर ढोया पानी, फिर भी प्यासा मै

जीवन-संध्या की हूँ , घनघोर निराशा मै




देख-भाल कर मैंने हर कदम उठाया

भटक रहे हर राही को, सदमार्ग दिखाया




कस्मे-वायदे-प्यार-वफ़ा की करी बंदगी

पर-सेवा,पर-हितकारी यह रही जिंदगी




फिर भी कोई कमी काल सी कसक रही है

अंतस में अन्जानी चाहत सिसक रही है

daanish ने कहा…

यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से

खूबसूरत ग़ज़ल का ये बहुत प्यारा शेर
बस गुनगुनाता ही जा रहा हूँ ... वाह !!
मुबारकबाद कुबूल करें

Richa ने कहा…

nice post..

kaushal ने कहा…

बहुयामी नज़रिए की बेशकीमती पेशकश है ये ग़ज़ल!इस ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब है!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

हर शेर खुद में मुकम्मल वाक़ई....!!

मगर
यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !!

.
और

समझता खूब हूँ जा कर कोई वापस नहीं आता
मगर एक आस पर ज़िन्दा हूँ मैं कितने महीने से !!


यहाँ आ कर मन ठिठक जाता है।

संजय भास्कर ने कहा…

हर एक शेर लाजवाब,

brajeshfao ने कहा…

kamal ki gajal hai.mai esse zyada kya kahoon ki apke jindagi ki sacchayi ko vayan karne ka ye andaj mujhe gajalon men interest lene ko majboor karta hai
Brajesh Vinita Mansi Harishita $Siddharth

डा० व्योम ने कहा…

बहुत प्रभावशाली, बोलती हुई ग़ज़ल है, वधाई ! विशेषकर ये शेर-
" यहाँ हर शख्स बेशक भीड़ का हिस्सा ही लगता है
मगर इस भीड़ में कुछ लोग हैं अब भी नगीने से !! "
अँधेरे में रोशनी को देक लेना बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण है, यही सोच हमे जीने का साहस भी देती है, वधाई ।